पीपल
पीपल
पीपल (वानस्पति नाम:फ़ाइकस रेलीजियोसा Ficus religiosa) भारत, नेपाल, श्रीलंका, चीन और इंडोनेशिया में पाया जाने वाला बरगद की जाति का एक विशालकाय वृक्ष है, जिसे भारतीय संस्कृतिमें महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है तथा अनेक पर्वों पर इसकी पूजा की जाती है। पीपल का वृक्ष का विस्तार, फैलाव तथा ऊंचाई व्यापक और विशाल होती है। यह सौ फुट से भी ऊंचा पाया जाता है। हज़ारों पशु और मनुष्य इसकी छाया के नीचे विश्राम कर सकते हैं। बरगद और गूलर वृक्ष की भाँति इसके पुष्प भी गुप्त रहते हैं अतः इसे गुह्यपुष्पक भी कहा जाता है। अन्य क्षीरी (दूध वाले) वृक्षों की तरह पीपल भी दीर्घायु होता है। पीपल की आयु संभवतः 90 से 100 सालों के आसपास आंकी गई है। इसके फल बरगद-गूलर की भांति बीजों से भरे तथा आकार में मूँगफली के छोटे दानों जैसे होते हैं। बीज राई के दाने के आधे आकार में होते हैं। परन्तु इनसे उत्पन्न वृक्ष विशालतम रूप धारण करके सैकड़ों वर्षो तक खड़ा रहता है। पीपल की छाया बरगद से कम होती है। इसके पत्ते अधिक सुन्दर, कोमल, चिकने, चौड़े व लहरदार किनारे वाले होते हैं। बसंत ऋतु में इस पर धानी रंगकी नयी कोंपलें आने लगती है। बाद में, वह हरी और फिर गहरी हरी हो जाती हैं। पीपल के पत्ते जानवरों को चारे के रूप में खिलाये जाते हैं, विशेष रूप से हाथियों के लिए इन्हें उत्तम चारा माना जाता है। पीपल की लकड़ी ईंधन के काम आती है किंतु यह किसी इमारती काम या फर्नीचर के लिए अनुकूल नहीं होती। स्वास्थ्य के लिए पीपल को अति उपयोगी माना गया है। पीपल का वृक्ष हमें हमेशा कर्म करने की शिक्षा देता है। जब अन्य वृक्ष शांत हो पीपल की पत्तियों तब भी हिलती रहती है। इसके इस गतिशील प्रकृति के कारण इसे चल वृक्ष (चलपत्र) भी कहते हैं।
ऐतिहासिक उल्लेख
कहा जाता है कि चाणक्य के समय में सर्प विष के खतरे को निष्प्रभावित करने के उद्देश्य से जगह - जगह पर पीपल के पत्ते रखे जाते थे। पानी को शुद्ध करने के लिए जलपात्रों में अथवा जलाशयों में ताजे पीपल के पत्ते डालने की प्रथा अति प्राचीन है। कुएं के समीप पीपल का उगना आज भी शुभ माना जाता है। सिन्धु घाटी की खुदाई से प्राप्त मोहन-जोदड़ो की एक मुद्रा में पीपल वासी देवता पत्तियों से घिरे हुए हैं। मुद्रा में ऊपर पांच मानव आकृतियां हैं। कतिपय विद्वान् हड़प्पा सभ्यता को वैदिकनहीं मानते। मोहन-जोदड़ो की एक मुद्रा में पीपल पत्तियों के भीतर देवता हैं। हड़प्पा कालीन सिक्कों पर भी पीपल वृक्ष की आकृति देखनो को मिलती है। हड़प्पा मुद्रा की पांच मानव आकृतियां ऋग्वेद में वर्णित पांच जन हो सकती हैं। हड़प्पा सभ्यता में पीपल की छाया है और पीपल देवता हैं। [1]
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