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Showing posts from December, 2021

मोहनजोदड़ो में स्तूप

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मोहनजोदड़ो में स्तूप मोहनजोदड़ो में स्तूप से कुछ दूर दक्षिण में एल एरिया है। एल एरिया में एक विशाल भवन है। इस विशाल भवन की तुलना मार्शल ने बौद्ध विहार से की है, जिनमें बौद्ध भिक्षु लंबी पंक्ति में बैठते थे। मोहनजोदड़ो के इसी एल एरिया से गौतम बुद्ध जैसा वस्त्र पहने और उन्हीं की बैठने जैसी मुद्रा में एक मूर्ति मिली है। फिलहाल यह इस्लामाबाद म्यूजियम में रखी है। मूर्ति धूसर सिलखड़ी से बनी है। मूर्ति की कमर में चुन्नट वाला गौतम बुद्ध जैसा वस्त्र है। शरीर पर बौद्ध शैली का वस्त्र है, जिसमें वस्त्र को बाएँ कंधे पर रखा गया है और दायाँ कंधा मुक्त है। मूर्ति का दायाँ हाथ भूमि स्पर्श मुद्रा में है और यहीं भूमि स्पर्श मुद्रा आगे चलकर गौतम बुद्ध की भी थी। Tags :  row   Buddhist monk Buddhist vihara   building   L Area Mohenjodaro  

महामाया देवी की प्रतिमा

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महामाया देवी की प्रतिमा ब्रिटिश अंग्रेजो ने काल्पनिक सीता माता के मन्दिर को पुरातत्विक खुदाई से ठीक ठीक परीक्षण करके बताया कि यह बौद्ध विहार बुद्ध की माता महामाया देवी की प्रतिमा है। उसी प्रकार साकेत नगरी अयोध्या का पुरातत्विक खुदाई करके धिक-धिक परीक्षण किया जाय तो वह मौर्यकालीन बौद्ध विहार बुद्ध की प्रतिमा है। काल्पनिक राम नही है। 1865 ई० में जर्नल कन्नीघम ने श्रावस्ती के सहेट-महेट से पश्चिम में लगभग 9 मील की दूरी पर एक गांव टंडवा की पहचान बौद्ध अवशेषों के रूप में किया था। इस गांव में बुद्ध की माता महामाया देवी की प्रतिमा को (फ़ारसी, ईरानी, हिन्दुओ) द्वारा सीता माता के नाम से पूजा जाता था। टंडवा के चारदा किले के पास कई टीले और खंडहर है जिनकी खुदाई से निस्सन्देह यह सावित है कि यह बौद्ध विहार के समान मठ और स्तूप है। जहा पर बौद्धकालीन सिक्के भी प्राप्त है। General Cunningham and detailed in his Archeological report (Journal of Asiatic society of Bengal part-1, No- IV 1865) Gazetteer of Oudh W.C Bennett. Tags :  mother of Buddha   Mahamaya Devi Buddhi...

अमेरिका में बौद्ध सभ्यता

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अमेरिका में बौद्ध सभ्यता अमेरिका में बौद्ध सभ्यता! आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने अपनी पुस्तक "बुद्ध और बौद्ध धर्म "में प्रोफेसर फायरमेन के हवाले से बताया है कि 14 सौ साल पहले बौद्ध भिक्षु अमेरिका पहुँचे थे और वहाँ बौद्ध धर्म का प्रचार किए थे। चीन के प्राचीन ग्रंथों में जो " फुसम" नामक देश का वर्णन है ,वह मेक्सिको है। ह्वेनसांग ने लिखा है कि 5 वीं शती में सुंगवंशीय राजा थामिन के शासनकाल में 5 बौद्ध- भिक्षु काबुल से फुसम ( मेक्सिको ) गए थे और वहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म का प्रचार किए। आगे ह्वेनसांग ने फुसम देश के फल, धातु और आचार- विचार के बारे में लिखा है जो अमेरिका के मूल निवासियों तथा मेक्सिको की सीमा पर रहनेवाले लोगों से मिलता- जुलता है। चतुरसेन शास्त्री ने बताया है कि ये 5 बौद्ध- भिक्षु रूस की उत्तरी सीमा पर कामश्चारका प्रायद्वीप से पैसिफिक- महासागर को पार कर एलास्का की ओर से अमेरिका पहुँचे थे और फिर दक्षिण की ओर से मेक्सिको गए थे। इसीलिए मैक्सिको के मूल निवासियों की सभ्यता बौद्ध सभ्यता से मेल खाती है। मैक्सिको में पुरोहित को " ग्वाते- मोट- निज " कहते हैं, वह...

वैश्य पहाड़ी स्तूप उज्जैन मध्यप्रदेश में

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वैश्य पहाड़ी स्तूप उज्जैन मध्यप्रदेश में वैश्य पहाड़ी स्तूप उज्जैन मध्यप्रदेश में* ᐯᗩI T ᕼY ᗩT ᗴK ᗩI TT ᑌᑭᗩ ᑎᗴᗩ ᖇI, ᗰᑭ भगवान बुद्ध के समय में धम्म पूरे भारत में फैला था। मध्य प्रदेश कोई अपवाद नहीं था। भगवान बुद्ध के समय के बाद मध्यभारत में कई स्तूपों का निर्माण हुआ। जब सम्राट अशोक 19 वर्ष की आयु में उज्जयनी प्रांत (अवन्ति) के प्रमुख बने, तब उनका परिचय एक व्यापारी 'देवी' की पुत्री से हुआ, उम्र 15 वर्ष की आयु में पुत्र महेंद्र का विवाह होने के बाद उज्जैन में हुआ। दो साल बाद बेटी संघमित्रा का जन्म, 244 किलो आई 'देवी' मैं. सांची के पास विदिशा नगर में बसा हुआ जो दूर है। सम्राट अशोक की पहली पत्नी होते हुए भी राज्याभिषेक के अवसर पर पाटलिपुत्र नहीं गई और न ही कभी रानी बनकर हिलाया। इसी तरह बेटा महेन्द्र और बेटी संघमित्रा ने भी गद्दे पर अपना अधिकार कभी बादशाहों का वारिस नहीं बताया। 'देवी' बौद्ध आचार्यों की अच्छी अनुयायी थी और बच्चों पर भी अपनी रस्म अदा करती थी। वैश्य होने के कारण शायद उन्होंने उस समय के रीति-रिवाजों के अनुसार बच्चों को राजनीतिक रूप से सशक्त नहीं बनाया। ले...

शेषदात नाग

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शेषदात नाग शेषनाग का पूरा नाम शेषदात नाग था। उनके पूरे नाम की जानकारी हमें ब्रिटिश म्यूजियम में रखे सिक्कों से मिलती है। शेषनाग ने विदिशा को राजधानी बनाकर 110 ई.पू. में शेषनाग वंश की नींव डाली थी। शेषनाग की मृत्यु 20 सालों तक शासन करने के बाद 90 ई. पू. में हुई। उसके बाद उनके पुत्र भोगिन राजा हुए, जिनका शासन - काल 90 ई. पू. से 80 ई. पू. तक था। फिर चंद्राशु ( 80 ई. पू. - 50 ई. पू. ) , तब धम्मवर्म्मन ( 50 ई. पू. - 40 ई. पू. ) और आखिर में वंगर ( 40 ई. पू. - 31ई. पू. ) ने शेषनाग वंश की बागडोर संभाली। शेषनाग की चौथी पीढ़ी में वंगर थे। इस प्रकार शेषनाग वंश के कुल मिलाकर पाँच राजाओं ने कुल 80 सालों तक शासन किए। इन्हीं पाँच नाग राजाओं को पंचमुखी नाग के रूप में बतौर बुद्ध के रक्षक कन्हेरी की गुफाओं में दिखाया गया है। जिन बुद्ध की प्रतिमाओं के रक्षक सातमुखी नाग हैं, वे पंचमुखी नाग वाली प्रतिमाओं से कोई 350 साल बाद की हैं। Tags :  capital   Vidisha   British Museum information   Sheshdat Nag   Sheshnag

शिवलिंग वास्तव में बुद्धस्तुप

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शिवलिंग वास्तव में बुद्धस्तुप शिवलिंग वास्तव में शिवलिंग नहीं, बुद्धस्तुप है| Ulrich Wiesner ने दावे के साथ सिद्ध कर दिया है कि किस तरह बौद्धधर्म के मनौती स्तुपों को (votive Stupa को) शिवलिंग में परिवर्तित किया गया| Hodgson ने भी यह बताया है कि, बोधगया में महाबोधि महाविहार के उत्तर में स्थित बौद्ध चैत्यों को वहाँ के स्थानिक ब्राम्हणों ने चैत्यों के उपर का चुडामणी तोडकर उन्हें शिवलिंग में परिवर्तित कर दिया| (Hodgson, 1874:135-36) जनरल कनिंघम ने भी पुरातत्वीय संशोधन (Archeological research) के आधार पर यह बात सिद्ध कर दी है| (Cunningham, chapter 1, प. 66) अर्थात, लिखीत ग्रंथों के आधार पर और पुरातत्वीय संशोधन के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि, शिवलिंग वास्तव में बुद्धस्तुप है| शिवलिंग में शिव मतलब बुद्ध और लिंग मतलब स्तुप और दोनों शब्द मिलकर जो शिवलिंग शब्द बनता है, उसका अर्थ होता है बुद्धस्तुप| इसलिए अब भविष्य में शिवलिंग को शिवलिंग कहने की बजाय बुद्धस्तुप कहो| - बुद्धिस्ट इंटरनेशनल नेटवर्क Tags :  Shivling   Chittamani   Brahmins Buddhist Chaityas   Hodgson   Shiv...

आसनबद्ध ध्यान मुद्रा में हिंदू देवों के चित्रण की प्राचीनता!!!

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नास्तिकों के दावो का खंडन आसनबद्ध ध्यान मुद्रा में हिंदू देवों के चित्रण की प्राचीनता!!! By  Bhoot baba   -  July 20, 2021  आजकल नवबौद्धों ने एक हास्यास्पद सा सिद्धांत छेड़ रखा है कि जो भी आसन में ध्यान मुद्रा में दिखता है, उसे ही बुद्ध बताने लग जाते हैं। कुछ तो इतने आगे बढ़ गये हैं कि यदि किसी जगह आसन में देवी का चित्र भी हो तो उसे भी बुद्ध कहने से पीछे नहीं हटते हैं। ऐसे ही एक तथाकथित भाषा वैज्ञानिक ने तो परमारों की सुवर्ण मुद्रा पर बनी देवी की प्रतिमा को भी बुद्ध बता दिया था। आईए आगे बढ़ने से पहले हम उस मुद्रा का अवलोकन कर लेते हैं -  - Numismatic Digest vol 17, 1993, cover page  यहां आप देख सकते हैं कि आसन में विराजमान आकृति एक देवी की है। जिसमें स्पष्ट स्त्री लक्षण नजर आते हैं।  - Numismatics Digest vol 17, 1993, page no. 47  इस मुद्रा में एक तरफ विराजमान देवी हैं तथा दूसरी तरफ देवनागरी में शासक का नाम श्रीमन्नरवम्म अंकित है।  अब आप सोच सकते हैं जो व्यक्ति स्त्री लक्षणों को स्पष्ट देखकर भी चित्र को बुद्ध बता सकता है तो वह कितना सत्यवादी ...

बौद्धों ने उपोसथ व्रत दूसरे मतों से ग्रहण किया था!!!

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नास्तिकों के दावो का खंडन बौद्धों ने उपोसथ व्रत दूसरे मतों से ग्रहण किया था!!! By  Bhoot baba   -  August 08, 2021  नमस्ते साथियों!  लेख श्रृंखला के धीमे होने के कारण हम आपसे क्षमा की आशा करते हैं। आप सब लोग नव बौद्धों के मुह से आये दिन सुनते रहते हैं कि फलानि चीज हिंदुओं ने बौद्धों से चुराई थी। इसमें शिल्प, विद्या और काव्यों के अलावा यह लोग हिंदू त्यौहारों, पर्वों और व्रतों पर भी दावा ठोकते हैं, और कहते हैं कि यह हिंदुओं ने बौद्धों से चुराया था। लेकिन आप सब लोग तीक्ष्ण अनुसंधान करें तो आप सब लोग स्पष्ट देखेगें कि लोगों ने इनसे नहीं बल्कि ये सब बौद्ध लोगों ने दूसरे मतों, देशों से कुछ न कुछ लिया है। बस उन चीजों में थोडा परिवर्तन सा कर दिया। जैसे रोमन देव ज्युपिटर और वैदिक इंद्र को मिलाकर बौद्ध देव वज्रपाणि बना दिया। पारसी शासक दारा से स्तम्भों पर लेखांकन की कला ली आदि। इसी तरह अन्य भी चीजें बौद्धों ने दूसरे मतों से ग्रहण की थी। बुद्ध का जीवनचरित्र भी महावीर स्वामी की नकल या अनुकरण लगता है। इसी तरह एक महत्वपूर्ण व्रत है - उपोसथ यह आज पूर्णिमा, अष्टमी और प्रतिपदा आ...

क्या भर्हुत और सांचि के स्तूपों पर बनी गजों द्वारा जलाभिषेत देवी वाले फलक गजलक्ष्मी न हो कर मायादेवी हैं? (क्या लक्ष्मी प्रतिमायें मायादेवी की नकल हैं?)

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क्या भर्हुत और सांचि के स्तूपों पर बनी गजों द्वारा जलाभिषेत देवी वाले फलक गजलक्ष्मी न हो कर मायादेवी हैं? (क्या लक्ष्मी प्रतिमायें मायादेवी की नकल हैं?) By  Bhoot baba   -  August 12, 2021  नमस्तें! प्रिय पाठकों, आज हम आप सब के लिए एक महत्वपूर्ण विषय लेकर आ रहे हैं। यहां हम नवबौद्धों के एक और दावे की पडताल करेगें। यह दावा है कि भर्हुत और सांचि आदि स्तूपों पर बनी गजों द्वारा जलाभिषेत देवी के फलक गजलक्ष्मी नहीं है बल्कि मायादेवी है। मायादेवी से ही ब्राह्मणों ने लक्ष्मी को नकल किया था। यहां गजों द्वारा कुंभों से अभिषेक की हुई भर्हुत स्तूप पर बनी एक देवी का चित्रण देखा जा सकता है -  - South Asian Studies, 26.1, Page no. 78, fig.2  इस फलक में आप देख सकते हैं कि एक देवी एक कलश से निकलते कमल पर खडी है तथा दो हाथी उसका जल से भरे कलशों से अभिषेक कर रहे हैं। आजकल ऐसी प्रतिमायें हिंदुओं द्वारा गजलक्ष्मी की बनाई जाती है। इसी प्रतिमा के बारे में नवबौद्ध ऐसा दावा करते हैं कि यह प्रतिमा बुद्ध की माता मायादेवी की है। और गजलक्ष्मी या लक्ष्मी मायादेवी की नकल है। जबकि वास्तिव...