क्या भर्हुत और सांचि के स्तूपों पर बनी गजों द्वारा जलाभिषेत देवी वाले फलक गजलक्ष्मी न हो कर मायादेवी हैं? (क्या लक्ष्मी प्रतिमायें मायादेवी की नकल हैं?)

क्या भर्हुत और सांचि के स्तूपों पर बनी गजों द्वारा जलाभिषेत देवी वाले फलक गजलक्ष्मी न हो कर मायादेवी हैं? (क्या लक्ष्मी प्रतिमायें मायादेवी की नकल हैं?)

 

 नमस्तें! प्रिय पाठकों, आज हम आप सब के लिए एक महत्वपूर्ण विषय लेकर आ रहे हैं। यहां हम नवबौद्धों के एक और दावे की पडताल करेगें। यह दावा है कि भर्हुत और सांचि आदि स्तूपों पर बनी गजों द्वारा जलाभिषेत देवी के फलक गजलक्ष्मी नहीं है बल्कि मायादेवी है। मायादेवी से ही ब्राह्मणों ने लक्ष्मी को नकल किया था। यहां गजों द्वारा कुंभों से अभिषेक की हुई भर्हुत स्तूप पर बनी एक देवी का चित्रण देखा जा सकता है - 


- South Asian Studies, 26.1, Page no. 78, fig.2 

इस फलक में आप देख सकते हैं कि एक देवी एक कलश से निकलते कमल पर खडी है तथा दो हाथी उसका जल से भरे कलशों से अभिषेक कर रहे हैं। आजकल ऐसी प्रतिमायें हिंदुओं द्वारा गजलक्ष्मी की बनाई जाती है। इसी प्रतिमा के बारे में नवबौद्ध ऐसा दावा करते हैं कि यह प्रतिमा बुद्ध की माता मायादेवी की है। और गजलक्ष्मी या लक्ष्मी मायादेवी की नकल है। जबकि वास्तिवकता यह है कि लक्ष्मी या गजलक्ष्मी का चित्रण इन स्तूपों से पहले भारतीयों में प्रचलित था जो कि भारत में लक्ष्मी पूजन अथवा लक्ष्मी प्रतिमाओं के स्वतंत्र अस्तित्व को प्रकट करता है। लक्ष्मी को हिंदुओं के वैदिक, शाक्तों और वैष्णवों में धन ऐश्वर्य की देवी के रूप में स्थान प्राप्त हुआ है। वेदों की आश्वलायनशाखा की ऋग्वेद संहिता के श्रीसूक्त में श्री, लक्ष्मी नाम से धन के प्रतीक के रूप में देवी का उल्लेख प्राप्त होता है - 


- आश्वलायनशाखीय ऋग्वेदसंहिता 5.6.88

यहां तक की बौद्धों के मान्य ग्रंथ त्रिपिटक में भी ऐश्वर्य की देवी के रूप में श्री (लक्ष्मी) देवी का उल्लेख प्राप्त होता है, जिसके आह्वान का बुद्ध ने विरोध भी किया था। 


- महासीलं 26, ब्रह्मजालसुत्तं 1, सीलक्खन्धवग्गपालि, दीघनिकायो, सुत्तपिटक

यहां पालि में सिरिव्हायनं (संस्कृत - श्री आह्वान) इस सुत्त के  अंग्रेजी अनुवाद में भी goddess of luck लिखा है।


-  3 The long Section on Virtue (Mahasila) 26, Brahmajala Sutta: The All - embracing Net of Views, Digha Nikaya, Tiptaka

https://www.accesstoinsight.org/tipitaka/dn/dn.01.0.bodh.html

इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि भारतीय जनमानस में प्राचीनकाल से लेकर ही धन, ऐश्वर्य तथा भाग्य की प्रतीकात्मक देवी के रूप मे श्री लक्ष्मी की स्वतंत्र मान्यता थी। न केवल ग्रंथों और साहित्यों अपितु प्राचीन मृणशिल्पों, फलकों और मुद्राओं पर भी लक्ष्मी देवी का चित्रण था - 


- Classical Numismatic Gallery, Auction 5, lot no. 289 

कोशाम्बी से प्राप्त यह सिक्का 200 ईसापूर्व प्राचीन है तथा इस पर गजलक्ष्मी का चित्रण है। 

 
- Classical Numismatic Gallery, Auction 7, lot no. 12 

इस केटालाॅग में प्रकाशित 5 सिक्कों के एक समूह में गजलक्ष्मी के चित्रण वाला सिक्का भी है। यह लगभग 200 से 150 ईसापूर्व प्राचीन है। 


- Marudhar Arts, Auction #37, lot no. 59

विदर्भ जनपद से प्राप्त यह सिक्के एक शताब्दी ईसापूर्व प्राचीन है, इन सिक्कों पर भी गजलक्ष्मी का चित्रण है। 
- Classical Numismatic Gallery, Auction 21, lot no. 108
ये सिक्का कटहादी नामक किसी शासक का है। लगभग 200 - 100 ईसापूर्व प्राचीन इस सिक्के पर गज लक्ष्मी का अंकन देखा जा सकता है। 

इन सिक्कों के अलावा भी अन्य सैकडों ऐसे सिक्के हैं जिन पर गजलक्ष्मी का चित्रण है किंतु स्थानाभाव के कारण हमने उदाहरण रुप में कुछ ही सिक्कों को आपको दिखाया है। इस प्रकार सिक्कों पर गजलक्ष्मी का चित्रण स्पष्ट करता है कि गजलक्ष्मी का प्राचीन भारतीय जनमानस में धन और भाग्य की प्रतीकात्मक देवी के रूप में अत्यन्त महत्व था, इसकारण धन अर्थात् मुद्राओं पर भी देवी का चित्रण होने लगा था। 

गजलक्ष्मी प्रतिमा का उल्लेख हमें अग्निपुराण में भी प्राप्त होता है - 


-  अग्निपुराणम् 42.21

यहां लक्ष्मी देवी का चित्रण दो गजों द्वारा कलशों से स्नान कराते हुए तथा हाथ में कमल लिये हुए बनाये जाने का उल्लेख है। गज लक्ष्मी के विभिन्न स्थानों से कुछ टेराकोटा भी प्राप्त होते हैं जो कि स्तूपों के समकालीन तथा प्राचीन भी है। यहां कुछ टेराकोटा के चित्र हम उदाहरण स्वरुप प्रस्तुत करते हैं - 

- Indian Journal Of Archaeology, Vol 2, No. 2, fig. 197, page no. 184

यह टेराकोटा 200 ईसापूर्व प्राचीन शुंगकालीन है तथा यह मथूरा संग्रहालय में सुरक्षित है। 

- Indian Journal Of Archaeology, Vol 2, No. 2, fig. 195, page no. 182 

यह टेराकोटा भी गजलक्ष्मी का है तथा यह 100 ईसापूर्व प्राचीन है और संकिसा नामक स्थान से प्राप्त हुआ था। इस समय यह ईलाहबाद संग्रहालय में सुरक्षित है। 

- Indian Journal Of Archaeology, Vol 2, No. 2, fig. 204, page no. 188

यह फलक कुषाणकालीन है तथा मथूरा से प्राप्त हुआ था। यह लखनऊ संग्रहालय में सुरक्षित है। 

- Indian Journal Of Archaeology, Vol 2, No.3, fig. 121, page no. 175

यह टेराकोटा शुंग कालीन है तथा कुशीनगर संग्रहालय में रखा हुआ है। 


- Indian Journal Of Archaeology, Vol. 6, No.3, fig. 94, page no. 184

यह एक शील है जो कि 200 - 100 ईसापूर्व प्राचीन है। इसमें गजलक्ष्मी का चित्रण है। यह प्रयागराज से प्राप्त हुई थी। और ईलाहबाद संग्रहालय में है। 


- प्राचीन भारत में लक्ष्मी प्रतिमा (एक अध्ययन), फलक संख्या 10 (ख)

यह फलक कोशाम्बी से प्राप्त एक शताब्दी ईस्वी पूर्व प्राचीन है। इस फलक पर पहले गज लक्ष्मी, नंदी, स्वस्तिक तथा कुबैर व मगरमच्छ बने हुए है। यह शुभ चिह्नों का एक समूह भी है। 

- Yaksas Part II, Plate no. 48, fig. no. 3

यह स्तम्भ कानपुर जिले से प्राप्त हुआ था। यह लगभग 100 ईसापूर्व प्राचीन है। इस पर भी गजलक्ष्मी का चित्रण है। 
आर्केलोजिकल सर्वे ओफ इंडिया की 1929 - 30 की रिपोर्ट में भी इसी स्तम्भ के चित्र का विस्तृत प्रकाशन हुआ था। यह कानपुर के लालाभगत नामक स्थान से प्राप्त हुआ था। आप विस्तृत चित्र भी देखें - 
- Annual Report Of The Archaeological Survey Of India 1929 - 30, Plate no. XXXI, fig no. (a - g) 

यहां आप देख सकते हैं कि स्तम्भ पर गजलक्ष्मी के साथ - साथ विभिन्न आकृतियाँ भी हैं जैसे - सूर्य देव और उनका रथ, सूर्य देव की तीन पत्नियां ऊषा, प्रत्युषा और छाया। इसके बाद मयूर तथा नीचे की ओर गजलक्ष्मी का चित्रण है। गजलक्ष्मी के समीप ही कुक्कुट स्तम्भ है। स्तम्भ पर मयूर जो कि कार्तिकेय जी का वाहन है तथा कुक्कुट जो कि कार्तिकेय जी का ध्वज स्तम्भ है, इनका ही चित्रण प्रतीत होता है। स्तम्भ पर एक ब्राह्मी लेख भी है, जो इस प्रकार है - "कुमारो... " 
अत: सूर्य देव तथा कार्तिकेय के वाहन और कुक्कुट ध्वज के चित्रांकन के साथ गजलक्ष्मी का चित्रण होना इस बात को सिद्ध करता है कि यह स्तम्भ तथा इस पर चित्रित गजलक्ष्मी का सम्बन्ध हिंदू परम्पराओं से है। 


इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि लक्ष्मी देवी अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व प्राचीन काल से ही रखती थी तथा भारतीयों में अत्यन्त प्रसिद्ध थी। उन्हें शुभलक्षणों जैसे स्वस्तिक, श्रीवत्स तथा नंदीपदम् की तरह ही एक शुभ चिह्न भी माना जाता था। इतना ही नहीं लक्ष्मी जी के अपने पृथक पूज्य चैत्य भी थे। इसका प्रमाण हमें अगरा गणों के सिक्कों पर भी प्राप्त होता है - 

- Tribal coins of Ancient India, page no. 9 

यहां अगरा गणों के एक प्राचीन सिक्के का रेखाचित्र दिया हुआ है। लगभग 100 ईसापूर्व प्राचीन इस सिक्के पर एक पंचकक्षीय चैत्य के ऊपर खडी गजलक्ष्मी को दर्शाया गया है। इसका वास्तिव चित्र भी आप देख सकते हैं - 



- Tribal coins of Ancient India, Pl. IV, Agra coin 3

इस सिक्के पर श्री लक्ष्मी को एक चैत्य पर दर्शया गया है तथा उनके हाथों में पुष्प है। दो हाथी उनका अभिषेक कर रहे हैं। इस सिक्के से हमें यह संकेत प्राप्त होता है कि श्री लक्ष्मी देवी के स्वतंत्र चैत्यों (पूजास्थलों) का निर्माण प्राचीन काल में होता था। 

(चैत्य विषय पर ब्लाग की पिछली पोस्ट अवश्य पढें) 

गजलक्ष्मी प्रतिमा से पृथक श्री लक्ष्मी की हाथों में पुष्प लिये हुए भी प्रतिमा प्राप्त होती है। श्री लक्ष्मी का बिना गजों के स्वतंत्र चित्रण भी हमें प्राचीन सिक्कों और कलाओं में प्राप्त होता है। यहां कुछ उदाहरण भी देते हैं - 

- Indian Journal Of Archaeology, Vol 2, No. 2, fig 196, page no. 183

यह शिल्प ईलाहबाद संग्रहालय में है। यह शुंगकालीन है तथा श्रीलक्ष्मी को हाथ में कमल लेते हुए दिखाया गया है। 

- Indian Journal Of Archaeology Vol. 4 No. 2, fig. 9, page no. 45

यह शिल्प बुद्ध संग्रहालय गोरखपुर में है। इसमें श्री देवी को हाथ में पुष्प सहित दर्शाया तथा यह भी शुंगकालीन है। 

कुछ प्राचीन सिक्कों में भी लक्ष्मी का पुष्प सहित चित्रण मिलता है - 



- Tribal coins of Ancient India, Pl. XIV, Kunind Coins 1-2 

कुणिद गण के इस सिक्के पर लक्ष्मी देवी को हाथ में पुष्प लिये हुए, एक हिरण के समक्ष खडा हुआ दिखाया है। इस गण के सिक्के लगभग (200 -100) ईसापूर्व प्राचीन है। 


- Imperial Auctions 17, lot no. 4 

100 ईसापूर्व प्राचीन राजन्य गणों के इन सिक्कों पर लक्ष्मी जी को दायें हाथ में कमल पकडे हुए दर्शाया गया है। 

-  South Asian Studies, 26.1, fig. 3, page no. 79 

यह फलक सांचि के स्तूप से है, यहां श्री लक्ष्मी जी हाथ में कमल लिए हुए तथा नीचे की तरफ सम्भवतः कुबेर जी को दर्शाया है। लक्ष्मी के दूसरी तरफ एक स्त्री को दर्शाया है जो कि हाथ में एक थाली लिये खडी है, इस थाली में देवी का प्रसाद या धनादि है! वैसे तो सांचि के इसी चित्रण से पता चल जाता है कि स्तूप पर आयी प्रतिमा मायादेवी की न होकर लक्ष्मी जी की है। क्योंकि लक्ष्मीजी को सौभाग्य, धनादि का प्रतीक मानकर शुभ लाक्षणों ( इंद्रध्वज, सूर्य, श्रीवत्स, नंदीपाद, स्वस्तिक, अंकुश, कलश, यूप, नांदावर्त) में गणना होने लगी थी। 

अब कुछ यह भी प्रश्न कर सकते हैं कि हाथों में पुष्प लिये देवी लक्ष्मी जी ही हैं, इसके और क्या पुष्ट प्रमाण हैं। इसके लिए हम पाठकों को कुछ और चित्र दिखाते हैं, जिनमें हाथ में पुष्प लिये देवी कहीं पर कुबेर जी के साथ, कहीं पर विष्णु, अर्द्धनारेश्वर और कुबेर के साथ, तो कहीं गणेश व कुबेर के मध्य में है। 
- Indian Journal Of Archaeology, Vol 2, No. 2, fig. 203, page no. 188

यह मथूरा संग्रहालय में सुरक्षित तथा कुषाणकालीन है। यहां पुष्प हाथ में लिये मध्य में एक देवी है तथा देवी के बांए तरफ कुबैर जी और दायें तरफ एक अन्य देवी है। हम जानते हैं कि यक्षों का सम्बन्ध धन से जोडा जाता है और धन की देवी लक्ष्मी जी होने के कारण उन्हें यक्षों की भी अधिष्ठात्री देवी माना जा सकता है। इसी कारण उनका चित्रण धन के यक्षदेवता कुबैर जी के साथ हुआ है। 

-   Indian Journal Of Archaeology, Vol. 5 No. 1, fig. 340, Page no. 509 

यह प्रतिमा पश्च कुषाण कालीन (300 ईस्वी) की है और राजकीय संग्रहालय लखनऊ में है। इस प्रतिमा में मध्य में श्री लक्ष्मी जी हाथ में पुष्प लिये तथा एक तरफ नीचे की ओर श्री कुबैर जी है। 
इसी प्रकार की एक प्रतिमा मथुरा के जन्मस्थान से भी प्राप्त हुई थी - 

- The Splendour Of Mathura Art & Museum, fig. no. 37, page no. 112

उपरोक्त प्रतिमा के समान इसमें भी लक्ष्मी जी पुष्प धारण किये है। बस यहां नीचे की तरफ हारीति और कुबेर के स्थान पर दो पूजक हैं। जो कि देवी के समक्ष हाथ जोडकर खडे हैं। 



- East and West, Vol 39, No. 1/4 (December 1989), fig. 14, page no. 141

यह फलक राजकीय संग्रहालय लखनऊ में स्थित है। इसमें एक बडे आसन पर देवी लक्ष्मी जी को दर्शाया है तथा दायें तरफ कुबैर जी है। चित्र में बायीं ओर कुछ व्यक्ति हाथ जोडे खडे हैं। यह फलक कुषाणकालीन है। इस फलक के प्रमाण से देवी लक्ष्मी की पूजा का भी प्रमाण मिलता है। उनका स्वतंत्र रूप से जनमानस में पूजन इस फलक से सिद्ध होता है। 


-  South Asian Studies, 12.1, fig. 1, Page no. 40

यह फलक 5 शताब्दी का है तथा राष्ट्रीय संग्रहालय बांग्लादेश में है। इस फलक में लक्ष्मी जी को मध्य में दर्शाया गया है। लक्ष्मी जी का दो गज अभिषेक भी कर रहे हैं। तथा बायीं तरफ गणेश जी और दायीं तरफ कुबेर जी को दिखाया है। ऐसा चित्रण आजकल हिंदू दीपावली के समय भी करते हैं। अतः उपरोक्त सभी प्रतिमाओं के लक्ष्मी होने में कोई संदेह शेष नहीं रहता है। 

उपरोक्त गणेश, कुबेर और लक्ष्मी की सह प्रतिमा से प्राचीन अन्य प्रतिमा मथूरा से प्राप्त हुई है - 
Mathura Sculpture: a catalogue of sculptures of mathura school in the Indian museum, Kolkata, Plate no.  xix

यह प्रतिमा मथूरा से प्राप्त हुई थी और आज कलकत्ता राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है। यह कुषाण कालीन लगभग दूसरी या तीसरी सदी ईस्वी प्राचीन है। इसमें भी गज लक्ष्मी को गणेश और कुबेर के साथ दर्शाया है, जैसा कि आज दीपावली पर हिंदूओं द्वारा पूजन किया जाता है। 

- Indian Journal Of Archaeology, Vol 2, No. 2, fig. 202, Page no. 187 

कुषाणकालीन यह फलक मथूरा संग्रहालय में है। इस फलक में श्री लक्ष्मी जी के साथ - साथ अर्द्धनारेश्वर, श्री विष्णु जी और कुबैर जी भी है। 


- Rajgors, Auction 6, lot no. 9 

यह सिक्का पूर्व सातवाहन कालीन है तथा इस पर ब्राह्मी में राञो... लिखा है। इस सिक्के पर श्री विष्णु जी का अंकन चक्र सहित है तथा दूसरी तरफ श्री लक्ष्मी जी का भी चित्रण है। इस सिक्के के प्रमाण से यह स्पष्ट है कि लक्ष्मी जी का चित्रण अत्यन्त प्राचीन है तथा यह मायादेवी की नकल नहीं है। 
इस विषय में एक और अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण इस चित्र में देखिये - 

- Indian Journal Of Archaeology, Vol. 3, No. 3, fig. 17, Page no. 61 

यह सभी टेराकोटा एक साथ कन्नौज जिले से प्राप्त हुए थे। ये सभी शुंगकालीन है। इनमें से एक टेराकोटा गजलक्ष्मी का है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गजलक्ष्मी के साथ - साथ यहां एक टेराकोटा श्री विष्णु जी का भी प्राप्त हुआ है। यह बात इसी पत्रिका में भी सूचित की गई है - 



-  Indian Journal Of Archaeology, Vol. 3, No. 3, Page no. 61

इस प्रमाण से श्री लक्ष्मी जी को मायादेवी जी की नकल बताने वाला दावा पूरी तरह से धूल में मिल जाता है क्योंकि यह फलक भी स्तूपों के समान ही शुंग कालीन है तथा इनके साथ यहां श्री विष्णु जी का भी टेराकोटा मिला है जो कि गजलक्ष्मी चित्रण की हिंदू मान्यताओं को प्राचीन सिद्ध करता है। 

अब इन सब प्रमाणों को ध्यान में रखते हुए हम लेख में सर्वप्रथम दिखाये गये भर्हुत स्तूप के चित्र की ओर एक बार पुनः देखते हैं। यह चित्र श्री लक्ष्मी जी ही है, न कि मायादेवी क्योंकि इसमें पूजनीय आकृति एक कलश पर खडी है, इस कलश से कमल के पुष्प भी निकल रहे हैं। इस प्रकार के कलश को पूर्णघट या पूर्णकुम्भ कहते हैं। जिसका सम्बन्ध श्री लक्ष्मी जी से है। पूर्णघट का भी प्राचीन काल में चित्रण होता था। जिसके प्रमाण कोशाम्बी, मथूरा, गांधार आदि प्राचीन स्थानों पर मिल जायेगें। यहां उदाहरण के लिए पूर्णघट का एक मुद्रा पर बने चित्रण को प्रस्तुत करते हैं - 

- South Asian Studies, 26.1, fig. 14, Page no. 86

यह पूर्णघट की मुद्रा अमन उर रहमान के निजि संग्रह में है। इसकी प्राचीनता अज्ञात है तथापि यह कुषाणकालीन हो सकती है। इस तरह पत्तियों, पुष्प अथवा छोटी - छोटी कलियां लगे हुए कलशों की स्थापना आज भी हिंदुओं में अनेकों पर्वों, पूजाओं और व्रतों में होती है। विशेष रूप से लक्ष्मी पूजा के संदर्भ में। अतः भर्हुत स्तूप के फलक पर बनी देवी गजलक्ष्मी है और वे पूर्णघट के ऊपर खडी हैँ। 

श्री लक्ष्मी जी एक और अत्यन्त सुंदर टेराकोटा भी हम आपको दिखाते हैं - 

 


- John Sindumak Asian Art (Indian And Himalayan Sculpture) Catalogue No. 5, fig. 10, page no. 14 - 15 

यह टेराकोटा चंद्रकेतु गढ से प्राप्त हुआ था। यह 100 ईसापूर्व प्राचीन है। इस टेराकोटा में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इसमें श्री लक्ष्मी जी को धन की देवी के रूप में दिखाया गया है। देवी को एक कलश के ऊपर खडा किया गया है। जो कि पूर्णघट है। देवी के हाथ में धन से भरी एक कपडे पोटली भी है। देवी के सामने एक याचक भी है जिसके हाथों में एक टोकरी है। देवी इस याचक को टोकरी में धन प्रदान कर रही है। यह सब विवरण इस फलक में देखे जा सकते हैं। फलक में देवी के चारों तरफ गोल और चोकौर आकृति से सजावट की गई है। सम्भवतः ये सिक्के हो सकते हैं। अतः धन की देवी के रूप में तथा धन, सौभाग्य की कामना के लिए श्री लक्ष्मी जी का पूजन प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध था। 
मुर्ति, फलक, सिक्कों और ग्रंथों से लक्ष्मी जी के प्रमाण के बाद अब हम लक्ष्मी जी अर्थात् श्री का प्रमाण एक प्राचीन अभिलेख से भी देख लेते हैं - 
- History Of Early Stone Sculpture At Mathura, CA. 150 BCE - 100 CE, fig. no. 216

 इसका रोमन रुपांतरण तथा अनुवाद भी देखिये - 

-      -History Of Early Stone Sculpture At Mathura, CA. 150 BCE - 100 CE,  Page no. 259

यह अभिलेख मिरजापुर मथूरा से प्राप्त हुआ था तथा इस समय यह अभिलेख मथूरा संग्रहालय में है। इस अभिलेख में शोडाष के समय शेग्रवा गोत्र के एक ब्राह्मण द्वारा "श्री" अर्थात् लक्ष्मी प्रतिमा स्थापित करने का वर्णन मिलता है। यहां हमने मूल अभिलेख में "ब्राह्मण" और "शिरी" शब्द को प्रमुखता से दर्शाया है। 
इस पूर्व कुषाणकालीन अभिलेख के प्रमाण के पश्चात् कोई संदेह शेष ही नहीं रहता कि "श्री" अर्थात् लक्ष्मी जी प्राचीन काल से ही हिंदुओं में पूजनीय थी और उनकी पृथक् प्रतिमायें भी बना करती थी। 

अतः निष्कर्ष प्राप्त होता है कि स्तूपों पर बनी प्रतिमाऐं गजलक्ष्मी ही है। जिस तरह बौद्धों ने स्तूपों और विहारों पर इंद्र, कुबैर, यक्षों, अप्सराओं और नागों का चित्रण किया था उसी तरह भारतीयों से लेकर शुभ चिह्न के रूप में श्री लक्ष्मी का भी चित्रण किया था।
यहां एक प्रश्न भी उठ सकता है कि जब बुद्ध ने देवी के आव्हान को मना कर दिया था तब स्तूपों पर चित्रण कैसे हो गया? 
इसका उत्तर यही है कि जैसे बुद्ध प्रतिमा आरम्भ में नहीं बना करती थी लेकिन बाद में बनने लगी और अनेकों नये देवता भी बोधिसत्व नाम पर कल्पित होने लगे थे, उसी प्रकार से लक्ष्मी को भी बौद्धों ने अपना लिया होगा। इसका हल्का आभास अशोक के शिलालेखों से हो जाता है। 
- भारतीय पुरालेखों का अध्ययन, पेज नं. 117

इन पंक्तियों के अर्थों में अत्यंत मतभेद है किंतु प्रसिद्ध विद्वान वासुदेव शरण अग्रवाल जी के अनुसार इन पंक्तियों का तात्पर्य निम्न प्रकार है - 
- वासुदेव शरण अग्रवाल : रचना - संचयन, (हिंदी खंड), भाग - 5 कला, पृ.सं. 541

यदि वासुदेव शरण अग्रवाल जी का निष्कर्ष सटीक है तो हम समझ सकते हैं कि लगभग अशोक के समय से कुछ लोकदेवों को भी बौद्धों ने अपने मत में लेना शुरू कर दिया था जिनमें इंद्र, लक्ष्मी, यक्ष, नागादि प्रमुख हैं। ये अपने मत में लोगों को आकर्षित करने और लोक मान्यताओं में ढलने के लिए एक कारगर कदम था। 
 
लेकिन अब भी कोई हठधर्मिता के कारण चित्रण को मायादेवी ही कहना चाहता है तो हम ऊपर सिद्ध कर चुके हैं कि स्तूपों से प्राचीन तथा समकालीन समय में भी लक्ष्मी जी का गजलक्ष्मी और धनदेवी के रूप में चित्रण होता था, उनके स्वतंत्र पूजा स्थल भी थे। उनको विष्णु, गणेश तथा कुबैर के साथ भी बनाया जाता था। इसीलिए श्री लक्ष्मी जी का मायादेवी से स्वतंत्र प्राचीन अस्तित्व सिद्ध होता है। सौभाग्य और धन की देवी के रूप में लक्ष्मी की प्रतिमाओं का निर्माण स्वतंत्र रूप से बौद्ध स्तूपों से प्राचीन व समकालीन है। 
इससे हमने श्री लक्ष्मी को बौद्धों से पृथक एक स्वतंत्र देवी के रूप में प्रस्तुत किया है। अतः श्री लक्ष्मी मायादेवी की नकल नही है। अगर कोई हठपूर्वक स्तूपों पर बनी गजलक्ष्मी को मायादेवी बताना ही चाहता है तो उसे यह मानना चाहिए कि गजलक्ष्मी की नकल करके स्तूपों पर मायादेवी को कलश पर विराजमान और गजों द्वारा जलाभिषेक करते हुए दर्शाया है। क्योंकि गजलक्ष्मी का चित्रण सिक्कों, टेराकोटा पर बौद्ध स्तूपों से प्राचीन काल में होने लगा था तथा कन्नौज से प्राप्त विष्णु प्रतिमा इस बात को सिद्ध करती है। 

संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें - 
1) South Asian Studies, 26.1

2)  आश्वलायनशाखीय ऋग्वेदसंहिता (प्रथमो भागः) - सम्पादक व्रजबिहारी चौबे 

3) दीघनिकायो, सुत्तपिटक, ब्रह्मजाल सुत्त - पालि त्रिपिटक साईट से 

4) The long Section on Virtue (Mahasila) 26, Brahmajala Sutta: The All - embracing Net of Views, Digha Nikaya, Tiptaka - Eng. Trans. Bhikku Bodhi 

5) Classical Numismatic Gallery, Auction 5

6)  Classical Numismatic Gallery, Auction 7

7) Marudhar Arts, Auction #37

8) अग्निपुराणम् - अनु. आचार्य शिवप्रसाद द्विवेदी 

9)  Indian Journal Of Archaeology, Vol 2, No. 2

10) Indian Journal Of Archaeology, Vol 2, No.3

11)  Indian Journal Of Archaeology, Vol. 6, No.3

12) प्राचीन भारत में लक्ष्मी प्रतिमा (एक अध्ययन) - डाक्टर राय गोविन्द्रचन्द्र 

13)  Tribal coins of Ancient India - Devendra Handa 

14) Indian Journal Of Archaeology Vol. 4 No. 2

15)  Imperial Auctions 17

16) Indian Journal Of Archaeology, Vol. 5 No. 1

17) East and West, Vol 39, No. 1/4 (December 1989)

18)  South Asian Studies, 12.1

19) Asian Art (Indian And Himalayan Sculpture) Catalogue No. 5 -  John Sindumak 

20)  Indian Journal Of Archaeology, Vol. 3, No. 3 

21)  Rajgors, Auction 6

22) Classical Numismatic Gallery, Auction 21

23) Yaksas Part II - Ananda K. Coomaraswamy 

24) Annual Report Of The Archaeological Survey Of India 1929 - 30

25) History Of Early Stone Sculpture At Mathura, CA. 150 BCE - 100 CE - Sonya Rhie Quintanilla 

26) भारतीय पुरालेखों का अध्ययन - डॉ. शिवस्वरूप सहाय

27) वासुदेव शरण अग्रवाल : रचना - संचयन (हिंदी खंड) - संपादन कपिला वात्स्यायन 

28) Mathura Sculpture: a catalogue of sculptures of mathura school in the Indian museum, Kolkata - Mangala Chakrabarti

29) The Splendour Of Mathura Art & Museum -
   R. C. Sharma

तथाकथित संस्कृत भाषा और उसमें लिखे गपोड ग्रंथ १००० साल भी पुराणे नहीं है। संस्कृत भाषा का पुरातत्वीय शास्त्र (Archeology) के अनुसार १००० साल पुरानी होने का कोई सबूत उपलब्ध नहीं है। सारे संस्कृत ग्रंथ मुस्लिम शासको और अंग्रे जों के शासन काळ में ही लिखे गये है, इसमें दोराहे नहीं है।

अबे सालो तुम लोग इतनी सफाई से केसे झूट बोल लेते हो बे। Asi अपनी वेबसाइट पर खुद लिखता है की हाथीबाड़ा का संस्कृत अभिलेख दूसरी सदी ईसा पूर्व का है और तुम गपोड़ी कहते हो की १००० साल sw पहला का कुछ भी नही मिला। शर्म नही आती इतना झूट बोलने में। 

अबे तेरी तोतली पाली का पिछले २००० छोड़ १००० साल में कितने प्रमाण मिले हे वोह बोल। इसमें सारे ग्रंथ मुस्लिम शासको और अंग्रेजों के शासन काल में लिखे गए हे। दोराह तो इसमें नही हे।


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 7:09 AM
"अबे सालो" ऐसा लिखने से आप मनुवादी लोगों की असली संस्कृति उजागर हो रही है । थोडी भी तमीज होती तो इस प्रकार लिखने का साहस नहीं करते । झूठा इतिहास परोसकर अब तक बेचारे भारतीयों को ठगते / लुटते / गुमाराह करते आये हो, अब सब सच बाहर आ रहा है, तथाकथित ब्राह्मण लोगों की पोल खुल रही है, अब ये षडयंत्र जादा दिन तक नहीं चलने वाला है, ब्राह्मण लोगों का झूठा इतिहास ध्वस्त होने में जादा व्यक्त नहीं लगने वाला है । 

पढलो किताब :
१) बुद्धिजीवियों का षडयंत्र, लेखक : राजीव पटेल 
लिंक: https://www.amazon.in/-/hi/Rajeev-Patel-Sanjay-Kumar-Singh/dp/B08Y76339M/ref=sr_1_6?dchild=1&keywords=%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82+%E0%A4%95%E0%A4%BE+%E0%A4%B7%E0%A4%A1%E0%A4%AF%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&qid=1629209190&s=books&sr=1-6


2) भ्रम का पुलिंदा किताब, लेखक : राजीव पटेल
लिंक: https://www.amazon.in/-/hi/Rajeev-Patel/dp/B094R3KL37/ref=sr_1_1?dchild=1&keywords=%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE+%E0%A4%95%E0%A4%BE+%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE&qid=1629209044&s=books&sr=1-1


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Alok SahuAugust 17, 2021 at 6:12 PM
अबे सालो भीमतों पहली अपनी दो कौड़ी का ज्ञान अपने पास रख। अबे विकास भासा का ज्ञान कौन दे रहा हे बे तू। चल हट बे। लोगो को गुमराह, ठगना लूटना तो तुम लोगो को धंधा हे बे। पोल तो तुम नव बौद्ध लोगो की खुल चुकी है। सत्य बर्दास्त करने में फट रही हे तुम लोगो की जिससे नव बौद्धों की नीद udi हुई हे।


Alok SahuAugust 17, 2021 at 6:46 PM
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Alok SahuAugust 17, 2021 at 6:48 PM
तू पढ़ ले किताब:
१) साक्षी है समय, लेखक: राजीव रंजन प्रसाद
लिंक:
https://www.google.com/url?sa=t&source=web&rct=j&url=https://www.amazon.in/Sakshi-Hai-Samaya-Ashwathama-Saath/dp/9381490244&ved=2ahUKEwjAmbDquLnyAhXPzjgGHUp6AacQFnoECAQQAQ&usg=AOvVaw3rFLBYImsavj70zcDtZTDo&cshid=1629251238613

२) भारतीय संस्कृती के पुरातात्विक आधर, लेखक: गोवर्धन राय शर्मा
लिंक:
https://www.exoticindiaart.com/book/details/archaeological-foundation-of-indian-culture-old-rare-book-nzt878/




Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:15 AM
🎯102 | बुद्ध, वेदो की निंदा करते थे या प्रचार? Buddha and Veda Conspiracy | Science Journey

https://www.youtube.com/watch?v=-nRYFINfKG4

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Alok SahuAugust 17, 2021 at 6:25 PM
#gautambodh science journey exposed/तथागत अजीत exposed 

https://youtu.be/UyWqm-4ZdRU


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:16 AM
🎯103 | Truth of Animal Sacrifices in Vedas, वेदो में मांसाहार का सच PART1, वेदो में पशुबलि ?

https://www.youtube.com/watch?v=I3McxQNLBnI

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Alok SahuAugust 17, 2021 at 6:13 PM
*वेदों में माँसाहार? भाग-१ Flesh eating in Vedas? Part-1*



https://youtu.be/CFVOqLTaymM

कई लोग सोशल मीडिया में वेदों पर माँसाहार का आरोप लगाते हैं।उसमें से एक Science journey नामक चैनल भी। इस वीडियो मे उसी से जुड़े आक्षेपों का जवाब दिया गया है। क्या वेद कुत्ते की आँत खाने का विधान करता है? क्या इंद्रदेव बैल खाते थे? इस वीडियो में इसका समाधान देखें।


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:16 AM
🎯104 | ज्योतिराव फुले ने ब्रह्मा को गाली क्यों दी थी? What's wrong in Veda? PART2 वेदो में व्यभिचार?

https://www.youtube.com/watch?v=lFt1j1fuW3k

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Alok SahuAugust 17, 2021 at 6:14 PM
वेदों में कोई बिभिचार नहीं है। विवाह शुकत का स्फस्टिकरण।

https://youtu.be/gTbdyDDhJeM


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:17 AM
🎯105 | वेदो में घोड़े से रानी नियोग? | What's wrong in veda PART3, वेदो में व्यभिचार? #AshavmedhYagya

https://www.youtube.com/watch?v=gfzXjfYdTlA

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Alok SahuAugust 17, 2021 at 6:14 PM
🎯105 | वेदो में घोड़े से रानी नियोग? #Science_Journey_Exposed। वेदों में विभीचार?

https://youtu.be/zmQRALruvHk


Alok SahuAugust 17, 2021 at 6:27 PM
वेदों में लिखी गंदगी - का उत्तर भाग-१

https://nastikwadkhandan.blogspot.com/2017/08/blog-post_36.html?m=1


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:19 AM
SJL19 | धम्म लिपि और पाली भासा का इतिहास | Science Journey & Motilal Alamchandra ji (Pali Expert)

https://www.youtube.com/watch?v=2_sISyFBe_E&t=198s

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Alok SahuAugust 17, 2021 at 6:20 PM
Live। Conspiracy Of bhasha and lipi। संस्कृत भाषा पर हो रहे षड्यंत्र का खुलासा #Sanskrit

https://youtu.be/h_hnxFLIdso


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:21 AM
SJL27 | मनु को कुर्बानी और मांसाहर क्यों पसंद था ? | Satya Nand ji Maharaj & Science Journey

https://www.youtube.com/watch?v=LLaeS_gGnxE&t=1530s

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Alok SahuAugust 17, 2021 at 6:22 PM
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Alok SahuSeptember 5, 2021 at 5:30 PM
Live | बौद्ध मत में मांसाहार। non-vegetarian in Budhism | Science journey Expose

https://youtu.be/V0CqxFddDDA


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:25 AM
SJL35 | Upanishads copied from Mahayan Buddhism | देखिये सबूतों का पहाड़ | Science Journey

https://www.youtube.com/watch?v=iRIrLV1_vNA

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Alok SahuAugust 17, 2021 at 6:18 PM
SUPERSTITION IN BUDHISM 

https://youtu.be/2iWfj8Q-weM


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 8:58 PM
भ्रम वंशियों द्वारा अभी तक जितने भी लिखीत साक्ष्य उपलब्ध है वे सभी कागज की पाण्डुलिपि के रूप में हैं। आज समग्र शिक्षित वर्ग को पता है कि कागज का प्रथम अविष्कार विश्व में चीन ने किया था, जिसका नाम उसने झी (ZHI) रखा था। समाज और भाषा के विकास क्रम में वह झी चीन से सिल्क रास्ते से चलकर अरब देशों में पहुंचा था, जहां उस झी का नामकरण अरबी भाषा में कागज हुआ। अब वही कागज अरब से जब यूरोपीय बाजार में पहुंचता है, तो उस कागज का नामकरण रोमण भाषा में पेपर हो जाता है। लेकिन वही कागज अब अरब के तुर्को द्वारा भारतीय बाजार में आता है तो भारत के भ्रमवंशी लोग उस कागज नाम को संस्कारित करना उचित नहीं समझते हुए उसी अरबी नाम के साथ कागज को अंगीकार करना उचित समझे। ऐसा प्रतित होता है कि भ्रम वंशियों को भारत की सम्यक संस्कृति वाली पुरखों की भाषा से परहेज था, लेकिन यहां उसे अरब के तुर्को की भाषा से परहेज नहीं था। अब भारत में अरबी भाषा का आगमन कब हुआ, इसकी जानकारी तो सभी पाठक को जरूर होगा। इन सभी बातों से स्पष्ट हो जाता है कि मुस्लिम शासन काल में भारत में कागज आया है और उसी कागज पर भ्रम भाटों ने बादशाहों के संरक्षण में भ्रम का पुलिंदा तैयार किया, जो आज सबों के मानस-पटल पर बैठकर तांडव कर रहा है।

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Alok SahuAugust 17, 2021 at 11:25 PM
वह दौर मगध साम्राज्य का था, जिसका राजधर्म बौद्ध मत था। बौद्ध भिक्षुओं और सनातनी पंडितों में अक्सर ईश्वर के होने और न होने के प्रश्न पर शास्त्रार्थ होता था। राजमद में बौद्धों ने शास्त्रार्थ हार-जीत पर प्राणदंड का प्रावधान करवा लिया था।वे प्रत्यक्ष प्रमाण से ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए सनातनी विद्वानों पर दबाव डालते थे, जिसमें हार जाने पर उन्हें प्राणदंड मिलता था।इस प्रकार सैकड़ों सनातनी विद्वान मौत के घाट उतार दिये गये।ऐसा लगा कि भारतभूमि से सनातन धर्म समाप्त हो जाएगा।

ऐसे ही समय में मिथिला निवासी उदयनाचार्य के नेतृत्व में मिथिला के नैयायिक पंडितों ने नव्य न्याय (तर्कशास्त्र) का आविष्कार किया, जिसमें प्रत्यक्ष के अलावा अनुमान, उपमान और शब्द प्रमाण माने गये।धुएं से आग के होने का प्रमाण अनुमान हुआ, घरेलू गाय से जंगली नीलगाय का प्रमाण उपमान हुआ और मेरे परदादा अमुक थे, इसका प्रमाण पिता का शब्द ही है।इससे वेदों की प्रामाणिकता स्वतः सिद्ध हो गयी।मैथिल नैयायिकों ने न्याय की भाषा भी अलग किस्म की बनायी, जिसमें कोई बात विशद तर्क के साथ कही जाती है।इसके बाद शास्त्रार्थ में बौद्ध विद्वान हारने लगे और उन्हें प्राणदंड मिलने लगा।नौबत यह हो गयी कि उदयनाचार्य से शास्त्रार्थ के लिए कोई नहीं बचा।जो थोड़े से रह गये थे वे नेपाल के रास्ते दूर देश भाग गये।

दिग्विजय प्राप्त करने के बाद उदयनाचार्य भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने पुरी गये। कहते हैं कि उनके सिर पर इतने बौद्धों की हत्या का पाप था कि उस पाप से मंदिर का कपाट बंद हो गया। रोष में आकर आचार्य उदयन ने भगवान जगन्नाथ को ही ललकार दिया-

ऐश्वर्य मदमत्तो असि मामवज्ञाय विद्यसे।
बौद्धे हि पुनरायाते मदधीना तव स्थिति:।।

(हे प्रभु, ईश्वरीय मद में मत्त होकर मेरी उपेक्षा मत करो।बौद्धों के लौट आने पर तुम्हारी रक्षा मैं ही कर सकूंगा।) यह सुनते ही मंदिर का कपाट खुल गया। पूरे विश्व के इतिहास में ईश्वर को ललकारने वाला दूसरा कोई विद्वान नहीं हुआ


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:06 PM
मेरा आपसे विनम्र आग्रह है कि इसे किसी दुराग्रह से प्रेरित होकर नहीं देखें। समाज का जो सच है और जिसे मध्यकालीन समय में जब भारतीय सत्ता मुगलों और अंग्रेजों के अधीन थी, उस समय कैसे-कैसे षड़यंत्र के तहत भारतीय सामाजिक व्यवस्था को मटियामेट कर दिया गया। मैंने उस समय की व्यवस्था को नष्ट-भ्रष्ट करने वालों के ऊपर लिखने का प्रयास किया हूँ। इसमें किसी का व्यक्तिगत दिल दुखाने का चेष्टा मेरा नहीं है, फिर भी अगर किसी का मनःस्थिति इस किताब से दुखित होता है तो उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।
इसे जल्दीबाजी में ना पढ़ें, धैर्य रखें, पढ़ते समय शांतचित रहें, थोड़ा पढ़ें और उस पर ज्यादा विचार करें। जैसे-जैसे आप पढ़ते जायेंगे, आपके सामने उस समय में समाज के बुद्धिजीवियों की घोर साजिश आपके सामने आती जायेगी। आप उस पर गौर करना शुरू करेंगे। क्या पहले ऐसा हुआ था? अगर ऐसा मेरे साथ हुआ होता तब?
ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी
ये सब हैं ताड़ना के अधिकारी!!
पूजहि विप्र सकल गुण हीना।
सुद्र न पुजही वेद प्रवीना
तुलसीदास के ऊपर सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह?
परन्तु मेगास्थनीज जो चन्द्रगुप्त मौर्य के दरवार में काफी वर्ष तक रहे, लेकिन ‘‘चाणक्य‘‘ नाम के किसी व्यक्ति की चर्चा कतई नहीं किये। किसी भी यूनानी लेखक ने चाणक्य अथवा संस्कृत भाषा का उल्लेख नहीं किया है। दूसरी बात चाणक्य द्वारा निर्देशित या स्वलिखीत एक भी शीलापट्ट आज तक नहीं मिला है। तीसरी बात कि आज के इतिहास लेखकों के अनुसार चाणक्य को सिर्फ देवनागरी लिपि और संस्कृत भाषा आती थी परन्तु उस समय के काल में देवनागरी लिपि और संस्कृत भाषा के उपयोग का कोई अवशेष नहीं मिलता हैं। चौथी बात कि उस समय जब ये भाषा नहीं थी तो ये राज दरबार में लोगों से बात कैसे करता था? कुछ लोग कहतें हैं कि जब संस्कृत भाषी चाणक्य मौर्य राजाओं से संवाद नहीं करता था, तब यूनानी भाषी मेगास्थनीज संवाद कैसे करता था? श्रीमान, अशोक ने ब्राह्मी, खरोष्ठी, अरामाईक और यूनानी चारों में अपना अभिलेख लिखवाया है। अरामाईक और यूनानी में उसका द्विभाषीय राज्यादेश भी है। मौर्यों के दरबार में सभी के दुभाषिए थे, परन्तु संस्कृत के दुभाषिए नहीं थे। संस्कृत थी ही नहीं! तो फिर संस्कृत दुभाषीए का तो सवाल ही नहीं उठता है। इसलिए अशोक का कोई भी अभिलेख संस्कृत में नहीं है। आप समझ गए होंगे कि मौर्य राजाओं से यूनानी राजदूत मेगास्थनीज कैसे संवाद करता था। ये अशोक का यूनानी और अरामाईक में द्विभाषीय अभिलेख देख लीजिए।
मेगास्थनीज (Megasthenes) ईसा पूर्व 350 ई0 से ईसा पूर्व 230 ई0
मूल इंडिका में वर्णित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
मेगास्थनीज ने अपने दृष्टिकोण से यहाँ के समाज को प्रभावित करने वाले वर्ग यानि उनके हैसियत एवं पेशे के हिसाब से (तरलता के साथ बदलने वाला वर्ग) सात भागों में बांटा है- (1) विद्वान वर्ग (2) कृषक वर्ग (3) पशुपालक वर्ग (चरवाहा) (4) कारीगर वर्ग (5) सैनिक वर्ग (6) दुकानदार वर्ग (7) गरीब वर्ग ।
मेगास्थनीज की “इंडिका” पुस्तक के तथ्यों का उल्लेख डयोडोरस (Dayodoras) , सिकूलस (Sicules), स्ट्राबो (Strabo) , प्लीनी (Plini) तथा एरियन की “इंडिका” में मिलता।
मेगास्थनीज द्वारा वर्णित तथ्यों को “J.W.Mccrindle” ने एकत्र कर पुस्तक का रुप दिया है।
आज के ब्राह्मणी इतिहासकार कहते है कि “कालिदास“ सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय उर्फ विक्रमादित्य के दरवार मे “महाकवि” थे। महाकवि कालिदास ने अपनी रचना “मेघदूत” में उज्जैन की चर्चा करते हुए प्रसिद्द “महाकाल” मंदिर की प्रशंसा किये है। जिसपर सवाल उठता है कि आज जहाँ महाकाल मंदिर अवस्थित है, वह स्थल सम्राट विक्रमादित्य द्वारा स्थापित खगोलीय ज्ञान हेतु वेधशाला वाली है, फिर महाकवि कालिदास सम्राट के दरवार में रहते हुए उस महाकाल मंदिर की प्रशंसा कैसे लिख दिए? क्योकि सम्राट विक्रमादित्य के अभिलेख में चर्चा है कि खगोलीय वेधशाला उज्जैन नगरी में थी। आज भी महाकाल मंदिर के दरवाजे पर “वेधशाला” अंकित है, आखिर ऐसा क्यों? ऐसे आप को बता दूँ कि इस महाकाल मंदिर की चर्चा महाभारत और पुराण में भी है, अब आप स्वयं तय कर लें कि खगोलीय वेधशाला पहले की है या महाभारत और पुराण पहले की है या महाकाल भैरव मंदिर?
अब प्रश्न उठता हो कि शिवबा जब 1646 ई0 से ही अपना सम्राज्य स्थापित कर लिए थे और आगे भी अपना सम्राज्य का विस्तार करते जा रहे थे, तो फिर अचानक से 1674 ई0 में राजतिलक करवारने की बात ब्राह्मण पुरोहितों ने क्यों खड़ा किया?
बात सही है कि शिवबा जन्म के 16 वर्ष बाद यानी 1646 के बाद से 1670 ई0 तक में बहुजनो का बहुत ही बड़ा साम्राज्य स्थापित कर लिए थे। उसके बाद समाज में मानवतावादी दृष्टिकोण स्थापित करने हेतु शिवबा ने कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने शुरू कर दिए।

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Alok SahuAugust 17, 2021 at 11:45 PM
दिलीप #C मंडल ने तुलसीदास के चौपायी का संसोधन किया है। किसी ने व्हाट्सएप पर भेजा है। 

यह इंडिया टुडे ( हिंदी ) के संपादक रहे हैं।
आशा की जानी चाहिए कि इनको दोहे चौपायी आदि के व्याकरण का ज्ञान होना चाहिए था।
इसे पता होना चाहिए कि चौपायी में 16 - 16 मात्राएं होती हैं। 
अब इसने जो चौपायी बनायी है उसमें मात्र 13 या 14 मात्राएं हो रही हैं। 

ऐसे मूर्ख भी तुलसीदास को चुनौती देंगे।
यही कलयुग है। 

यदि इस मूर्ख को इस चौपायी को अपने मनोनुकूल, व्याकरण के नियमों के अनुसार संसोधित करना था तो इसे लिखना चाहिए था - विप्र गवांर शूद्र पशु नारी।
या फिर - विप्र गवांर शूद्र व्यभिचारी। लेकिन फिर यह स्वयं इस चौपायी से विलुप्त हो जाता -पशु । परंतु यह व्याकरण के अनुसार शायद अधिक निकट होता उस मूल चौपायी के, जिसकी रचना तुलसीदास ने की थी। 

लेकिन जो व्यक्ति - शरद यादव का पोता पखारन करके एक पत्रिका का संपादक बना हो उसमें यह बुद्द्धि कैसे आ सकती है। विवेक तो बहुत दूर की बात है।

यदि इसकी चौपायी को ही सही मान लिया जाय तो तीन संज्ञाएँ तो इसने अपने लिए ही लिख रखी हैं। विप्र तो मात्र एक संज्ञा है। बाकी ढोल, पशु और व्यभिचारी तो यह स्वयं है।
इसके नजदीकी लोग इसे इसी रूप में जानते हैं।

प्रतिउत्तर इसकी वाल पर भेज दिया जाय। 

वैसे तो मैं कोई हिंदी का विद्वान नहीं हूँ। लेकिन इंटरमीडिएट में व्याकरण के यही नियम हमने पढ़े थे।
गलत हो तो मैं संसोधित करने के लिए तैयार हूं। 

..

☺️☺️☺️


Alok SahuAugust 17, 2021 at 11:54 PM
परन्तु मेगास्थनीज जो चन्द्रगुप्त मौर्य के दरवार में काफी वर्ष तक रहे, लेकिन ‘‘अशोक‘‘ नाम के किसी व्यक्ति की चर्चा कतई नहीं किये। किसी भी यूनानी लेखक ने अशोक अथवा पाली भाषा का उल्लेख नहीं किया है। दूसरी बात अशोक द्वारा निर्देशित या स्वलिखीत एक भी शीलापट्ट आज तक नहीं मिला है। तीसरी बात कि आज के इतिहास लेखकों के अनुसार अशोक को सिर्फ देवनागरी लिपि और पाली भाषा आती थी परन्तु उस समय के काल में देवनागरी लिपि और पाली भाषा के उपयोग का कोई अवशेष नहीं मिलता हैं। चौथी बात कि उस समय जब ये भाषा नहीं थी तो ये राज दरबार में लोगों से बात कैसे करता था? कुछ लोग कहतें हैं कि जब पाली भाषी अशोक मौर्य राजाओं से संवाद नहीं करता था, तब यूनानी भाषी मेगास्थनीज संवाद कैसे करता था? श्रीमान,जिन शिलालेखो को अशोक के ब्राह्मी, खरोष्ठी, अरामाईक और यूनानी नामो से चलवाया गया है वहा पर तो न तो अशोक का नाम है और न ही ये लिखा हे की इनका मौर्य वंश से कोई लेना देना है। अरामाईक और यूनानी में उसका द्विभाषीय राज्यादेश भी है। मौर्यों के दरबार में सभी के दुभाषिए थे, परन्तु पाली के दुभाषिए नहीं थे। पाली थी ही नहीं! तो फिर पाली दुभाषीए का तो सवाल ही नहीं उठता है। इसलिए कथित अशोक का कोई भी अभिलेख पाली में नहीं है। जबकि उन शिलालेखो में संस्कृत के शब्द है। आप समझ गए होंगे कि मौर्य राजाओं से यूनानी राजदूत मेगास्थनीज कैसे संवाद करता था। ये कथित अशोक का यूनानी और अरामाईक में द्विभाषीय अभिलेख देख लीजिए।
मेगास्थनीज (Megasthenes) ईसा पूर्व 350 ई0 से ईसा पूर्व 230 ई0
मूल इंडिका में वर्णित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
मेगास्थनीज ने अपने दृष्टिकोण से यहाँ के समाज को प्रभावित करने वाले वर्ग यानि उनके हैसियत एवं पेशे के हिसाब से (तरलता के साथ बदलने वाला वर्ग) सात भागों में बांटा है- (1) विद्वान वर्ग (2) कृषक वर्ग (3) पशुपालक वर्ग (चरवाहा) (4) कारीगर वर्ग (5) सैनिक वर्ग (6) दुकानदार वर्ग (7) गरीब वर्ग ।
मेगास्थनीज की “इंडिका” पुस्तक के तथ्यों का उल्लेख डयोडोरस (Dayodoras) , सिकूलस (Sicules), स्ट्राबो (Strabo) , प्लीनी (Plini) तथा एरियन की “इंडिका” में मिलता।
मेगास्थनीज द्वारा वर्णित तथ्यों को “J.W.Mccrindle” ने एकत्र कर पुस्तक का रुप दिया है।


Alok SahuAugust 17, 2021 at 11:55 PM
ये हिंदीबाजी है अम्बेडकर के लेख की। 
उन्होंने लिखा - Touchable and Untouchable. 
उन्होंने अंग्रेजो के उस शब्द का नग्रेजी नाम दिया - Polluted by touch. 
कब 1911 की जनगणना में। 
उस समय एक ही कास्ट में दो तरह के लोग पाए जाते थे - Touchable and Untouchable. 

जिसको कुतर्क के द्वारा अम्बेडकर ने नकार दिया।
जो अंग्रेजों के मनोअनुकूल था।
वे वही चाहते थे कि कोई भारतीय पिछलग्गू उनकी बात का समर्थन कर दे। वही हुवा। 

अनेक उद्धरण हैं - विल दुरान्त, रोमेश दत्त, गणेश सखाराम देउस्कर, handyman और जे सुन्दरलैंड के प्रामाणिक ग्रन्थ हैं जो यह बताते हैं कि 1850 से 1947 के बीच लगभग 4 करोड़ भारतीय भुखमरी और संक्रामक रोगों की चपेट में आकर काल के गाल में समा गए। 

जैसा आज कोविड के समय हो रहा है। 
कि छूने से व्यक्ति संक्रमित हो सकता है।
इसलिए छूने से परहेज रखो।
उस समय भी ऐसा ही दृश्य था - जिसे अंग्रेजो और उनके सेवक अम्बेडकर ने नाम दिया - Untouchability. 

...


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:12 PM
भारतीय संस्कृति को बौद्ध देन
– डा. जगन्नाथ उपाध्याय
प्रस्तुत विषय समुद्र के समान विस्तृत है । भारतवर्ष कोई छोटा देश नहीं है । इसकी आयु कम नहीं है। इसका विस्तार विविधतापूर्ण है। यह मानव जगत का समुद्र है। जिस प्रकार समुद्र का थाह लगाना, अव गाहन करना, इस पार से उस पार पहुंचना कठिन है, उसी प्रकार इस विषय पर विचार करना भी कठिन है। लेकिन हमें एक बात का ध्यान रखना चाहिए। वह यह है कि लोग अपने-अपने की तरह से 'संस्कृति' की पूरी व्याख्या कर लेते हैं। भारतीय संस्कृति पर शोध करने वाले आधुनिक शोधकर्ता क्या करते हैं ? वे ऋग्वेद से लेकर ब्राह्मणग्रन्थ, उप निषद, धर्मसूत्र, स्मृति और अन्त में पुराण तक एक मार्ग निर्धारित कर लेते हैं। भारतीय संस्कृति पर शोध कार्य करने हेतु उनके लिए केवल यही रास्ता है क्योंकि मनु और सभी स्मृतिकारों ने कहा है कि दुनिया में जो भी ज्ञान है वह वेद से ही निकला है। अतः उन्होंने यह बताया कि जो संस्कृति वेदों के अनुकूत है वही भारतीय संस्कृति है। 
इस संस्कृति की व्याख्या के लिए उन्हें भाषाएं, प्रदेश और जातियों की जरूरत होती है। इन्हीं पर शोध करके ऐसे शोधकर्ता डिग्रियां ले जाते हैं। भारतीय संस्कति के शोधकार्य पर यही सब कुछ हो रहा है। वैदिक भाषा में आर्यावर्त्त, ब्रह्मावर्त्त, मध्यमण्डल जो प्रदेश कहे जाते हैं, इन प्रदेशों में रहने वाली जातियों-अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य-की भाषा उनका क्षेत्र ही ऐसे शोधकर्ताओं की दृष्टि में भारतीय संस्कृति का प्रतिष्ठान है, यही इस संस्कृति की धारा है। इसी धारा से ही उन्होंने हजारों शोध-ग्रन्थों की रचना की है। तो इसका मतलब यह हआ कि दक्षिण, पर्वतीय प्रदेश, और उसके अगल-बगल के जो प्रदेश हैं वे उनकी निगाह में भारतीय संस्कृति के हृदय-स्थल नहीं हैं। तब हमारे सामने यह प्रश्न उठता है, कि दक्षिण में यह संस्कृति पहुंची कैसे? इसका है कि यह संस्कति दक्षिण से आने वाले आचार्यों शंकराचार्यों चार्यों के जरिये दक्षिण में पहुंची। ऐसे ही द्विज जातियों और भाषा के माध्यम से इस संस्कृति का विस्तार हुआ।
लेकिन इस वैदिक संस्कृति के विस्तार का मूल या हृदय-स्थल इस देश में प्रयुक्त जनभाषा पाली और प्राकृत रही हैं। पाली या प्राक कोई एक भाषा नहीं है । यह तत्कालीन अनेक मन भाषाओं के योग की परिणाम है । पाली व प्राकृत मलेच्छों की भाषा मानी गयी है। अतण्य इन भाषाओं में जो कुछ लिखा गया है उसे भारतीय संस्कृति का प्रति निधित्व करने वाला नहीं माना गया है। लेकिन संस्कृत साहित्य अल्प है। इसका विकास ब्राह्मणों व अन्य द्विजों ने पाली व प्राकृत भाषा को सुधारकर तथा इनका सस्कृतकरण करके किया। संस्कृत का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है संस्कार किया हुआ, सुधारा हुआ। ब्राह्मण लोग कहते हैं कि संस्कृत शब्द का अर्थ बड़ा जटिल है। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल हो भिन्न है। इसका अर्थ बड़ा सीधा साधा है। स्वयं शब्द हो बतलाता है कि जिसका संस्कार किया गया है, वही संस्कृत है। वैदिक भाषा में पालि और प्राकृत को ढालकर संस्कृत को एक विशिष्ठ भाषा के रूप में जन्म दिया गया और इस प्रकार आम लोगों के लिए अध्ययन का रास्ता रोक दिया गया।
.......१

REPLY

Alok SahuAugust 17, 2021 at 11:43 PM
#उत्पीड़न_का_प्रपंच :

जो लोग मनुस्मृति के हवाले से जाति के नाम पर राजनैतिक खेल खेल रहे हैं उनको नश्लवादी अंग्रेज ईसाइयों की सच्चाई समझनी चाहिए। 
1807 में दक्षिण भारत का सर्वे करने के बाद उसने हिन्दू समाज को 122 कास्ट/ ट्रेड में वर्णित किया। जाति का अर्थ था मैन्युफैक्चरिंग या ट्रेडिंग कम्युनिटी।

जीवंत शिल्प और वाणिज्य के समय भारत मे जाति एक शक्तिशाली सामाजिक ढांचा था, जिसमे हर जाति या समुदाय के स्वयं के विधान थे, और उनके पालन करवाने हेतु उनके स्वयं का समर्थवान सिस्टम था जिसको आज आप #खाप_पंचायत का एक विकसित स्वरूप समझ सकते हैं। वे किसी धार्मिक या राजनैतिक संस्था से अनुशासित न होकर स्वयं शासित समुदाय थे। इस बात को फ्रांसिस हैमिलटन बुचनान भी लिखता है अपनी पुस्तक में। बुचनान की पुस्तक तीन वॉल्यूम में है लगभग 1450 पेज में।
उसने किसी भी अछूत जाति या ऐसी किसी प्रथा के बारे में लिखा नही है।
क्यों ?
वह अंधा था?
नही अभी ईसाइयो का पूरा ध्यान भारत के धन और वैभव को लूटना था, यहां के साइंस और टेक्नोलॉजी के मॉडल को चुराकर अपने देश मे मैन्युफैक्चरिंग शुरू करना था जिसको वे औद्योगिक क्रांति का नाम देंगे। 
वही भारत के मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड को नष्ट करेंगे।
फिर अपने अपराधों पर पर्दा डालने तथा राजनैतिक और धर्म परिवर्तन का आधार गढ़ने हेतु फेक न्यूज़ की रचना करेंगे। 



Alok SahuAugust 17, 2021 at 11:44 PM
जाति के उस स्वरूप के जिंदा रहते उसमे ईसाइयत का प्रवेश संभव नही था। इसीलिये मैक्समुलर लिखता है -" जाति धर्म परिवर्तन में सबसे बड़ी बाधा है, लेकिन सम्भव है कि कभी यह पूरे समुदाय के धर्म परिवर्तन हेतु एक शक्तिशाली इंजन का काम करे"। 

इसलिए उन्होंने कास्ट को टारगेट करके कास्ट को एक अमानवीय प्रथा घोसित करना शुरू किया।

पहले उन्होंने शिल्पकार और वाणिज्यिक समुदायों को आर्थिक रूप से विनष्ट किया फिर आने वाले समयकाल में अनेको कारणों से चार वर्ण वाले हिन्दू समाज को 2000 से अधिक जातियों में वैधानिक रूप से चिन्हित किया। 

मेरी पुस्तक में आपको यह देखने को मिलेगा कि किस तरह ईसाई मिशनरी एम ए शेररिंग ( 1872) ने कास्ट के लिए ब्राम्हणों को अकारण ही भला बुरा कहा। और कास्ट को टारगेट किया। वह काम आज भी जारी है। लेकिन पूरी स्किप्ट उसी की लिखी हुई है। भाषा बदल सकती है लेकिन स्क्रिप्ट वही है।

1901 के जनगणना कमिश्नर रिसले और मैक्समुलर में अच्छी सांठ गांठ थी। 
1901 में रिसले ने मैक्समुलर के #आर्यन_अफवाह से निर्मित तथाकथित सवर्णो को ऊंची जाति घोसित किया बाकी अन्य समुदायों को नीची जाति। 
2378 जातियां।
एक आधुनिक लेखक निकोलस बी डर्क लिखता है:

“ रिसले के द्वारा तैयार किए गए सिस्टम की बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण इस बात से सिद्ध होता है कि इसके कारण बहुत लोगों ने बहुत सारे मुकदमों और प्रतिनिधित्व (memorials) अङ्ग्रेज़ी सरकार के पास भेजे । इसके पूर्व भी जनगणना अधिकारियों के पास शिकायते दर्ज हुयी थे , लेकिन रिसले द्वारा ये घोषणा होने के बाद कि जनगणना को सामाजिक तरजीह का आधार माना जाएगा ; जनगणना को एक ऐसा अभूतपूर्व राजनैतिक हथियार बना दिया”।

(निकोलस बी दर्क्स ; कास्ट ऑफ minds पेज- 221 )

“1911 के जनगणना कमिश्नर ने अपनी रिपोर्ट इस शिकायत के साथ शुरुवात की –‘ जनगणना की किसी भी अन्य मुद्दे ने इतनी उत्तेजना पैदा नहीं किया है जितना कि कास्ट की वापसी ने। बंगाल के लोगों को ऐसा लगता है कि जातिगत जनगणना उस कास्ट के लोगों की संख्या जानने के लिए नहीं बल्कि उनको उनकी सामाजिक हैसियत बताने के लिए की जा रही है ....लोगों की इस भावना का कारण पिछली जनगणना रिपोर्ट मे लोगों की सामाजिक हैसियत तय किए जाने के कारण है’।
कमिश्नर ने बताया कि विभिन्न कास्ट संस्थाओं से सैकड़ो मुकदमे दाखिल किए गए हैं, कि उनका वजन ही यदि तौला जाय तो डेढ़ मोन्द (120 पाउंड ) निकलेगा, जिनकी मांग है कि उनका नामकरण बदला जाय और सामाजिक तरजीह मे उनको ऊपर रखा जाय, और उनको तीन द्विज वर्ण मे रखा जाय । शेखर उपद्ध्याय ने नोट किया –‘ लोकल स्तर पर इन नीची (घोसित) जातियाँ का आंदोलन कभी कभी ऊंची जातियों के खिलाफ दुश्मनी पैदा कर रहा है, और कभी कभी नीची जातियों के हरकतों से ऊंची जतियों मे गुस्सा और विरोध देखने को मिल रहा है ?” 

(निकोलस बी दर्क्स ; कास्ट ऑफ minds पेज- 223 )

1921 और 1931 मे भी जातिगत जनगणना होते है लेकिन 1941 मे जातिगत जनगणना बंद कर दी जाते है उसका कारण बताया गया कि दूसरे विश्व युद्ध के कारण जनगणना अधिकारियों की कमी आ गयी थी।
लेकिन शेखर उपदध्याय का नोट इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि भारत मे 1857 के बाद हिंदुओं द्वारा उठ रहे विरोध के खिलाफ उनको बांटने की कूटनीति मे अंग्रेज़ सफल हो गए । हिंदुओं को एक दूसरे के सम्मुख खडा करके वे अपने विरोध खड़े हो रहे जन आंदोलन को खत्म करने की कूटनीतिक काट तैयार करने मे सफल हो रहे थे । अब उनको अपना एक नायक चुनना था जो मैकाले की शिक्षा नीति से निकला हुआ शक्ल से भारतीय परंतु अक्ल से अंग्रेज़ हो या उनकी शाजिश को भारत के लोगों की आकांक्षा के रूप प्रस्तुत करने को उद्धत हो। और आने वाले दिनों मे वे उसे खोज भी लेंगे। 
पहला काम लेकिन ये होगा कि 1906 मे मुस्लिम लीग के नाम पर एक सहयोगी पार्टी तुरंत खोज लिया जाय ।

ब्रिटिश दस्युयों के विरुद्ध 1857 में मुश्लमान और हिन्दू एक साथ लड़े थे। 

50 वर्षो में वे हिन्दू और मुसलमानों को आमने सामने खड़ा करने में सफल रहे। नीति यही थी कि एक समुदाय को सरकारी संरक्षण देकर दूसरे समुदाय को चिढाना और प्रताड़ित करना। 

अगले 20 - 25 वर्षो में हिंदुओं को बांटने की योजना बनाएंगे और जनगणना को हन्थियार की तरह प्रयुक्त करते हुए विकृत इतिहास की मदद से हिंदुओं को बांटेंगे और उनके नायक चुनेंगे जिनको सरकारी प्रश्रय देकर स्थापित नायक बनाया जाएगा। 
इनके ऐतिहासिक नायक भी चुने जाएंगे #एकलव्य_और_शम्बूक के नाम से। 

और वर्तमान नायक भी। 
वे शक्ल से भारतीय और अक्ल से अंग्रेज होंगे - पेरियार और अम्बेडकर।
"एलियंस एंड स्टूपिड प्रोटागोनिस्ट" - मैकाले के शब्दों में।

साधो यह मुर्दों का देश।


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:12 PM
संस्कृत को देववाणी या देव भाषा बताया गया है। इस भाषा में तो काव्य तक नहीं है । संस्कृत में जितने भी काव्य मिलते हैं उनक रचना पालि और प्राकृत की सारी शब्दावली का संस्कृतकरण कर गई है। रामायण मूल रूप से प्राकृत में था। लेकिन बाद में इस संस्कृत में अनुवाद किया गया। संस्कृत के काव्यों में कवियों ने प्राकृत का गुणगान किया है। बाणभट्ट अपनी 'कादम्बरी’ में शुरू की श्लोकों की बात करते हुए कहते हैं " मैं प्राकृत के कवियों का प्रसाद लेकर इसे बना रहा हूँ।“ इसका मतलब यह चारों ओर से काटकर अपने ढंग से बना ली गयी है। भाषा, साहित्य, महाकाव्य, पुराण आदि इसी ढंग से बनाये गये हैं। वैदिक संस्कृति के द्वारा भारतीय संस्कृति को अपने अनुकूल सीमित रूप में परिभाषित किया गया है। भारतीय संस्कृति को मखौल बना दिया गया है, विशाल समुद्र को छोटा-सा द्वीप बना दिया गया है। भारतीय संस्कृति को जानने की क्या आवश्यकता है? यदि भारतीय संस्कृति की व्याख्या वेदों और पुराणों तक ही है तो भारतीय संस्कृति में बौद्धों के लिए जगह ही नहीं है।
संस्कृति का अर्थ-संस्कृति क्या चीज है? प्राचीन ग्रन्थों में यह शब्द कहीं भी नहीं मिलता। कहा जाता है कि पाश्चात्य देशों में पिछले दो तीन शताब्दियों में सोचने की जो प्रकृति विकसित हुई है संस्कृति अर्थात कल्चर की अवधारण इसी प्रवृत्ति की देन है । यूरोप में दो चीजों के मिलन से जो तीसरी चीज उत्पन्न होती है उसे कल्चर कहा जाता है। जैसे आम में किसी दूसरे पौधे का कलम लगाकर कोई तीसरा पौधा पैदा किया जाता है, इसी को कल्चर का नाम दिया गया है। फूल, पेड़ पौधे की अवस्था में दो अलग-अलग जातियों के मिलने से जो तीसरी जाति पैदा हुई उसी को कल्चर कहा गया। जब यूरोप में प्रजातंत्र आया, धर्म की पुरानी मान्यताओं का विरोध हुआ, विभिन्न जातियों में टकराव हुआ, तो इन सारे संघर्षों के परिणामस्वरूप जनजीवन में अनेक परिवर्तन हए। इन तमाम परिवर्तनों को धर्म शब्द के अन्तर्गत सम्मिलित करने में कठिनाई महसूस हुई तब संस्कृति या कल्चर शब्द का प्रयोग किया गया । यूरोप के प्रभाव से भारत में भी यही हुआ। 
अब हमें इस वाद-विवाद में पड़ने की जरूरत नहीं है कि संस्कृति शब्द कहां से आया । यदि सही मायने में देखा जाये तो भारतीय संदर्भ में संस्कृति की अवधारणा बौद्ध धर्म की ही देन है। बौद्ध संस्कृति ही संस्कृति के स्तर पर आ सकेगी। वैदिक लोग धर्मवादी, व्यवस्थावादी, थे, संस्कृतिवादी नहीं। संस्कृति, धर्म से भिन्न है। संस्कृति के अन्तर्गत विश्वास, धर्म, परम्परा, सारी चीज सम्मिलित हैं। धर्म, संस्कृति का एक छोटा-सा घटक है । संस्कृति भारतीय संदर्भ में एक विचित्र चीज बन गई है। इधर पिछले पचास वर्षों में लोगों ने संस्कृति की व्याख्या अपने अपने ढंग से करने की कोशिश की है। अजीब-अजीब तरह के लोग हैं ये व्याख्या करने वाले । जैसे तिलक, गांधी, सावरकर, गोलवलकर, जवाहरलाल नेहरू, पुरुषोत्तम दास टण्डन, शंकराचार्य, करपात्री आदि ने संस्कृति की अलग-अलग व्याख्या की है। इनकी व्याख्या को वास्तव में संस्कृति कहकर पुकारना नहीं चाहिए; इन्हें धर्म कहना चाहिए । ये संस्कृति के अधिकारी नहीं हैं। लेकिन क्या किया जाए? ये लोग मजबूर हैं बेचारे। जिस चीज की ये लोग व्याख्या करना चाहते हैं, उसकी व्याख्या बिना संस्कृति शब्द का नाम लिए हो ही नहीं सकती। ये लोग वर्णाश्रम धर्म को संस्कृति की संज्ञा देते हैं जो कि सरासर गलत है। जिन मान्य ताओं को ये पकड़े हुए हैं, उनको छोड़ना नहीं चाहते। इसलिए इनमें से जब भी कोई संस्कृति का कोई नाम लेकर व्याख्या न दे तो समझना चाहिए कि यह भ्रामक है। संस्कृति, धर्म से भिन्न है लेकिन होता यह है कि धर्म हमेशा संस्कृति का गढ़ बना रहता है। इसलिए हमें संस्कृति को धर्म से अलग पहचानने के लिए उसके (संस्कृति) लक्षणों को पहचानना होगा।
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Alok SahuAugust 17, 2021 at 11:28 PM
* पेकिंग विश्वविद्यालय #चीन के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है और इस साल विश्वविद्यालय में संस्कृत की पढ़ाई शुरू होने के 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

* #जर्मनी में 18वीं शताब्दी से ही संस्कृत पढ़ाए जाने का प्रचलन है। 

* #फ्रांस में भी 18वीं शताब्दी से ही संस्कृत पढ़ाया जाता है।

* उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय देशों यथा ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, ब्रिटेन, डेनमार्क, फिनलैंड, इटली, नीदरलैंड, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, रूस और नार्वे के अलावा मध्य पूर्व, जापान और थाईलैंड में भी संस्कृत पढ़ाए जाने का प्रचलन है।

अमेरिका में सबसे ज्यादा उत्तर अमेरिका में विशेष रूप से संस्कृत की शिक्षण संस्थाएँ बड़ी संख्या में हैं। इनमें एल कोलेजियो डी मैक्सिको, ब्राउन यूनिवर्सिटी, कोलंबिया, यूनिवर्सिटी, कॉनकॉर्डिया यूनिवर्सिटी ऑफ कनाडा, कॉर्नेल यूनिवर्सिटी, एमोरे यूनिवर्सिटी, जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, हॉवर्ड यूनिवर्सिटी (संस्कृत व अन्य भारतीय शिक्षा), इंडियाना यूनिवर्सिटी मॅकगिल यूनिवर्सिटी और कनाडा की मॅकमास्टर यूनिवर्सिटी जैसे 18 यूनिवर्सिटिज़ में संस्कृत पढ़ाए जाते हैं।

* पेकिंग विश्वविद्यालय में इंडियन काउंसिल फॉर कल्चल रिलेशनशिप (ICCR) ने संस्कृत सीखने की इच्छा रखनेवाले लोगों के लिए आज #लिटिल_गुरु नामक एक मोबाइल एप का लोकार्पण किया। 

★और हम भारत के लोग हैं कि संस्कृत की धज्जियां उड़ाते हैं।★


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:13 PM
संस्कृति के लक्षण
1. संग्रह करने की प्रवृत्ति-संस्कृति का पहला लक्षण है संग्रह करने की प्रवृत्ति, संग्रहवत्ति या संग्रहाकता। अधिक-से-अधिक चीजों का जुटाना दूर की चीजों को भी अपने साथ लेना और उसमें आत्मीयता की भावना भर देना जिससे कि उसे यह लगने लगे कि ये सब हमारे ही हैं, यह संस्कृति का एक मुख्य लक्षण है। 
2. अनुसूत रहने की प्रवृत्ति-संस्कृति का दूसरा लक्षण है अनुसूत रहने की प्रवत्ति, अर्थात एक सूत्र या धागे में माला के समान पिरोने की प्रवृत्ति। कहने का तात्पर्य यह है कि संस्कृति में विभिन्नताओं के बीच माला के विभिन्न गुटकों की भांति एक धागे में गंथे रहने की प्रवृत्ति होती है। 
3. परम्परा या इतिहास का होना-संस्कृति बनने के लिए परम्परा या इतिहास का होना आवश्यक है। अर्थात ऐसी ऐतिहासिकता जिसमें नवीनता और प्राचीनता का समिश्रण होता है। उदाहरण के तौर पर जब बाबा साहेब डॉ० अम्बेडकर ने भारत के दबे पिछड़े दलित बहजन समाज को यह बताया कि वे लोग एक बहुत बड़ी संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं तब उन्हें अपनी परम्परा, अपने इतिहास के रूप में अपनी सही संस्कृति का ज्ञान हुआ; नवीनता और पुरातनता का संयोग हुआ। और उन्हें अपनी संस्कृति का सही दिग्दर्शन हुआ। आज बाबा साहेब के अनुयायी बौद्धों को जब नवबौद्ध शब्द से सम्बोधित किया जाता है तब वे इसे अपना अपमान समझकर इसका विरोध क्यों करते हैं? इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है। वे अपने को अभी के बौद्ध नहीं मानते। उनका कहना है कि उनके पूर्वज बौद्ध थे। बाबा साहेब ने उनके इतिहास का पता लगाकर उन्हें बताया कि वे मूल रूप से बौद्ध हैं, उनके पूर्वज बौद्ध थे। हिंदुओं ने उनके इतिहास को ही मिटा दिया था, भगवान बुद्ध को भुलवा दिया था। इसलिए बाबा साहेब के प्रयत्न से जब उन्हें इस बात का ज्ञान हुआ है कि वे मूलरूप से बौद्ध हैं, तब से वे अपना सम्बन्ध अपने प्राचीन इतिहास से जोड़ने लगे हैं। वे अपने को इस प्राचीन विशाल संस्कृति के उत्तराधिकारी मानने लगे हैं और इस पर गर्व महसूस करते हैं । यही कारण है कि वे नवबौद्ध शब्द को अपना अपमान समझते हैं । और उसका विरोध करते हैं । 
4. संस्कृति सामान्योन्मुख होती है। संस्कृति वह है जो सामान्य लोगों के लिए हो, विशेष लोगों के लिए नहीं। यूरोप में इसी विषय को लेकर काफी संघर्ष हुआ। कुछ का कहना था कि संस्कृति हमेशा सामान्य लोगों की होती है। उदाहरणार्य, देहात में गीत गाने वाला गायक, और दूसरा किसी संगीत विद्यालय में सीखकर गीत का अलाप करने वाला गायक, उन दोनों में संस्कृति किसमें है? इसी प्रकार इस प्रश्न को लेकर कम्यूनिस्टों और पूंजीवादियों में भी बहुत झगड़ा है। कम्यूनिस्टों का कहना है कि संस्कृति जनबादी होती है, संस्कृति हमेशा लोक संस्कृति होती है। हमारा उत्तर यह है कि संस्कृति सामान्य की होती है । संस्कृति अपनी विशेषता को छोड़ नहीं सकती लेकिन यह कहना कि वह विशेषोन्मुख होती है, गलत है । यहां का ब्राह्मण कहता है कि सुसंस्कृत ब्राह्मणों की संस्कृति ही सही मायने में संस्कृति विशेष की होती है। लेकिन यह गलत है, संस्कृति हमेशा सामान्य की होती है। विशेष की नहीं । विशेषीकरण की सामान्य में ले जाना चाहिए और सामान्य में विशेष का भाव आना चाहिए। 
अब यह प्रश्न उठता है कि किसी के पूर्वज जो भोगते आ रहे क्या वह सारी संस्कृति है? उत्तर है नहीं। हमें इस सम्बन्ध में संस्कृति और विकृति के बीच भेद करना चाहिए। ऐसा मानना गलत होगा कि हमारे पूर्वजों, इतिहास आदि से जो भी मिला वह सभी संस्कृति है। जब संस्कृति, विकृति बन जाती है तब उसे त्याग देना चाहिए। संस्कृति एक परिवर्तनशील प्रक्रिया है। उस प्रक्रिया में उसके साथ बहुत सी विकृतियां जुड़ जाती हैं। एक अच्छी संस्कृति को चाहिए कि वह दवा की भांति ऐसी विकृतियों को छांटकर अलग कर दे। जिस प्रकार एक अच्छी दवा शरीर के विकारों को छांटकर उसे स्वस्थ बनाती है उसी प्रकार संस्कृति भी विकृतियों को छांटकर राष्ट्र को स्वस्थ रखती है। जो संस्कृति ऐसा नहीं कर पाती वह क्षीण होती चली जाती है। और अपनी व्यापकता को खोने लगती है। बौद्ध संस्कृति भी इस प्रकार की विकतियों से अछूती नहीं रही है। 
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Alok SahuAugust 17, 2021 at 11:31 PM
#स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि गोरे अंग्रेजों के स्थान पर काले अंग्रेज आ गए - हाइब्रिड दोगले।
स्वतंत्रता का एकमात्र अर्थ है - भारत के बारे में स्वतंत्र चिंतन। 

पुरानी पोस्ट है - किसी मित्र की वाल से कॉपी किया है। 
पोस्ट मेरी ही है। मेरे पाठक और मित्र जानते हैं।

#शूद्र_नीच_नहीं_थे - वाल्मीकि
#शूद्र_नीच_थे - अम्बेडकर 

सच्चाई क्या है ? कौन सच बोल रहा है और कौन अफवाहबाज या अफवाहबाजों के चंगुल में गिरफ्तार था?

वाल्मीकि रामायण में रामकथा की महिमा का वर्णन करते हुए वाल्मीकि जी लिखते हैं कि यदि इस कथा को ब्राम्हण पढ़े तो वेद शास्त्रों में निष्णात हो, क्षत्रिय पढ़े तो पृथ्वीपति बने, वैश्य पढ़े तो उसका व्यापार बढ़े, और शूद्र पढ़े तो उसकी महत्ता बढ़े। 

1972 में The beautiful Tree के लेखक धरमपाल जी ने ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा 1820-1830 में एकत्रित किये गए डेटा को अपनी पुस्तक में प्रकशित किया था। उनके भारत के गुरुकुलों में शिक्षा ग्रहण करने वाले भारतीयों की वर्ण क्रम में वर्णित लिस्ट में शूद्र छात्रों की संख्या द्विज छात्रों की तुलना में कई गुना अधिक थी।जोकि तात्कालिक समय मे भारतीय एकेडेमिया में फैलाई गई अफवाह के एकदम उलट थी कि वैदिक काल से ही शूद्रों को शिक्षा से वंचित किया गया।

डॉ आंबेडकर अपनी पुस्तक #WhoWereTheShudras में भी यही बात लिखते हैं कि शूद्रों को शिक्षा से वंचित किया गया और उसके प्रमाण के तौर पर ऋग्वेद के पुरुषोक्त प्रस्तुत करते हैं। और इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि शूद्र का अर्थ होता है menial अर्थात नीच। 

लेकिन वाल्मीकि रामायण और धरमपाल द्वारा एकत्रित डेटा यह प्रमाणित करता है कि जब तक शिक्षा ब्राम्हणोँ के हाँथ में थी तब तक शूद्र न ही अशिक्षित था और न ही अछूत। 
तो फिर आने वाले 150 वर्षो में ऐसा क्या हुवा कि शूद्र अशिक्षित भी हो गया और अछूत भी ?

इसका उत्तर मैंने कई बार दिया है। आप भी जानते हैं। अभी 2015 में ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन में शशि थरूर ने सार्वजनिक रूप से ब्रिटिश को भारत के लूट और विनाश के लिए जिम्मेदार ठहराया और प्रतीक के तौर पर उनसे माफी मांगने की अपील करते हुए एक पौंड प्रतिवर्ष के हिसाब से अगले 200 वर्षो तक हर्जाने की मांग किया था। उस वीडियो को पूरे भारत के बुद्धिजीवियों ने देखा था। माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने शशि थरूर को बधाई भी दिया था। 

लेकिन पिछले 200 वर्षों के दौरान अपने लूट और अत्याचार को छुपाने के लिए ब्रिटिश और यूरोपीय ईसाइयो ने जिस फेकन्यूज़ और अफवाह की रचना किया था, उसके आधार पर भारत के इतिहास और समाजशास्त्र को व्याख्यायित किया। संविधान में रिजर्वेशन का आधार भी वही फेक न्यूज़ है जिसमे कोई सच्चाई नहीं है।

शशि थरूर के भाषण की वीडियो लिंक इस पोस्ट में हैं :

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=222843658614669&id=2


Asatya Ka BhandafodAugust 17, 2021 at 9:13 PM
एक अच्छी संस्कृति का कार्य क्या है? एक अच्छी संस्कृति का कार्य होता है दुनिया में श्रेष्ठ और हीन चीजों का निर्धारण करना। सांस्कृतिक दृष्टियों की श्रेष्ठता का मानदण्ड अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए, सुन्दरता, नत्य, काव्य, संगीत आदि की श्रेष्ठता का निर्धारण मन के विभिन्न सांस्कृतिक धरातलों पर किया जाता है। नमूने के तौर पर यदि किसी परदे पर इस्लाम संस्कृति से सम्बन्धित कुछ चित्रकारी की गई है तो इसकी सुन्दरता बौद्धों की दृष्टि में श्रेष्ठ नजर नहीं आयेगी। लेकिन यदि उसी परदे पर सम्राट अशोक से सम्बन्धित कोई चित्रकारी, धर्म चक्र, अशोक लाट आदि की गई है तो वे कहेंगे कि देखो। सुन्दर चित्र है, कितना श्रेष्ठ चित्र है। कहने का तात्पर्य यह है कि वस्तु की श्रेष्ठता भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक धरातल पर भिन्न-भिन्न होगी। आइये, इसके लिए एक दूसरा उदाहरण लें। मान लो यदि किसान देश का कोई ऐसा व्यक्ति भारत आता है जिसे पहले से ही यह माल कि बाबा साहेब डा० अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को भारत में पुनर्जीवित किया है। यदि दिल्ली में घूमते-घूमते उसे अम्बेडकर भवन अचानक मिल जाता है तो वह भवन को देखकर उदास हो जाएगा क्योकि उसे अम्बेडकर भवन के डिजाइन में बौद्ध कला का कहीं भी दिग्दर्शन नहीं होगा। अम्बेडकर भवन का निर्माण अमेरिकी नमूने पर किया गया है। इस भवन को देखकर उस व्यक्ति की सांस्कृतिक चेतना पूरी नहीं होगी। 
समस्त विश्व के बौद्धों की दृष्टि में भारत का एक विशेष स्थान है। उनकी दृष्टि में उसके (भारत के) गीत हैं, पुस्तके हैं। वे सारिपुत्र और मोदगल्यान का भारत देखना चाहते हैं। यदि किसी बौद्ध देश का कोई व्यक्ति भारत आए तो उसे यहां बहुत ही ज्यादा सांस्कृतिक घटियापन नजर आएगा। जब वह हम लोगों को कोट, पैन्ट, टाई आदि वेशभूषा में देखेगा तो वह उदास हो जायेगा, क्योंकि इन वेश भूषा में उसे बौद्ध संस्कृति की झलक देखने को नहीं मिलेगी। वह कहेगा कि यदि बौद्ध संस्कृति को देखना है तो जापान जाओ, बर्मा, श्रीलंका जाओ, थाइलैण्ड जाओ। भारत में बौद्ध संस्कृति आज केवल खंडहरों में ही सीमित है। 
संस्कृति का मानदण्ड क्या है? जिसकी संस्कति जितनी ऊंची होती. है वह उतनी ही ऊंची श्रेष्ठता की कल्पना करता है। व्यक्ति के रूप में श्रेष्ठ कौन है? इतिहास में श्रेष्ठ पुरुष कौन है? इसका निर्णय कौन करेगा? यदि जवाहरलाल नेहरू से पूछा जाता कि भारतीय इतिहास का श्रेष्ठ पुरुष कौन है, तो वे कह सकते थे कि बुद्ध श्रेष्ठ पुरुष है, अशोक श्रेष्ठ पुरुष है । और लोग यह नहीं कह पाते । वे लोग कहते कि शंकराचार्य श्रेष्ठ पुरुष है। कहने का तात्पर्य यह है कि संस्कृति की धारणा श्रेष्ठता और हीनता का निर्णय करने के लिए होती है। 
भारतीय संस्कृति क्या चीज है? संस्कृति के साथ भारतीयता क्या चीज है ? सारे विश्व में संस्कृति है। तो फिर यह भारतीयता क्या है। जो उसे विश्व की अन्य संस्कृतियों से अलग करती है? 
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REPLY

Alok SahuAugust 17, 2021 at 11:32 PM
#भारत_के_आर्थिक लूट का हिन्दू समाज पर पड़ने वाले प्रभाव पर संवाद क्यों नही होता? 

यह वीडियो 2015 का है जिसमें शशि थरूर ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन में, पिछले 250 वर्षों में ब्रिटिश शासित भारत के धन वैभव लूट और भारत के वैभव और धन के हजारों वर्षों से स्रोत रहे #कृषि_वाणिज्य_शिल्प के विनाश के बारे में भारत का पक्ष्य रखा था। 
यह वीडियो जब शशि थरूर को भेजी गई तो उन्होंने इसे ट्वीटर पर अपलोड किया। उनकी पुस्तक "An Era of Darkness" में लिखते है कि यह वीडियो अपलोड करते ही वायरल हो गयी। और उनके धुर राजनीतिक विरोधी रहे संघी और भाजपाइयों ने उनको बधाइयां दिया। 
प्रधानमंत्री मोदी और तत्कालीन लोकसभा की अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने शशि थरूर को व्यक्तिगत रूप से बधाइयां दिया। 

मैं भारत के इसी आर्थिक इतिहास, और उसके लूट और विनाश का समाज पर पडने वाले दुष्प्रभाव का पिछले पांच वर्षों से लिखता आ रहा हूँ। 

उन्ही लुटेरों ने इस लूट और उसके दुष्प्रभावों को एकेडेमिया से गायब कर दिया और विलियम जोंस मैक्समुलर आदि द्वारा लिखे गए फेक लिटरेचर को भारत का इतिहास और सामाजिक शास्त्र की तरह प्रसारित किया। और 1901 के बाद इन फेक लिटरेचर के आधार पर भारतीय हिन्दू समाज की व्याख्या और वैधानिकरण करना शुरू किया। और आज वह फेक लिटरेचर आज संविधान का अंग है। 
कल की एक पोस्ट पर एक मित्र ने कमेंट किया था जिसमे उन्होंने संविधान में Aborigines शब्द का प्रयोग किया गया है। 
भारत के 99% पढ़े लिखे लोग इस शब्द की उत्पत्ति का इतिहास भी नही बता सकते।

आपसे आग्रह है कि इस आर्थिक इतिहास और भारत के विनाश के कारण भारतीय समाज पर पडने वाले प्रभाव को वैश्विक चर्चा का अंग बनाइये। 
जिससे राजनीतिज्ञों को भी इन षडयन्त्रों पर बात करने के लिए विवश हों।

  1. भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्व 
    भारतीय संस्कृति का मूलभूत तत्व है जीवन की अंतरंगता अर्थात अन्तर्जगत को देखना। एक बाह्य जगत है, और एक व्यक्ति है जिसके भीतर भी एक जगत है । कहते हैं कि भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक है। यह आध्यात्मिक शब्द बड़ा भ्रामक है। भारत में सभी लोग आध्यात्मिक शब्द का अर्थ अपने-अपने ढंग से करते हैं । भूत प्रेत की पूजा करने वाले भूत प्रेत को ही आध्यात्मिक कहते हैं। ईश्वरवादी, देववादी भी इसी को आध्यात्मिक कह देते हैं। कई लोग हनुमान को आध्यात्मिक कहते हैं। ये सभी बातें भ्रामक हैं। हम सब संस्कारों से प्रभावित हैं और संस्कारों का अपना अलग-अलग इतिहास होता है । वैदिक के साथ "संस्कृत" शब्द नहीं लगाना चाहिए । वैदिक धर्म कर्मकाण्डी धर्म था । उदाहरण के लिए, इसकी तुलना बम्बई के कसाई घर या बूचड़खाने से की जा सकती है। एक-एक यज्ञ के साथ बम्बई के बूचड़खाना जैसा कई कई बूचड़खाने होते थे। पुत्र पैदा करने के लिए भी यज्ञ (पुत्रोष्ठि यज्ञ) होता था । पुत्र का जन्म किसी और क्रिया से होता है लेकिन इसके लिए यज्ञ सम्पन्न किए जाते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि उस समय बहि रंगता का जोर था। लोगों को शूद्र, मलेच्छ,, अनार्य बनाकर रखना, यह सब बहिरंगता है । शराब, मैथून, भोग यह बहिरंगता है। यहां तक कि इनके सारे देवता भी भोगी थे । तरह-तरह के स्वर्ग बना दिए गए थे जहां भोग ही भोग होता था, मैथून ही मैथून । यह ऐहिकता है । इसके विरोध में भगवान बुद्ध ने आध्यात्मिकता की स्थापना की। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता मनुष्य के मन से शुरू होती है। धर्म आन्तरिक होता है, बाह्य नहीं। इस प्रकार भोगवादी संस्कृति के स्थान पर त्यागवादी, आध्यात्मिक संस्कृति की स्थापना करने का श्रेय बुद्ध को है। 
    इतिहास की दृष्टि से भगवान बुद्ध की विचारधारा से मिलती-जुलती विचारधारा वाले अन्य श्रमण लोग भी थे। यह सब मिलकर श्रमण संस्कृति कहलायी। भगवान बुद्ध इसके नेता थे। यही संस्कृति भारतीय संस्कृति का प्रधान बनी। बुद्ध ने कहा-जीवन का लक्ष्य बाहर नहीं, 'भीतर है और जो होता है वह बाहर के हस्तक्षेप से नहीं होता। मनुष्य प्रधान है । संसार का अच्छा-बुरा होना मनुष्य पर आधारित है । संसार को अच्छा बनाने के लिए भोगवादियों का कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि त्याग चाहिए। भौतिकता जीवन या संस्कृति का लक्ष्य नहीं हो सकता । भोग नहीं त्याग जीवन का लक्ष्य है। युद्ध, धर्म नहीं हो सकता, यह विवशता है। करुणा, मैत्री धर्म का अंग है। इसके विपरीत विकृति होगी। श्रेष्ठ और सुन्दर भीतर की सुन्दरता से होगा । कर्मकाण्ड समाज की व्यवस्था थी, जाति की व्यवस्था थी। इससे लोगों के अधिकार सीमित हो गये थे। बुद्ध ने इन सबको यह कहकर तोड़ा कि यह संस्कृति का अंग नहीं है। उन्होंने कहा-मनुष्य की आंतरिक अच्छाई मानवीय गुण है, वही श्रेष्ठ है। जो वैभवशाली है, भोग परायण है वह श्रेष्ठ नहीं, त्याग करने वाला श्रेष्ठ है। उन्होंने कहा-समाज में श्रेष्ठ कौन है? ब्राह्मण या भिक्षु? बुद्ध का उत्तर था कि भिक्ष श्रेष्ठ है। भिक्ष के अन्दर मानवीय गुणों का विकास होता है। उसके लिए जाति वैभव का प्रश्न नहीं है। भोगी नहीं योगी श्रेष्ठ है। देव से मनुष्य श्रेष्ठ है। देव भोग परायण है। उसके मुकाबले मनुष्य कर्मपरायण है, इसलिए मनुष्य श्रेष्ठ है । 
    .........५

    REPLY
    1. #मैन्युफैक्चरिंग_कास्ट_एंड_मनु :

      बाबा साहेब नग्रेजी ग्रंथो को पढे थे। संस्कृत ग्रंथ उनकी पहुंच से दूर नहीं थे। उन्होंने उंनको पढा नही था। क्यों ?
      क्योंकि उन्हें संस्कृत का ज्ञान नहीं था। 

      इसलिए उन्होंने अर्धशिक्षित धर्मान्ध ईसाइयों द्वारा दुर्व्याख्या किये गए ग्रंथो को पढ़कर यह समझ लिया कि वे वास्तव में संस्कृत ग्रंथो को पढ़ और समझ रहे हैं। वे इस भ्रम में आजीवन रहे। और उनके बाद उनके अनुयायी भी इसी भ्रम में जी रहे हैं। 

      उदाहरण स्वरूप उन्होंने एक विद्वान जॉन मूर द्वारा लिखित ग्रंथ #ओरिजिनल_संस्कृत_टेक्स्ट को आधार बनाकर "शूद्र कौन थे", नामक ग्रंथ का प्रतिपादन किया, जिसको आज भी सरकारी खर्चे पर छपवाकर बंटवाया जा रहा है। और भारत ही नहीं विश्व के समाजशास्त्री उसे एक ऐतिहासिक तथ्य की तरह संदर्भित करते हैं। यद्यपि डॉ आंबेडकर ने उसे एक हाइपोथिसिस ( काल्पनिक अवधारणा) ही बताया था। 

      वस्तुतः बाबा साहेब बहुत भोले थे। किसी ने अपनी पुस्तक के टाइटल में ओरिजिनल लिख दिया तो वे सहज विश्वास कर लेते थे। सो उन्होंने विश्वास कर लिया।

      भोले का अर्थ जानते हैं आप? भोला अर्थात अबोध। बालवत। बालक बुद्द्धि वाला। 

      इस ग्रंथ के ग्रंथकार की ओरोजिनालिटी चेक करने के लिए उसे खंगाला गया तो पता चला कि जॉन मूर ने लिखा है कि " संस्कृत ग्रंथो के अनुसार "कास्ट का अर्थ चमड़ी का रंग" होता है"।

      इसके पहले के नग्रेज संस्कृतज्ञ "वर्ण का अर्थ चमडी का रंग" बताते आये थे। 

      संस्कृत उंनको आती नही थी। यह बात उन्होंने अपनी पुस्तक में स्वयं स्वीकार किया है।

      1901 के जनसंख्या कमिश्नर एच एच रिश्ले ने लिखता है कि मनुस्मृति में चार कास्ट का वर्णन है। और उसके बाद यह झूंठ सरकारी गजट में प्रसारित प्रचारित होने लगी।

      रिश्ले जैसे विद्वानों को वर्ण और कास्ट का भेद नही पता था।

      तदोपरांत सरकारी कागजों और एकेडमिक पुस्तकों में बारंबार यही झूंठ दोहराया जाने लगा। इसके 3 दशक बाद जब बाबा साहेब राजनीति में आये तो हर पढें लिखे व्यक्ति को यह पता चल चुका था कि कास्ट की उतपत्ति मनुस्मृति से हुई है, और इसके मूल में ब्राम्हणवादी व्यवस्था थी। और बाबा साहेब कास्ट के बहुत बड़े विरोधी थे यह जगविदित है। उनका एक जगत प्रसिद्ध Undelivered lecture है विश्व प्रसिद्ध - Annihilation of Caste. उसका विनाश जिसके बारे में न उनको कुछ पता था न उनके बौद्धिक मार्गदर्शकों को। बस इतनी सी बात को उन्होंने दिल से लगा लिया। वरना उनको क्या लेना देना किसी स्मृति से ? 

      कौवा कान ले गया । यह बात जोर शोर से प्रसारित की गई। तो बाबा ने कान चेक करने के बजाय कौवे को दौड़ा लिया। 

      और मनुस्मृति को आग लगा दिया। 

      भविष्य के इतिहासकार उन्हें आधुनिक बख्तियार खिलजी की उपाधि से नवाजेगे। 

      बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय के ग्रंथालय को जलाया था।
      आधुनिक बख्तियार में ग्रन्थ को। 
      ग्रन्थ को जलाने की परम्परा दस्युवों और लुटेरों की है। हमारी संस्कृति में ग्रन्थ का खंडन किया जाता है। चार्वाक को भी हमने ऋषि कहा। न उसको जलाया न उसके दर्शन को। 

      पुस्तक और पुस्तकालय जलाने वालों को आधुनिक इतिहासकार और लिबरल विद्वान की उपाधि देते हैं।

      जय भीमकाय भारत।

      #बाबा_बख्तियार या #छोटा_बख्तियार एक उचित टाइटल होनी चाहिए उनकी। 

      होनी चैये कि नहीं होनी चैये ?

  2. सारी वैदिक (भोगवादी) संस्कृति का एक ही नारा था-गो ब्राह्मण हिताय । गौ धन का प्रतीक है। गौ का तरह-तरह से उपभोग और ब्राह्मणों के मंत्रों का उपयोग-गौ और ब्राह्मण सुरक्षित रहें, यही उसका नारा था। इसके विपरीत, भगवान बुद्ध ने बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय का नारा बुलन्द किया। उन्होंने कहा-गो ब्राह्मण हिताय नहीं, बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय । भगवान बुद्ध का यह नारा इस देश के कुटिल कपटी, मानवता के घोर शत्रु स्वार्थी भोगवादी ब्राह्मण वादियों को भला कैसे सहन हो सकता था। इसलिए उन्होंने इसको नष्ट करने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। तरह-तरह के छल, कपट प्रपंच रचकर बुद्ध को भुलवाया गया। भोगवादी संस्कृति ने इस देश पर फिर से कब्जा कर लिया। लेकिन उसी तरह से जैसे मिट्टी का घड़ा घी को सोख लेता है, परन्तु उस घड़े को सूंघने से घी की गन्ध फिर भी आती है, ठीक उसी तरह से ब्राह्मण संस्कृति ने भगवान बुद्ध के त्यागवादी संस्कृति पर कब्जा कर लिया लेकिन हजारों वर्ष के गुजर जाने के बावजूद ब्राह्मण संस्कृति से भगवान बुद्ध की त्यागवादी संस्कति की गन्ध आज भी आ रही है। हमें सारे सिद्धों, नायों और सन्तों की वाणी में भगवान बुद्ध की त्यागवादी आध्यात्मिक वाणी की सुगन्ध मिलती है। हजारों सालों से नष्ट करने के बावजूद उस बाणी में आज भी आकर्षण है । और यही कारण है कि आज भी लोगों को सन्तों की वाणी अच्छी लगती है। गांवों में अनेकों लोग ऐसे मिलेंगे जो व्रत नहीं रखते, तीर्थ नहीं जाते, यज्ञ नहीं करते । जब उनसे पूछा जाता है तो वे कहते हैं कि मन शुद्ध है तो सब कुछ शुद्ध है। भीतर को ठीक रखो, बाहर में क्या रखा है। नेक बनो, दूसरों की सहायता करो। यह जो कुछ हमारे जीवन में अच्छाई रह गई है, वह सब बुद्ध की वाणी है, यह सब उसी महापुरुष की देन है जिसे हजारों तरह से विकृत करने की चेष्टा की गई । इह सम्बन्ध में एक दो बातों का स्मरण रखना आवश्यक है : 
    भारतवर्ष कैसे फैला? भारतीयता कैसे फैली? वैदिक धर्म कहाँ गया? कहाँ फेला? वैदिक धर्म ने इस देश को खण्डित किया। यदि बौद्ध धर्म और बुद्ध नहीं होते तो यह देश आज एक न होता । अशोक से गुप्तकाल तक उनके देश के सब लोग बौद्ध बन गये। ब्राह्मण कहते थे कि यहां न आओ अन्यथा भ्रष्ट हो जाओगे। वे आस-पास के प्रदेश की यात्रा को पाप समझते थे और कहते थे कि नदी पार करने पर नरक की प्राप्ति होती है। आज भी कर्मनासा नदी, जो बनारस के पास है, को लांघना अनिष्ट बताते हैं क्योंकि इस नदी के उस पार की भूमि बुद्ध की भूमि रही है। आज भी लोग उस नदी का पानी नहीं छूते । बाढ़ आने पर लोग नाव में इस तरह से चढ़ते हैं कि पानी में पैर न लगे। कबीर ने कहा कि यदि काशी में रहने से ही मुक्ति होती है तो वह मगध में जाकर क्यों न मरे क्योंकि वह बुद्ध की कर्म भूमि है। इसीलिए कबीर मगध में जाकर मरे। 
    .................६

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    1. #नायकों_का_इति_हास्य ?

      बाबा बख्तियार के पिता और बाबा का नाम भी पता है और उनकी तीन पीढ़ियों के कृत्य भी।

      मान्यवर काशीराम के पूर्वजों के बारे में यह सब गुप्त क्यों रखा गया है?
      उनके पिता, पितामह, और प्रपितामह कौन थे?

      गूगल को यह बात बताना चैये?

      गूगल न भी बताए - तो आप बताएँ - जो भजते हैं मान्यवर को ?

      जाति का इतना ही अर्थ था भारतीय परिपेक्ष्य में - जाति का अर्थ था कुल। किस कुल से तुम हो, उससे तुम्हारे बारे में एक समझ विकसित हो सकती है।

      जासूसी के इस युग में कौन किसका जासूस है, और किसका दलाल, यह जानना सम्भव नहीं है। 

      कास्ट क्या है?
      वह न वर्ण है न जाति।

      संविधान के एक्सपर्ट ही बता सकते हैं कि यह क्या है और कैसे आयी भारत में। 

      3000 साल का इतिहास खंगालने वाले बुद्द्धि बीमारों को इतिहास नायकों के 100 साल का इतिहास तो जानना ही चाहिए।

      नहीं ?

  3. जब अंग्रेजों के साथ संबंध स्थापित हुआ तो उन्होंने चाहा कि हिन्दुस्तानी बूचड़ समुद्र पार कर यूरोप जाएं और इंग्लैण्ड देखें। लेकिन उनका कहना मानकर जो भी इंग्लैण्ड गये वे सबके सब जाति से बहिष्कृत कर दिये गए। क्या यही संस्कृति है? इनके साथ संस्कृति शब्द को जोड़ना, संस्कृति शब्द का अपमान करना है, उसका दुरुपयोग करना है। इन लोगों ने सारे देश को नरक बना दिया। हिन्दु धर्म के साथ संस्कृति शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता। संस्कृति के असली उत्तराधिकारी वे लोग हैं जिन्होंने नदी पार की, समुद्र पार किया और बुद्ध के संदेश को सारे संसार में फैलाया तथा उसे आलोकित किया। उन्होंने सांस्कृतिक विस्तार के द्वारा विभिन्न देशों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित किया। संस्कृति का लक्षण हम बौद्धों के अनुकल और हिन्दुओं के प्रतिकूल है। जब बोधिसत्व बाबा साहेब डा० अम्बेडर ने लाखों करोड़ों लोगों को इकट्ठा किया और उन्हें बुद्ध की शरण में ले आये तो क्या यह भारतीय संस्कृति का काम नहीं है? निस्सन्देह ऐसा करके बाबा साहेब ने भारतीय संस्कृति का उद्धार किया है। यह महान कार्य बाबा साहेब ही कर सकते थे। 
    भारतीय संस्कृति के तीन प्रवाह 
    भक्ति, ज्ञान और कर्म, भारतीय संस्कृति के तीन प्रवाह माने जाते हैं। इनके विकास में बौद्धों ने अपना अमूल्य योगदान दिया है। इसी की प्रेरणा से बौद्धों ने बड़े-बड़े काव्य लिखे, ग्रन्थ लिखे, कथाएं लिखी और मूर्तिकला, वास्तुकला आदि विविध कलाओं का विकास किया। भगवान बुद्ध की मूर्ति पर जो शांति झलक रही है उसमें सारी आध्यात्मिकता को पत्थर पर तरासकर उतार देना, यह कितनी आश्चर्यजनक चीज है । सारनाथ की बुद्ध प्रतिमा को देखो, चाहे मथुरा की बुद्ध प्रतिमा को देखो, सबमें आध्यात्मिकता झलकती है। तिब्बत, चीन, जापान के चित्रों में किस प्रकार आध्यात्मिकता उभारी गई! यह है भारतीय संस्कृति जिसे हमें संजोकर रखना है, दूसरों के आक्रमण से बचाना है। बाबा साहेब डा० अम्बेडकर के अनुयायियों का यह परम पुनीत कर्तव्य है कि वे इस महान संस्कृति को इसके उत्तराधिकारी के रूप में इस विशाल भूमि पर पुनः प्रतिष्ठित करें।
    ----------------------------------------------------------------------समाप्त

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    1. यदि आज आप देखिएगा तो इन्फोसिस या ऐसी अन्य अनेकों कंपनियां जो देश ही नहीं विश्व में अपना झंडा गाड़े हुए हैं वह एक स्किल्ड और स्वरोजगारी व्यक्ति के श्रम से निर्मित हुयी हैं। 
      आज भी भारत की 14% जीडीपी organised कॉरपोरेट से और 50% जीडीपी unorganised सेक्टर से आता है। सरकार 18% और कृषि 18% जीडीपी उतपन्न करती है। यह आंकड़ा इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर वैद्यनाथन के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। 
      भारत और विश्व के आर्थिक इतिहास से आज सब परिचित हैं। मुग़ल जब आये तो भारत विश्व के 33% जीडीपी का उत्पादक था। उनके जाते जाते यह गिरकर 24% हो गया। अंग्रेज के आने के समय यह 24% था। उनके जाते जाते यह गिरकर मात्र 1.8% बचा। और स्वतंत्रता के बाद भी उसी पर तब तक टिका रहा जब तक नरसिंहराव की सरकार नहीं आयी। तबसे यह बढ़ रही है। आज इसकी जीडीपी सम्भवतः विश्व जीडीपी की छह या सात प्रतिशत होगी। ( यह आंकड़े पॉल बैरोच और अंगुस मैडिसन द्वारा एकत्रित किये गए हैं।)

      1800 के आस पास जब भारत की जीडीपी लगभग 19% के आस पास थी। उसी समय डॉ फ्रांसिस हैमिलटन बुचनन ने दक्षिण भारत का एक सर्वे रिपोर्ट तैयार किया था। लगभग 1450 पेज की रिपोर्ट है। उसने दक्षिण भारत के केनरा के दक्षिणी भाग की जनगणना प्रस्तुत किया है (A journey from Madras through vol iii p.8) जो निम्नवत है:
      .कास्ट/ ट्रेड्स की संख्या - 122
      . घरों की संख्या - 79,856
      .कुल जनसंख्या - 396,672
      पुरुषों और बालकों की संख्या - 206,681
      महिला और बालिकाओं की संख्या - 190,039

      अब यहां एक मजेदार आंकड़ा और है।
      किलाबंद अर्थात आर्किटेक्ट वस्ततः किलों के निर्माताओं की संख्या - 14. कुल चार घर 3 पुरुष 7 महिलाएं और 4 बालिकाएं।
      Corchey अर्थात - डे labourer अर्थात उनस्किलड व्यक्तियों के कुल घर की संख्या 3, पुरुषों की संख्या 11, बालकों की संख्या 4, महिलाओं और बालिकाओं की संख्या 18। कुल मिलाकर मात्र 33 लोग। 

      अर्थात लगभग 99% से अधिक लोग स्किल्ड और स्वरोजगारी। 

      अगले सौ वर्षों में क्या हुवा यह सबको पता है। 1900 आते आते भारत की जीडीपी नष्ट कर दी गयी और वह मात्र 1.8% बची। करोणों भारतीय बेरोजगार हो गए। मनी ड्रेन नामक एक शब्द निर्मित किया गया - उस लूट के लिए जो उन्होंने डायरेक्ट लूट किया। इंडिरेक्ट लूट का आज भी कोई हिसाब नहीं है। 
      बेरोजगारी ने उन्हें - भूखमरी और संक्रामक रोगों का शिकार किया। जिनके चपेट में आने के कारण 3 से 4 करोड़ लोगों की मृत्यु हो गयी। 
      अभी पिछले वर्ष भाजपा के विदेशमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर इस लूट को सार्वजनिक किया - 45 ट्रिलियन डॉलर जो आज की तिथि में ब्रिटेन के 17 साल के जीडीपी के बराबर है। यही बात शशि थरूर ने 2015 में ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन में बोली थी जिनका वीडियो ट्वीटर पर वायरल हुआ।
      अनेको अनेक कारणों से यूरोपीय और ब्रिटिश ईसाइयों ने 1857 के बाद भारत के बारे में अफवाहजनक साहित्य की रचना करना शुरू किया। जिसको यूनिवर्सिटी कॉलेज पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से शिक्षित भारतीयों के मन में भरकर उनका माइंड सेट किया गया। जिसका परिणाम हुवा। वह परिणाम आज भी स्पष्ट रूप से गहरे तल पर देखा जा सकता है। 
      आरक्षण की नीवं भी इसी भ्रामक साहित्य का परिणाम है। मनुष्य लोभ और लाभ का गुलाम है। स्पष्ट सी बात है कि जिसे लाभ मिल रहा है वह उसी कल्पित इतिहास को सच मानेगा। 
      अब यहाँ एक प्रश्न और उठता है। भारत हजारों वर्ष से वैभवशाली देश रहा है। वही आर्थिक इतिहासकार बताते हैं यह बात। तो प्रश्न उठता है कि उस वैभव का निर्माण किस तरह होता था? क्या इस पर विचार नहीं होना चाहिये?
      दूसरी बात आरक्षण के कारण भारत का एक बड़ा वर्ग विदेशों में जाकर बसने को विवश हुवा है - जिसे ब्रेन ड्रेन कहा जाता है। 
      यदि स्किल्ड भारतीय अपना श्रम विदेश में व्यय करेगा तो लाभ भी विदेशियों को ही मिलेगा। इसमें कोई संशय नहीं है। 
      1807 में लिखी गयी यह पुस्तक आज भी गूगल आर्काइव में सुरक्षित है। बिना शुल्क दिए इसे डाउनलोड कीजिये और पढिये। किसी भी देश और समाज का आकलन आर्थिक आधार पर ही सम्भव होता है। बाकी कोरी गप्प कुंठित मानसिकता को जन्म दे सकता है विवेक को नहीं।

      यह लेख कितना समझ में आएगा कितना नहीं यह आकलन मैं नहीं कर सकता।

  4. बौद्ध दष्टि में अस्तित्व की अवधारणा और उसका सामाजिक सन्दर्भ
    – डा. जगन्नाथ उपाध्याय

    सम्पूर्ण भारतीय दर्शनों के बीच बौद्धों की अस्तित्व सम्बन्धी अबधारणा मौलिक रूप से अत्यन्त भिन्न रही है। परम्परा के अनुसार अस्तित्व का जड या चेतन में विभाजन करें तो उनका किसी भी अवसर में कालिक या दैशिक स्थिरता या दीर्घता नहीं मिलती। अस्तिता या चेतन वह पदार्थ-बिन्दु है, जिसकी परिभाषा मात्र प्रयोजन-निष्पत्ति है। प्रयोजन-निष्पत्ति वस्तु की असाधारणता को स्पष्ट करती है। अस्तित्व का महत्व विशेष ही होता है सामान्य नहीं। प्रतीतिगत सामान्य का अस्तित्व असाधारणता के अर्थ में स्वीकार नहीं किया जाता । अस्तित्व की असाधारणता का अधिक स्पष्टीकरण उनमें गभित नास्तित्व से होता है। 'उत्पत्ति के अनन्तर विनाश' यह बाह्य और अन्तर पदार्थों की नियति है। इन दोनों के बीच अन्तर सिर्फ इतना ही है कि अस्तित्व प्रयत्न-साध्य होता है जबकि नास्तित्व के लिए अतिरिक्त प्रयत्न नहीं करना पड़ता। अस्तित्व सकारण और नास्तित्व अकारण' का सिद्धांत बौद्धों की अस्तित्व सम्बन्धी सारवत्ता को खड़ा करता है। इस तरह सभी प्रकार के अस्तित्व अपने नास्तित्व से सम्पूटित रहते हैं। उत्पत्ति के साथ ही विनाश की यह जानवार्यता बस्तित्व,देशिक और कालिक विस्तार या देध्यं की संभावना माप्त कर दता है। यह ध्यान देने की बात है कि उत्पत्ति और विनाश के बीच कहीं भी स्थिरता के लिए अवकाश नहीं है । अस्तित्व का बार प्राकलन सामान्यगत प्रवाह के रूप में ही संभव है, जिसमें सादृश्य-बोध का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इस प्रकार जब स्थिरता के लिए किसी प्रकार की गुजाश नहीं है तो वस्तुगत नित्यता की बात करना तो अस्तित्व को नहीं समझना है । ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता एक ही अस्तित्वनिन्ट के त्रिघा विभाजन या विश्लेषण हैं। इसका अनुभव ही वास्तविक अस्तित्व-बोध है। प्रातीतिक स्तर इससे भिन्न है। अस्तित्वानभव की सूक्ष्मता इससे अधिक स्पष्ट होती है कि भाषा सीधे अस्तित्व को विषय नहीं बना पाती, अन्यव्यावृत्ति के द्वारा वस्तु की व्यावहारिक प्रतीति करा पाती है । संक्षेप में, यही अस्तित्व की वस्तुगत एवं प्रातीतिक अवधारणा है ।

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    1. आइये जाने क्या कहते है हिंदू धर्म के बारे में पश्चिमी (philosophers) विचारक....
      🚩
      कितना महान है हमारा हिन्दू धर्म
      💥
      1. लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):
      "हिन्दू और हिन्दुत्व ही एक दिन पूरी दुनिया पर राज करेगा क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है"।
      💥
      2. हर्बर्ट वेल्स (1846 - 1946):
      " हिन्दुत्व का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिणत पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी । तभी एक दिन पूरी दुनिया इसकी ओर आकर्षित हो जाएगी और उसी दिन ही दिल शाद होंगे और उसी दिन दुनिया आबाद होगी सलाम हो उस दिन को " ।
      💥
      3. अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 - 1955):
      "मैं समझता हूँ कि हिंदुओं ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया है जो यहूदी न कर सकें, हिन्दुत्व में ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती है"।
      💥
      4. हसटन स्मिथ (1919):
      "जो विश्वास हम पर है और हम से बेहतर कुछ भी दुनिया में है तो वो हिन्दुत्व है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी"।
      💥
      5. माइकल नोस्टरीडाम (1503 - 1566):
      " हिन्दुत्व ही यूरोप में शासक धर्म बन जाएगा बल्कि यूरोप का प्रसिद्ध शहर हिन्दू राजधानी बन जाएगा"।
      💥
      6. बर्टरांड रोसल (1872 - 1970):
      "मैंने हिन्दुत्व को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है, हिन्दुत्व पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में हिन्दुत्व के बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि हिन्दू ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना होगा "।

  5. प्रयोजन की निष्पत्ति का सिद्धांत कार्यकारण के सिद्धांत से अतिमा रूप में सम्बद्ध है । जैसे प्रयोजन-निष्पत्ति अनित्यता पर आधारित है वो ही कार्यकारण भाव की व्यवस्था भी। अनित्यता की दष्टि से कार्य और कारण के बीच भी कोई अन्तर नहीं है । जैसे कार्य अपने कारणों से उत्पन्न और अनित्य है, वैसे ही कारण भी अपने कारणों से उत्पन्न और स्वयं में अनित्य है । 'कार्य से पूर्व होना' मात्र कारणता है । कारण स्वयं अनित्य रहकर ही अनित्य कार्य को उत्पन्न कर सकते हैं। जैसे कार्य का किंचित्मात्र अस्तित्व कारण में नहीं होता, वैसे ही कारण भी किंचित मात्र कार्य में अनुस्यूत नहीं होते । इस प्रकार कारणता एक संकेत मात्र है । उससे एक ओर कार्य को अस्तित्व मिलता है दूसरी ओर किसी कार्य या घटना की आकस्मिकता या रहस्यमयता खण्डित होता है। कर्ता भी कारणों में से ही एक है, अतः उसका अस्तित्व भी अन्य की तरह ही अनित्यता से कवलित है । किसी भी दशा में किसी घटना के घटकों में से कोई भी एक अशतः या पूर्णतः अनित्यता एवं परिवर्तन से अस्पृष्ट या तटस्थ नहीं रह सकता। वास्तव मे कर्ता, कर्म, करण आदि किसी एक घटना के विश्लेषण का प्रयास करते हैं।
    प्रयोजन-निष्पत्ति के द्वारा जिस अस्तित्व-बिन्दु को समझने की यहाँ चेष्टा की गई है, इसे अधिक स्पष्ट करने के लिए इस प्रश्न का उत्तर देना चाहिए कि क्या अस्तित्व की कोई अपनी आत्मा, केन्द्र अवयवी या स्वभाव होता है ? स्थिरता एवं नित्यता के अर्थ में आत्मा या स्वभाव आदि से सम्बन्धित यदि प्रश्न है, तो उसका बौद्ध सम्मत उत्तर 'नहीं' में होगा । इसके भिन्न अभिप्राय से किये गये प्रश्न के मोटे रूप में दो उत्तर होंगे । एक वस्तुवादी दार्शनिकों द्वारा अनित्य सद्-बिन्दू के रूप में, दूसरा शून्यवादी दार्शनिकों द्वारा सर्वथाअनात्म, निःस्वभाव एवं अस्वीकार के रूप में। इन दो परस्पर विरोधी उत्तरों में भी अस्तित्व की प्रयोजननिष्पत्ति बाधित नहीं होती। अस्तित्व के सम्बन्ध में ये दोनों निष्कर्ष कार्यकारण सिद्धान्त 'प्रतीत्य समुत्पाद' से ही प्रतिफलित होते हैं। दोनों के दर्शन भिन्न हैं अतः जीवनादर्श भी भिन्न हैं, किन्तु अस्तित्व की अवधारणा बहुत कुछ समान है। एक सत्ता-आधारित अस्तित्व है और दूसरा अनस्तित्वाधारित अस्तित्व है। जहां तक अस्तित्व की अवधारणा की सुसंगति और उसके व्यापक आयाम का प्रश्न है उसमें प्रथम (सत्ताधारित) पक्ष से द्वित्तीय (असत्ताधारित) पक्ष अधिक महत्वपूर्ण है। इन दोनों की स्थितियों में जो अन्तर है, वह आगे स्पष्ट होगा।

    REPLY
    1. 💥
      7. गोस्टा लोबोन (1841 - 1931):
      " हिन्दू ही सुलह और सुधार की बात करता है । सुधार ही के विश्वास की सराहना में ईसाइयों को आमंत्रित करता हूँ"।
      💥
      8.बरनार्डशा (1856 - 1950):
      "सारी दुनिया एक दिन हिन्दू धर्म स्वीकार कर लेगी, अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी।
      पश्चिम एक दिन हिन्दुत्व स्वीकार कर लेगा और हिन्दू ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा "।
      💥
      9. जोहान गीथ (1749 - 1832):
      "हम सभी को अभी या बाद में हिन्दू धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही असली धर्म है, मुझे कोई हिन्दू कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा ।
      मैं इस सही बात को स्वीकार करती हूँ ।
      🚩
      वाह!!! कितनी ऊँची समझ के धनी है ये विचारक!!!
      🚩
      अगर यही बात धर्मांतरण करने वाली ईसाई मिशनरियाँ भी समझ ले तो देश में सुख-शांति अमन-चमन का वातारण बन जाये।
      हिन्दू धर्म की स्थापना किसी व्यक्ति, देवता या महापुरुष की देन नही है। बल्कि सभी इसी धर्म में अवतरित हुए है।
      ईसाई धर्म कब से शुरू हुआ और किसने शुरू किया हम बता सकते है लेकिन हिन्दू धर्म कबसे और किसके द्वारा शुरू हुआ ये कोई नही बता सकता।

  6. उपर्युक्त विवेचन से इतना तो स्पष्ट है कि अस्तित्व के संदर्भ में गतिहीनता या नित्यता के लिए किसी प्रकार की भी गुजाइश नहीं है। इसलिए आत्मवादी ईश्वरवादियों से बौद्धों की अस्तित्व-धारणा नितान्त भिन्न है। किन्तु इसका ध्यान रखना होगा कि बौद्धों द्वारा शाश्वतवाद का विरोध उन्हें उच्छेदवादी नहीं बना देता। उच्छेदवाद का पर्यवसान जीवन की निरन्तरता को अस्वीकार करने में होता है, जबकि बौद्ध जीवन को गतिमय प्रवाह में देखते हैं । शाश्वत एवं उच्छेददृष्टियों से प्रतिफलित जीवन-मूल्य प्रायः समान होते हैं, जबकि बौद्धों का मध्यम-मार्ग इन दोनों का निषेध है । यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो जीवन और दर्शन के प्रत्येक स्तर पर शाश्वतवादी एवं उच्छेदवादी प्रवृत्तियों का विभाजन करती है। और उनका वर्जन कर नये जीवन मूल्यों की स्थापना के लिए अवसर देती है । मध्यम-मार्ग एक सम्यक् दृष्टि और सम्यक-जीवन है, जो प्रत्येक नय सन्दर्भो में मिथ्या दृष्टियों का प्रहाण करता है।
    मानव के सन्दर्भ में अस्तित्व की अवधारणा में एक ऐसे विशप व्यक्तित्व का संयोजन होता है, जो स्वयं में न तो नित्य एवं रहस्य और न उनके संयोजन में अनित्य बाह्य शक्तियों के हस्तक्षेप की गुंजाइश है। मानव व्यक्तित्व में एक ओर जड और चेतन सहवर्ती रूप में रहत है। दूसरी ओर चेतना और उसके सभी व्यापार एवं प्रवृत्तियां सहयुक्त एवं आत्योन्याश्रित रहती है। जड़ से चेतन या चेतन से जड़ का प्रश्न यहां नहीं है और न तो चेतना और उसके व्यापारों के बीच परस्पर में आश्रयआश्रयी-भाव है। मनुष्य को अपने जीवन के साथ ही कुछ प्राकृतिक साधन एवं कुछ सहज एषणाएं प्राप्त हैं, जो उसके व्यक्तित्व के विभिन्न अंग हैं। प्राप्त साधनों के प्रयोग के बीच उसके विवेक का स्वातंत्र्य विकसित होता है। उसमें अनेक ज्ञात प्रवृत्तियों के साथ कुछ अज्ञात तत्व भी रहते हैं। अज्ञात अंश भी उपार्जित हैं, जो अविज्ञापित रहकर उसके पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करते रहते हैं । इस जीवन-सातत्य में बौद्धों का कर्म सिद्धांत बहुत ही महत्वपूर्ण है जो पूर्व से पर के जीवन को जोड़ता है। कर्म मल में एक चेतना है जो मानव व्यापार के रूप में खड़ा होता है। कार्य-वाक आदि अन्य सभी व्यापारों का वही प्रेरक है। सम्पूर्ण कर्म चेतना के रूप में व्यक्तित्व से अभिन्नता प्राप्त करते रहते हैं। सभी दशा में व्यक्ति की स्वतन्त्रता अक्षुण्ण रहती है। कुशल-अकुशल, उचित-अनुचित, पापपुण्य, नीति-अनीति के निर्धारण में तथा अन्य का निषेध कर अन्य के वरण में व्यक्ति स्वतन्त्र है। व्यक्तित्व की अनन्यता की पहचान उसकी स्वतन्त्रता है। व्यक्ति की अनन्यता उसकी स्वतन्त्रता है । यह ठीक है कि चित्त व्यक्ति का अपना है किन्तु वह अन्योऽन्यापेक्ष अनेकानेक कारणों से मिलकर निमित है। एक ऐसे बड़े परिवेश में उसका व्यक्तित्व खड़ा है कि जगत से विच्छिन्न कर उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। उस परिवेश के अन्तर्गत ही उसमें उत्तरदायित्व की चेतना भी खड़ी होती है। किन्तु बाहरी आरोपण या दबाव में न आकर उत्तरदायित्व की भावना को उत्तरोत्तर मूल्य प्रदान करना और उसे समाज में स्थापित करना व्यक्तित्व का शौर्य है । सतत गतिशील अस्तित्व के प्रवाह में अतिक्रमण की पूरी सम्भावना सुरक्षित है । 

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    1. ईसाई धर्म कब से शुरू हुआ और किसने शुरू किया हम बता सकते है लेकिन हिन्दू धर्म कबसे और किसके द्वारा शुरू हुआ ये कोई नही बता सकता।
      हिन्दू धर्म पुरातन नही सनातन है। भगवान ने भी जितने अवतार लिए वो हिन्दू धर्म में ही लिए ।
      हमारा सौभाग्य है क़ि ऐसी महान संस्कृति में हमारा जन्म हुआ।
      आओ अपने महान हिन्दू धर्म...अपनी महान संस्कृति पर गर्व करें जिसने हर व्यक्ति हर प्राणी को अपनाना सिखाकर आपसी भाईचारे व सदाचार का पाठ पढ़ाया।
      मुझे गर्व है क़ि मैं हिन्दू हूँ और आपको भी है तो इस पोस्ट को आगे जरूर शेयर करें।
      🚩
      सनातन संस्कृति की जय
      🚩

  7. व्यक्ति अपना विधाता स्वयं है, वह आत्म-दीप और अनन्य शरण है। उसमें अपना निरीक्षण करना और अपनी ही बौद्धिक प्रामाणिकता के आधार पर हेय और उपादेय का निर्णय लेना, सहज हो जाना चाहिए । ऐसे निर्णय की प्रामाणिकता का आधार होता है श्रेष्ठ प्रयोजन की निष्पत्ति, जो व्यक्तित्व के बौद्धिक अस्तित्व को अर्थवत्ता प्रदान करती है । इस प्रक्रिया में व्यक्ति को मूल्यात्मक उत्तमता के विकास का अवसर मिलता है। स्वगत हीनांश के विरोध में स्वयं ही प्रतिपक्ष खड़ा कर 'सम्यक' अस्तित्व का वरण करना, व्यक्ति का निरपेक्ष पुरुषार्थ है । कहना नहीं है कि व्यक्ति के अस्तित्व के अन्तर्गत ही है-उत्पत्ति-विनाश, सत्यप्रसत्य और निषेध-निर्माण । स्पष्ट होगा कि व्यक्तित्व का संकट और उसका निवारण उसके अस्तित्व का ही अंग है। एक ओर व्यक्ति ने मिथ्या धारणाओं के आधार पर एषणाओं को बढ़ाया है और उसकी तप्ति में राग-द्वेषादि से प्रेरित सम्बन्धों को खड़ा किया है। तो दूसरी ओर यथाभूत सत्य के आकलन के आधार पर एक ऐसा मार्ग भी रखा है, जिससे वह अपनी मिथ्या रचनाओं का अतिक्रमण कर सके । 
    वास्तव में अस्तित्व 'जो है' उतना मात्र है, किन्तु 'जो था', 'जो होना है उन्हें भी वह अपने स्व में रखता है । इस प्रकार का स्वत्व-बोध परत्व के प्रसंग में ही संभव है। इस प्रकार व्यक्ति का दूसरों से सम्बन्ध उसके व्यक्तित्व का अंग बन जाता है। व्यक्ति का अन्य व्यक्ति या समाज से सम्बन्ध किस प्रकार का होगा, यह निर्भर करता है, अस्तित्व सम्बन्धी उनकी अवधारणा पर । बौद्ध-दृष्टि में तृष्णा वह विभाजक रेखा है, जिसके आधार पर श्रेष्ठता या हीनता का निर्णय लिया जा सकता है। तृष्णा दृष्टि है और व्यवस्था भी है। तृष्णा की मूल वे मिथ्या-दृष्टियां हैं, जो व्यक्तित्व को अयथार्थ बना देती हैं। व्यक्ति के साथ अपनी और अपने परिवेश की अभिलाषाएं और आकांक्षाएं सापेक्ष समूह के रूप में जुटी हुई हैं। उसके साथ व्यक्ति का जितना और जैसा आग्रह एवं तृष्णा लगी रहेगी, उसी के अनुपात में स्व-पर के बीच परिग्रह और द्वेषादि से प्रेरित उसके सम्बन्ध खड़े होंगे।
    व्यक्ति की स्वतन्त्रता के प्रसंग में व्यक्तित्व के परिष्कार की बात ऊपर कही गई है। उसके बावजूद क्या किसी ऐसे जीवनास्तित्व का कल्पना की जा सकती है जिसमें जगत के साथ स्वापेक्षी सम्बन्धी जगह नये प्रकार के सम्बन्धों को खडा किया जा सके ? बौद्ध दाट उत्तर में यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति जैसे अपने श्रेष्ठ एव जान णिक अस्तित्व को जानकर हीन आकांक्षाओं और अभिलाषाओं के स्थूल बन्धनों का अतिक्रमण कर सकता है, वैसे ही उन सारे आधारों को भी | तोड़ सकता है, जिन पर उसके व्यक्तित्व की सारी इमारत खड़ी है। यह एक प्रकार का व्यक्तित्व-विलोप है, जो व्यक्ति का परम पुरुषार्थ है। इस पर यह शंका व्यक्त की जा सकती है कि क्या यह व्यक्तित्व की विशेषता है, तो इसके लिए क्या व्यक्ति प्रवृत्त हो सकता है ? उत्तर है कि यह तष्णा की विशेषता है, और तृष्ण-हीन व्यक्तित्व की कल्पना की जा सकती है।
    प्रश्न है कि अस्तित्व ग्रह जब स्वयं में एक तृष्णा है, तो क्या उसका अतिक्रमण करना स्व-स्कन्धारोहण के समान असम्भव नहीं होगा? असम्भव नहीं होगा, क्योंकि व्यक्तित्व का कुशल-अकुशल दोनों ही पक्ष व्यक्ति की स्व-निर्मित हैं। कुशल के द्वारा अकुशल का अपनयन, श्रेष्ठ तृष्णा से हीन तृष्णा का अपनयन है, पुनः आधारभूत तृष्णा को निःशेष करना, जिससे आगे चलकर इस प्रकार के नैतिक द्वन्द्वों की समस्या व्यक्ति या समाज में खड़ी न हो, इसकी पूरी सम्भावना है। इस अवस्था में कारणों का केवल अपनयन मात्र नहीं होता, प्रत्युत उनका सर्वथा अभाव हो जाता है । बौद्ध-दृष्टि में यह निर्वाण-प्राप्त जीवन की अवस्था है । यह आधारभूत व्यक्तित्व का मूलभूत परावृत्ति है या परिवर्तन है, या निषेधारित नव-निर्माण है।

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    1. दुनिया का प्रथम धर्म : प्राचीन कहने से कोई महान नहीं बनता लेकिन कई धर्मों की उत्पत्ति का कारण बनने और ज्ञान का प्रचार करने से कोई महान जरूर बन जाता है। प्राप्त शोधानुसार सिन्धु और सरस्वती नदी के बीच जो सभ्यता बसी थी, वह दुनिया की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यता थी। यह वर्तमान के अफगानिस्तान से हिन्दुस्तान तक फैली थी। प्राचीनकाल में जितनी विशाल नदी सिन्धु थी उससे कई ज्यादा विशाल नदी सरस्वती थी। इसी सभ्यता के लोगों ने दुनियाभर में धर्म, समाज, नगर, व्यापार, विज्ञान आदि की स्थापना की थी।


      हिन्दू धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है इसका सबूत है वेद। वेद दुनिया की प्रथम पुस्तक है। वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। सर्वप्रथम ईश्वर ने 4 ऋषियों को इसका ज्ञान दिया- अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य। ये ऋषि न तो ब्राह्मण थे और न दलित, न क्षत्रिय थे और न वैश्य। वेदों के आधार पर ही दुनिया के अन्य धर्मग्रंथों की रचना हुई। जिन्होंने वेद पढ़े हैं, वे ये बात भली-भांति जानते हैं और जिन्होंने नहीं पढ़े हैं उनके लिए नफरत ही उनका धर्म है।

      वेद वैदिककाल की वाचिक परंपरा की अनुपम कृति हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिछले 6-7 हजार ईस्वी पूर्व से चली आ रही है। प्रोफेसर विंटरनिट्ज मानते हैं कि वैदिक साहित्य का रचनाकाल 2000-2500 ईसा पूर्व हुआ था। दरअसल, वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई। विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल की शुरुआत 4500 ई.पू. से मानी है अर्थात ये धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: माना यह जाता है कि पहले वेद को 3 भागों में संकलित किया गया- ऋग्‍वेद, यजुर्वेद व सामवेद जि‍से 'वेदत्रयी' कहा जाता था। मान्यता अनुसार वेद का वि‍भाजन राम के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था। बाद में अथर्ववेद का संकलन ऋषि अथर्वा द्वारा कि‍या गया।

      दूसरी ओर कुछ लोगों का यह मानना है कि कृष्ण के समय द्वापर युग की समाप्ति के बाद महर्षि वेदव्यास ने वेद को 4 प्रभागों में संपादित करके व्यवस्थित किया। इन चारों प्रभागों की शिक्षा 4 शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को दी। उस क्रम में ऋग्वेद- पैल को, यजुर्वेद- वैशम्पायन को, सामवेद- जैमिनी को तथा अथर्ववेद- सुमन्तु को सौंपा गया। इस मान से लिखित रूप में आज से 6,510 वर्ष पूर्व पुराने हैं वेद। श्रीराम का जन्म 5114 ईसा पूर्व हुआ था और श्रीकृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व हुआ था। आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ था। इसका मतलब यह कि वैवस्वत मनु (6673 ईसापूर्व) काल में वेद लिखे गए।

  8. प्रश्न है कि ऐसे व्यक्ति के जीवन का भविष्य क्या है ? और उसके प्रयोजन का निर्धारण कौन करेगा? स्पष्ट है कि इन प्रश्नों का उत्तर व्यक्ति के अस्तित्व-परिवेश में ही प्राप्त होना चाहिए। ऊपर जो कुछ कहा गया है, उससे यह प्रतिफलित होता है कि सभी प्रकार के वैयक्तिक या सामाजिक अवमूल्यन का कारण तृष्णा है। तृष्णा स्वयं में मिथ्या दृष्टिकोण है, जिसके कारण जीव और जगत के प्रति अनेकानेक प्रकार के मिथ्या अध्यारोप खड़े होते हैं। ये अध्यारोप ही दुःख के स्रोत बने हैं, जिससे व्यक्ति और समाज के सम्बन्ध और उसकी सभी प्रकार की मान्यताए परिचालित हैं । इन सारे आरोपणों को हटाकर 'यथाभूत दर्शन' के द्वारा दुःख के सामूहिक कारणों को समाप्त करने की चेष्टा में सतत एवं सहज रूप से व्याप्त रहना एक आदर्श व्यक्तित्व का लक्षण है। दुःख एक व्यापक सत्य है, जिसने व्यक्ति एवं समाज के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित कर रखा है। उसका यथावत् संवेदन तृष्णा-परिचालित समाज में नहीं होता। इस व्यापक दुःखता के साक्षात्कार एवं संवेदन के साथ व्यक्ति के अस्तित्व का आनुगुण्य होना चाहिए, जो मिथ्या दृष्टियों और मिथ्या आचारों से घिरे तृष्णावान के लिए संभव नहीं है। इस व्यापक तृष्णा-व्यूह को तोड़ने वाले पुरुषार्थी की वेदना इतनी तीव्र होनी चाहिए कि उसके सामने दु:खता की समस्या व्यक्तिपरक नहीं रहे। ऐसा महापुरुष उस व्यवस्था या स्त्रोत को सुखा देने की चेष्टा करता है, जहां से दुःख पीड़ा प्रवाह चलता है। इस प्रकार की श्रेष्ठ संवेदना के साथ एक ऐसी व्यापक एवं सूक्ष्मदर्शी बौद्धिकता चाहिए, जो विश्लेषण से दुःख एवं पीड़ा के व्यापक कारणों को और उनके निवारण को भलीभांति जान सके। यह महान कार्य अविद्या, तृष्णा और उनसे प्रेरित आचरणों के अभ्यास को छोड़े बिना कदापि संभव नहीं है।
    अस्तित्व-बोध का यह नया धरातल है, जिसमें करुणा और प्रज्ञा की युगनद्धता या सहजता है। इससे अस्तित्व की नई अवधारणा खड़ी हो जाती हैं। इसे 'अनस्तित्वाधारित अस्तित्व' कह सकते हैं। यहां का मानस एक ऐसे श्रेष्ठ चित्त को धारण करता है, जिसे अचित्ताधारितचित्त' कह सकते हैं । इस परिवेश के व्यक्ति की अपने प्रति आत्म-दष्टि उन्मूलित है, इसलिए उसका मानस एवं व्यवहार स्व-केन्द्रित न होकर समस्या-केन्द्रित हो चुका है । इसके दोष उन्मूलित हो चुके हैं, रागद्वेषादि के उपद्रव शांत हैं अतः स्वयं में वह सुखी एवं शांत जीवन व्यतीत कर सकता था, किन्तु 'करुणा' के कारण एक ओर वह आर्त्त-जगत् छोड़ नहीं सकता और दूसरी ओर व्यापक एवं सूक्ष्मदर्शी प्रज्ञा के कारण जगत् में व्याप्त मिथ्या आचार-विचारों में फंस नहीं सकता। ऐसे व्यक्ति का जीवन पराधीन है। इस पराधीनता को उसने स्वयं वरण किया है । उसके व्यक्तित्व की अवधारणा को 'अनस्तित्वाधारित अस्तित्व' के रूप में समझा जा सकता है। अस्तित्व सम्बन्धी अवधारणाओं में मौलिक परिवर्तन के कारण करुणा का आलम्बन दुःखी व्यक्ति नहीं, प्रत्युत दुःख प्रवाह की दुःख व्यवस्था है। उस दुःख का संस्पर्श होने मात्र से व्यक्ति में करुणा का उदय होगा। अब मानवीय समस्या का स्वरूप अपने या
    अपने आत्मीयजनों के अस्तित्व की रक्षा एवं सुख-सुविधा का नहीं रह गया है, अपितु 'सर्व' या 'बहुजन' की समस्या खड़ी हो गई है। इस महान उत्तरदायित्व के वहन के लिए इस आदर्श व्यक्ति ने दुःख में निमग्न जगत का आह्वान किया है। उसकी सारी चेष्टाएं सकारण नहीं सहज होंगी, ससीम नहीं निःसीम होंगी। उसे श्रेष्ठ व्यक्तित्व का स्वयं अन्दाज मिल चुका है । उस श्रेष्ठता का भी विसर्जन एवं वितरण अन्य सत्वों के लिए कर रहा है । यह प्रज्ञा एवं करुणा का महान प्रयोग है। समस्याओं के नये-नये सन्दर्भो में इसके नये-नये समाधान प्रस्तुत होंगे। यह एक बड़ी मानवीय योजना का महान प्रारम्भ है। यह परिवर्तन की वह गतिशील प्रक्रिया है, जिसमें धर्म, दर्शन, संस्कृति की प्रचलित आस्थाएं बदलेंगी। इसमें निषेध-निर्माण, सत्-असत्, विलासिता और दरिद्रता, राग-द्वेष के द्वन्द्व समाप्त होंगे।
    .................................................

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    1. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। चारों पुरुषार्थों की चारों आश्रमों में जरूरत होती है। ब्रह्मचर्य आश्रम में रहते हुए ही चारों पुरुषार्थों का जो ज्ञान प्राप्त कर लेता है वही सही मार्ग पर आ जाता है। जीवन का लक्ष्य मोक्ष होना चाहिए। मोक्ष को धर्म से साधा जा सकता है। धर्म के ज्ञान के बगैर सांसारिक जीवन अव्यवस्थित और अराजक होता है। अराजक जीवन ही संघर्ष को जन्म देता है। दूसरी ओर अर्थ बिना सब व्यर्थ है। हर तरह की सांसारिक कामना अर्थ से ही पूर्ण होती है। 

      मोक्ष मन की शांति पर निर्भर करता है। मन को शांति तभी मिलती है, जब मन पूर्णरूप से स्थिर हो। मन तभी स्थिर होगा जब धर्म, अर्थ व काम में संतुलन स्थापित हो। यह संतुलन स्थापित करना है अर्थ और काम के बीच। अर्थ है ज्ञान, शक्ति व धन का अर्जन और काम है उसका उपयोग। जब अर्थ और काम दोनों ही धर्म से बराबर प्रभावित होंगे, तभी उनमें संतुलन होगा। तभी मन को शांति मिलेगी और आत्मा को मोक्ष मिलेगा।

      अनुशासन और कर्तव्य पालन जरूरी : इसके अलावा हिन्दू धर्म ने मनुष्य की हर हरकत को वैज्ञानिक नियम में बांधा है। यह नियम सभ्य समाज की पहचान है। इसके लिए प्रमुख कर्तव्यों का वर्णन किया गया है जिसको अपनाकर जीवन को सुंदर और सुखी बनाया जा सकता है। जैसे 1. संध्यावंदन (वैदिक प्रार्थना और ध्यान), 2. तीर्थ (चारधाम), 3. दान (अन्न, वस्त्र और धन), 4. व्रत (श्रावण मास, एकादशी, प्रदोष), 5. पर्व (शिवरात्रि, नवरात्रि, मकर संक्रांति, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी और कुंभ), 6. संस्कार (16 संस्कार), 7. पंच यज्ञ (ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ-श्राद्धकर्म, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ), 8. देश-धर्म सेवा, 9. वेद-गीता पाठ और 10. ईश्वर प्राणिधान (एक ईश्‍वर के प्रति समर्पण)।

      उपरोक्त सभी कार्यों से जीवन में एक अनुशासन और समरसता का विकास होता है। इससे जीवन सफल, सेहतमंद, शांतिमय और समृद्धिपूर्ण बनता है अत: हिन्दू धर्म जीवन जीने की कला सिखाता है।

  9. 🎯165 | स्वामी विवेकानंद का काला इतिहास | Black History of Vivekanand Part1 | Science Journey

    https://www.youtube.com/watch?v=meSTmwR7hmY

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    2. भीमराव का मनुस्मृति जलाने के पीछे क्या रहस्य...............?

      https://youtu.be/XaIYl7UPgbg

  10. 🎯168 | स्वामी विवेकानंद के काले कारनामें Part2 | Black History of VivekaNand | Science Journey

    https://www.youtube.com/watch?v=YI8Rm8JjTPg

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    2. डॉ अंबेडकर दुत्कारते थे कम्यूनिस्टों को,लेकिन क्यों;
      EPISODE 121

      https://youtu.be/n1q6_d7_0Qg

  11. 🎯170 | Black History of VivekaNand Part3 | बुद्ध ने ईश्वर और निर्वाण पर क्या कहा? | Science Journey

    https://www.youtube.com/watch?v=DnGzV_2Q0do

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    2. अंबेडकर और अंबेडकरवादीयों के दो सबसे बडे़ झूट ! Two Falsities of Ambedkar. Don't miss it.

      https://youtu.be/LKxhqCOV16M

  12. सम्यक संस्कृति के शब्द व भाव का अपहरण
    सम्यक संस्कृति के समय पालि भाषा का उपयोग होता था, जिस स हर शब्द का भावार्थ भी पालि शब्दकोश के अनुसार निकलता था। सम्यक संस्कृति में आज का कोई भी शब्द अदृश्य, अलौकिक और चमत्कार का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। आज के वैसे शब्द में अपनी विशिष्ठता और गुणवत्ता की वजह से गुणवाचक स्वरूप में जाने जाते थे, जिस वजह से वैसे सभी शब्दों का प्रयोग सम्यक संस्कृति के समय गुणवाचक संज्ञा द्वारा उपाधि के तौर पर प्रयोग होता था। लेकिन जैसे ही धूर्त भ्रमवंशियों ने सम्यक संस्कृति का रूपांतरण किया, वैसे ही सबसे पहले पूर्व की पालि भाषा को संस्कारित करते हुए एक नई भाषा ‘संस्कृत’ और पूर्व की धम्म लिपि को परिमार्जित करते हुए नागरी लिपि में रूपांतरित किया। जिस वजह से पूर्व के कुछ शब्दों का जहां उन्नत और गुणवत्तापूर्ण भावार्थ निकलता था, उससे अब चमत्कार युक्त अर्थ, अलौकिक शक्ति का अर्थ, अदृश्य शक्ति का अर्थ, जाति समूह का अर्थ निकलने लगा था। आज भ्रमवंशियों द्वारा सबसे ज्यादा इसी बात का फायदा उठाया जा रहा है।

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    1. रोहित वेमुला की माँ और भाई ने बुद्ध मत स्वीकार कर लिया। खबर है की मीडिया का लाडला और कश्मीर में सेनाओं को बलात्कारी कहने वाला “कन्हैया कुमार” भी बुद्ध मत को स्वीकार करने वाला है। वैसे कन्हैया जन्मजात भूमिहार ब्राह्मण है। मगर ब्राह्मणों को गाली देकर अपनी दुकान चलाता है। बुद्ध मत स्वीकार करने वाला 99.9 %दलित वर्ग बुद्ध मत को एक फैशन के रूप में स्वीकार करता हैं। उसे महात्मा बुद्ध कि शिक्षाओं और मान्यताओं से कुछ भी लेना देना नहीं होता। उलटे उसका आचरण उससे विपरीत ही रहता हैं। उदहारण के लिए-

      1.
      मान्यता- महात्मा बुद्ध प्राणी हिंसा के विरुद्ध थे एवं मांसाहार को वर्जित मानते थे।

      समीक्षा- रोहित वेमुला हैदराबाद यूनिवर्सिटी में बीफ फेस्टिवल बनाने वालों में शामिल था। 99.9% नवबौद्ध मांसाहारी है। बुद्ध मत के दो देश के देश दुनिया के सबसे बड़े मांसाहारी हैं। इसे कहते है “नाम बड़े दर्शन छोटे”

  13. सम्यक संस्कृति का पहला शब्द नाम-
    भगवान/भगवा
    आज का 'भगवान' शब्द सम्यक संस्कृति के समय पालि भाषा में प्रयोग होने वाला 'भगवा' का संस्कारित स्वरूप है। पालि के अनेक अभिलेख में इस भगवां, भगवता, भगवतो को देखा जा सकता है।
    सम्यक संस्कृति में भगवा का अर्थ (पालि) भग्ग रागो, भग्ग दोषो, भग्ग मोहो इतिपि सो भगवा कहा जाता था। यानी जब कोई भी व्यक्ति अपन अन्दर से समस्त राग (आसक्ति), द्वेष, मोह (मूढ़ता) को भग्न कर दिया छोड़ दिया, त्याग दिया या त्याग देता था. सिर्फ वैसे ही व्यक्ति को भगवा या आज की संस्कारित भाषा संस्कृत हिन्दी द्वारा भगवान कहा सम्यक संस्कृति में भगवान की गुणवाचक उपाधि को प्राप्त ही व्यक्ति का नाम मिलता है। जिसमें एक भगवान बुद्ध और दुसरे भगवान महावीर है। कयोंकि ये दोनों अपने अन्दर से राग, द्वेष और मूढ़ता को मिटा दिए थे। लेकिन 
    भ्रमवंशियों ने इस भगवान नाम का सम्बोधन किसी अदृश्य, अलौकिक, मोक्षदाता, मुक्तिदाता या चामत्कारिक व्यक्ति को करते हुए अपने द्वारा स्थापित भ्रमिक कथाओं के पात्रों को या आज के समय में चमत्कार दीखाने वाले पात्रों के संबोधन से करने लगे हैं, जो किसी भी दृष्टिकोण से पूर्व वाले गुणवाचक अर्थ का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।
    “इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरण सम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिस-दम्म-सारथी सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा'ति।"
    अर्थ- ऐसे ही तो है वे भगवान! अरहंत, सम्यक-सम्बुद्ध, विद्या तथा सदाचरण से सम्पन्न, उत्तम गति प्राप्त, समस्त लोकों के ज्ञाता, सर्वश्रेष्ठ, भटके लोगों को सही मार्ग पर ले आने वाले सारथी (पथ-भ्रष्ट घोड़ों की तरह), देवताओं और मनुष्यों के शास्ता (आचार्य) बुद्ध भगवान।
    "स्वाक्खातो भगवता धम्मो सन्दिट्ठिको अकालिको एहिपस्सिको ओपनेयिको पच्चत्तं वेदितब्बो विञ्ञूही’ति।" 
    अर्थ-भगवान के द्वारा भली प्रकार आख्यात किया गया यह धर्म संदृष्टिक है काल्पनिक नहीं है, प्रत्यक्ष है, तत्काल फलदायक है, आओ और देखो (कहलाने योग्य है), निर्वाण तक ले जाने योग्य है, प्रत्येक समझदार व्यक्ति के साक्षात करने याग्य है। 
    नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स। 
    अर्थ-नमस्कार है उन अर्हत सम्यक सम्बुद्ध भगवान को।
    इसी पालि के भगवा सम्बोधन से पालि व्याकरण के अनुसार भगवतो (भगवान के द्वारा), भगवतो (भगवान का), भगवता (भगवान में) सम्बोधन । जिसको आज भ्रमवंशियों ने संस्कारित भाषा द्वारा भगवान को भगवती को स्त्रिलिंग का प्रतिनिधित्व प्रदान कर दिया है। 
    इससे साफ पता चलता है कि सम्यक संस्कृति में भगवा (भगवान) संज्ञा के रूप में गुणवत्ता के आधार पर गुणवाचक उपाधि बनती थी, लेकिन यही गुणवाचक संज्ञा सम्यक अंत काल में नामवाचक संज्ञा बनकर किसी का नाम बनकर शोभा दे रही है। जिससे उस शब्द का पूरा भावार्थ ही बदल गया है ।

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    1. 2. मान्यता- महात्मा बुद्ध अहिंसा के पूजारी थे। वो किसी भी प्रकार कि वैचारिक हिंसा के विरुद्ध थे।

      समीक्षा- किसी भी नवबुद्ध से मिलो। वह झल्लाता हुआ अवसाद से पीड़ित व्यक्ति जैसा दिखेगा। जो सारा दिन ब्राह्मणवाद और मनुवाद के नाम पर सभी का विरोध करता दिखेगा। वह उनका भी विरोध करता दिखेगा जो जातिवाद को नहीं मानते। हर अच्छी बात का विरोध करना उसकी दैनिक दिनचर्या का भाग होगा। महात्मा बुद्ध शारीरिक, मानसिक, वैचारिक सभी प्रकार की हिंसा के विरोधी थे। नवबुद्ध ठीक विपरीत व्यवहार करते हैं।

      3. मान्यता- महात्मा बुद्ध संघ अर्थात संगठन की बात करते थे। समाज को संगठित करना उनका उद्देश्य था।

      समीक्षा- नवबुद्ध अलगावावादी कश्मीरी नेताओं का समर्थन कर देश और समाज को तोड़ने की नौटंकी करते दीखते हैं।

      4. मान्यता- महात्मा बुद्ध धर्म में विश्वास रखते थे।

      समीक्षा- नवबुद्ध देश के विरुद्ध षड़यंत्र करने वाले याकूब मेनन जैसे अधर्मी के समर्थन में खड़े होकर अपने आपको ढोंगी सिद्ध करते हैं।

  14. देव
    सम्यक संस्कृति का यह संबोधन अपने आप में काफी दिग्भ्रमित वाला है। आज इस नाम से भ्रमवंशियों के साथ-साथ भ्रमवंशियों द्वारा निर्मित भ्रम के पुलिंदे से काफी लोग उलझे हुए हैं। इसी देव से देवी और देवता का निर्माण हुआ है, जो आज भ्रमवंशी संस्कृति में एक अदृश्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। भ्रमवंशी संस्कृति का संस्थापक पुत्र आज इसी देव का प्रतिनिधि बनकर स्वयं भूदेव बन बैठा है और सभी भ्रमिक संस्कृति के अनुयायियों को देव के भरोसे बैठाकर आर्थिक व मानसिक दोहन कर रहा है। 
    सम्यक संस्कृति में दो सम्राट ऐसे हुए हैं जो अपने नाम की 'देवानाम पिय' और पालि भाषा में देवानड्ग पिय लिखते और उनका लिखा अभिलेख भी मिला है, जिसे आप लोग भी देख सकते हैं। इन दो नामों में एक नाम सम्राट अशोक का है तो दूसरा नाम सम्राट समुद्रगुप्त का है। इन दोनों सम्राटों के व्यवहार से उस समय के देव कहे जाने वाले लोग बहुत ज्यादा प्यार करते थे, इस वजह से ये दोनों सम्राट अपने नाम से ज्यादा देवानाम पिय से प्रसिद्ध थे। जिसके कारण ये दोनों सम्राट अभिलेख में 'देवानाम पिय' लिखते थे। लेकिन इस बात पर लोगों के दो मत हैं। एक मत के अनुयायी भ्रमवंशी हैं जिनका कहना है कि दोनों सम्राट अलौकिक शक्ति देव के प्रिय थे इसलिए उनको देवानाम लोग कहते थे या वे स्वयं लिखते थे। अब भला सम्यक संस्कृति में अलौकिक देव कहां से आ टपके, जिसके सम्राट अशोक और सम्राट समुद्रगुप्त अनुयायी बन गये? यह बिल्कुल ही अतार्किक बात है। वहीं कुछ दूसरे ऐसे भी मान्याताधारी लोग हैं जिनका कहना है कि ये दोनों सम्राट भगवान बुद्ध के प्रिय होने की वजह से अपने नाम की जगह पर देवानाम पिय लिखते थे। यह बात भी सटीक नहीं लग रही है। क्योंकि जो व्यक्ति उस समय जीवित नहीं है, उसका प्रिय कोई कैसे हो सकता है? जैसे कोई व्यक्ति का जन्म होता है और उस व्यक्ति के जन्म से पूर्व उसके दादा की मृत्यु हो जाती है। वह व्यक्ति अपने मृत हो गये दादा का प्रिय कैसे प्रिय तभी हो सकता है, जब उसको प्यार करने वाला जिंदा होगा, अन्यथा उसको प्यार कौन करेगा और जब प्यार नहीं करेगा तो फिर वह किसी का प्रिय कैसे कहलायेगा?
    यहां भी दोनों सम्राटों से काफी वर्ष पूर्व ही भगवान गौतम बुद्ध का महापरिनिर्वाण हो गया था। इस तर्क से इन लोगों को भगवान गौतम बुद्ध कभी प्यार नहीं किये थे। यह बात भी तर्क की कसौटी पर सही नहीं बैठ रही है। जब ये लोग भगवान गौतम बुद्ध को प्यार करते थे तो इन दोनों सम्राटों को बुद्धपिय अशोक और बुद्धपिय समुद्रगुप्त लिखना चाहिए था, लेकिन ये लोग ऐसा लिखते थे। फिर क्या भगवान बुद्ध को देव कहा जाता था? नही! भगवान बुद्ध का ऐसा नाम कहीं नहीं मिला है। उल्टे भगवान गौतम बुद्ध को देवों का शास्ता (आचार्य) कहा जाता था।
    बुद्ध वंदना-“इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरण सम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिस-दम्म-सारथी सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा’ति।"

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    1. 5. मान्यता- महात्मा बुद्ध छल- कपट करने वाले को छल-कपट छोड़ने की शिक्षा देते थे।

      समीक्षा- भारत में ईसाई मिशनरी छल-कपट कर निर्धन हिन्दुओं का धर्मान्तरण करती हैं। नवबुद्ध उनका विरोध करने के स्थान पर उनका साथ देते दीखते हैं।

      6. मान्यता- महात्मा बुद्ध अत्याचारी व्यक्ति को अत्याचार छोड़ने की प्रेरणा देते थे।

      समीक्षा- 1200 वर्षों से भारत भूमि इस्लामिक आक्रमणकारियों के अत्याचार सहती रही। हज़ारों बुद्ध विहार से लेकर नालंदा विश्वविद्यालय इस्लामिक आक्रमणक्रियों ने तहस-नहस कर दिए। नवबौद्ध उसी मानसिकता की पीठ थपथपाते दीखते हैं।

      सन्देश- बनना भी है तो महात्मा बुद्ध कि मान्यताओं को जीवन में , व्यवहार में और आचरण में उतारों।

      अन्यथा नवबुद्ध बनना तो केवल नौटंकी या फैशन जैसा दीखता हैं।

  15. यह जो बुद्ध वंदना देख रहे हैं उसमें भगवान गौतम बुद्ध को सभी देव और मनुष्य दोनों का शास्ता बताया गया है। इस बात से तो स्पष्ट हो जाता है कि देव कोई अलौकिक या स्वयं भगवान गौतम बुद्ध का प्रतिनिधित्व करने वाला शब्द नहीं है। यह जरूर ही उस समय भगवान गौतम बुद्ध जिनके शास्ता (आचार्य) होते थे, वैसे लोगों का देव नाम से संबोधन होने वाला शब्द है। अब देखना है कि भगवान गौतम बुद्ध का शिष्य मनुष्य के अलावा देव शिष्य कौन है, जिसको हम लोग जान नहीं पाए हैं? उसमें भी वह देव शिष्य भगवान गौतम बद्ध के बाद का स्थान लेता हो! तभी भी तो सम्राट उसके प्रिय होते थे। ऐसा एक ही नाम है जो संघ के अन्दर भिक्खु / भिक्खुनियां होती थीं। उनमें से कुछ अपनी साधना की वजह से ऊंची अवस्था प्राप्त कर अरहत बन जाते थे। इनके बारे में भगवान बुद्ध बोलते थे कि तुम लोग जिस दिशा में देसना (उपदेश) देने जा रहो हो तो समझो कि उस दिशा में भगवान बुद्ध स्वयं देशना देने जा रहे है। ये लोग भी भगवान को अपना शास्ता (आचार्य) ही मानते थे। ऐसे देसना देने वाले को ही देव कहा जाता था।
    सम्यक संस्कृति के समय एक राज्य विदिशा था जहां सांची स्तूप का साक्ष्य मिला है। उस विदिशा की राजधानी उस समय भरहुत थी। भरहुत सतना से 16 किलोमीटर दूर एक ग्रामीण क्षेत्र है। आज भरहुत की खुदाई से बहुत ही बड़ी मात्रा में बौद्ध अवशेष मिले हैं। वहां से पुष्यमित्र शुंग का किला होने के भी साक्ष्य मिले हैं। वह क्षेत्र मध्य प्रदेश में आता है। उसी विदिशा में एक नगर का नाम देवास मिला है, तो एक का नाम देव कोठार (देउरकोठार) मिला है। इस देव कोठार में पच्चाय ज्यादा स्तूप होने का साक्ष्य मिला है, जो आज भी खड़ा है। यह देव कोठार पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर अवस्थित है। इसी देव कोठार की पहाडी के नीचे देवास नाम का गांव भी है।

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    1. वेद या ब्राह्मण के विरोधी नहीं थे भगवान बुद्ध

      भगवान् बुद्ध एक विख्यात महापुरुष थे। वे वेद, आर्य अथवा ब्राह्मण आदि के विरोधी नहीं बल्कि उनका अति सम्मान करने वाले थे। वे इनके नाम पर हो रहे पापों से घृणा अवश्य करते थे, परन्तु इनके यथार्थ स्वरूप का कुछ-कुछ भान उनके हृदय में भी था। इस कारण उनके विचार इनके प्रति यथार्थवादी एवं आत्मीयतापूर्ण थे। उनके चार सत्यों का नाम ही आर्य सत्य था। देखिये धम्मपद पृ. 70 पर लिखा है-

      एतं विसेसतो ञत्वा अप्पमादम्हि पण्डिता। अप्पमादे पमोदन्ति अरियानं गोचरे रता।। (9.2) अर्थात् यह अच्छी तरह जानकर अप्रमाद के विशेषज्ञ आर्यों के आचार में रत रहते हुए अप्रमाद में ही प्रमोद पाते हैं।

      सुतनिपात 292 में लिखा – ”विद्वा च वेदेहि समेच्च च धम्मं, न उच्चावचं गच्छति भूपरिपञ्ञे। ” इसका अर्थ पं. धर्मदेव जी विद्यामार्तण्ड अपने ग्रन्थ वेदों का यथार्थ स्वरूप में करते हैं – ”जो विद्वान् वेदों द्वारा धर्म का ज्ञान प्राप्त करता है। उसकी ऐसी डांवाडोल अवस्था नहीं होती।” वेदज्ञ ब्राह्मण की प्रशंसा में बुद्ध कहते हैं-

      यं ब्राह्मण वेदगुं आभिजञ्ञा, अकिंचनं कामभवे असत्तं। अद्धा हि सो ओघमिमं अतारि, तिण्णो च पारं अखिलो अकंखो।।
      इसका अर्थ ‘वेदों का यथार्थ स्वरूप’ ग्रन्थ में पं. धर्मदेव जी विद्यामार्तण्ड करते हैं – ”जिसने उस वेदज्ञ ब्राह्मण को जान लिया, जिसके पास कुछ धन नहीं और जो सांसारिक कामनाओं में आसक्त नहीं, वह आकांक्षारहित सचमुच इस संसार सागर से तर जाता है।”


  1. देव कोठार में जो कोठार शब्द है, यह आज का संस्कारित भाषा का शब्द है, जिसको पालि में या आज भी गांवों की प्रचलित भाषा में कोठा कहते है। यह कोठा शब्द का प्रयोग मकान के सबसे ऊपरी छत या जगह कहते हैं। यह कोठा शब्द का प्रयोग मकान के सबसे ऊपरी को कहते हैं। देव कोठार में भी निर्मित स्तूपों का परिसर पहाड़ी भाग के सबसे ऊपरी ऊंचाई पर स्थित है। यह तीन ओर से खाई से घिरा हुआ बहुत ही रमणीक स्थान है। उस देव कोठार की पहाड़ी सतह पर स्वाभाविक रूप से कुछ कन्दरा बने हैं, जिसमें सामूहिक रूप से बैठकर साधना करने का साक्ष मिलता है। यहां जो स्तप मिला है उसमें एक स्तूप बहुत विशाल है और बाकी सभी स्तूपों की संरचना एक समान है। अब आप लोगों को पता ही होगा कि सामान्य भिक्खु लोगों का स्तूप नहीं मिला है। स्तूप जो भी बना था, वह अरहत प्राप्त भिक्खु और भिक्खुनियों का बनता था। ये सभी देशना देने वाले अरहत भिक्खु या भिक्खुनियों के स्तूप है। इसी वजह से इस स्थान को देव लोगों का कोठा या घर (देव कोठार) कहते हैं। पाली भाषा के इसी कोठा से कोठी और कोठरी बना है। जिस वजह से आज बहुत से क्षेत्रों में बने बड़े घर को कोठी बोलते हैं और बहुत से क्षेत्रों में घर के अन्दर बने कमरा (रूम) को कोठरी कहते हैं। कहीं-कहीं जो अनाज रखने हेतु मिट्टी से बने गोलाकार आकार के घर को भी अनाज की कोठी कहा जाता है।
    सम्यक संस्कृति में असाढ़ पूर्णिमा के बाद जब वर्षावास प्रारम्भ होता था, तो बद्ध संघ के अन्दर धम्म देशना देने वाले भिक्खु-संघ के लोग पहाड़ों की कन्दराओं में चले जाते थे और अपनी धम्म देशना को साधना के माध्यम से और ज्यादा तीक्ष्ण करते थे, ताकि वर्षावास के बाद ज्यादा प्रभावी तरीके से गृहस्थ लोगों को धम्म देशना दे पाएं। ऐसा ही एक बहुत विशाल स्थल पहाड़ों के ऊपर कंदराओं में है जिसका नाम “देव कोठार" है। वर्षावास खत्म होने के बाद सभी लोग धम्म देशना देने पहाड़ों और कन्दराओं से निकलकर गृहस्थों के बीच में नीचे चले आते थे। जिस वजह से इनके नीचे रहने वाले स्थानों को देव का वास यानी देवास से लोग संज्ञा से संबोधन करते थे और उन देव के जलाशयों को लोग देव तालाब के नाम से जानते थे। आज ऐसे कई देवास और देव तालाब देखने का मिलेंगे। इसी देव से देव अरिओ या देव अरिहंत का अपभ्रंश आज का देवरिया (उ.प्र.) स्थापित है।
    धम्म प्रिय उपाधि प्राप्त सम्राट अशोक और सम्राट समुद्रगुप्त धम्म वाले अरहत भिक्खु (देव) का प्रिय होने की वजह से ही लोग उन्हेंदेसना देने वाले देवों के प्रिय कहते थे, इसलिए इन दोनों का नाम ‘देवानामप्रिय' (देवानड्ग पिय) प्रचलित था।
    बुद्ध वंन्दना से भी स्पष्ट हो गया कि भगवान बुद्ध देव और मनुष्य दोनों के शास्ता हैं।
    इससे साफ पता चलता है कि सम्यक संस्कृति में देव (देवता) शब्द गुणवाचक संज्ञा के रूप में गुणवत्ता के आधार पर देसना देने वाले भिक्खुओं का गुणवाचक उपाधि बनता था, लेकिन यही गुणवाचक संज्ञा सम्यक काल के अंत में नामवाचक संज्ञा बनकर किसी का नाम बनकर शोभा दे रही है। जिससे उस शब्द का पुरा भावार्थ ही बदल गया है।

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    1. 1. धम्मपीति सुखं सेति विप्पसन्नेन चेतसा। अरियप्पवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो।। (धम्मपद पृ. 114-15)
      अर्थात् धर्म में आनन्द मानने वाला पुरुष अत्यन्त प्रसन्नचित्त से सुखपूर्वक सोता है। पण्डितजन सदा आर्योपदिष्ट धर्म में रत रहते हैं।
      2. न ब्राह्मणस्य पहरेय्य नास्स मुञ्चेथ ब्राह्मणो। धी ब्राह्मणस्स हन्तारं ततो धी यस्स मुञ्चति।। (धम्मपद पृ. 136-37)
      अर्थात् ब्राह्मण पर प्रहार नहीं करना चाहिये और ब्राह्मण को उस (प्रहारकर्ता) पर कोप नहीं करना चाहिये। ब्राह्मण पर प्रहार करने वाले को धिक्कार है। जो ब्राह्मण उस (प्रहारकर्ता) पर कोप करे, उसे भी उससे भी अधिक धिक्कार है।
      3. न जटाहि न गोत्तेन न जच्चा होति ब्राह्मणो। यम्हि सच्चं च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो।। (धम्मपद पृ. 140-141)
      अर्थात् न जन्म के कारण, न गोत्र के कारण, न जटा धारण के कारण ही कोई ब्राह्मण होता है। जिसमें सत्य है, जिसमें धर्म है, वही पवित्र है और वही ब्राह्मण है।
      4. योध पुञ्ञं च पापं च उभो संग उपच्चगा। असोकं विरजं सुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं।। (धम्मपद पृ. 144-145)
      अर्थात् जो इस जन्म में ही पाप और पुण्य तथा उनकी आसक्ति को पार कर गया, उस विगतशोक, विगतरज और शुद्ध पुरुष को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।
      5. वारि पोक्खरपत्ते व आरग्गे रिव सासपो। यो न लिम्पति कामेसु तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं।। (धम्मपद पृ. 146-147)
      अर्थात् कमलपत्र पर जल और सुई की नोंक पर सरसों की भाँति, जो भोगों में लिप्त नहीं होता, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।

  2. ईश्वर / इसिवर
    'ईश्वर' शब्द आज की संस्कारित भाषा संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ अलौकिक, सर्वशक्तिमान, सृष्टि का संचालक जैसे कर्ता भाव से जाना जाता है। लेकिन यही ईश्वर जब संस्कारित भाषा से पूर्व सम्यक संस्कृति वाली पालि भाषा का शब्द बनता था, तो इस शब्द का स्वरूप 'इसिवर' हो जाता था। जिसका अर्थ अलौकिक, सर्वशक्तिमान, अदृश्य नहीं होकर सदृश्य व्यक्तियों की एक गुणवाचक उपाधि बन जाता था। परन्तु आज उसी शब्द की शल्य क्रिया करते हुए अलौकिक, सर्वशक्तिमान, सृष्टि का संचालक जैसे न जाने कौन कौन-सा चामत्कारिक संबोधन कर प्रत्यारोपण (Implant) करते हुए भ्रम का पुलिंदा बनाकर खूब प्रचार किया गया है।
    मानव सभ्यता की शुरुआत से ही मानव जीवन के विकास क्रम हेतु कुछ विशिष्ठ लोगों के शोध का काफी अहम योग्यदान रहा है, जो सम्यक संस्कृति के ज्ञात और पठनीय संस्कृति में खूब फला-फूला था। वैसे महान लोग मानव के दैनिक जीवन की जीवकोपार्जन से लेकर हर प्रकार के कुदरतन प्राप्त वस्तुओं के रहस्यों की एचना करते थे, पर्वेचना करते थे, लाभ-हानि की विवेचना करते थे, गुण-दोष की तुलना करते थे। ऐसे विवेचना करन वाले विशिष्ठ लोगों में दो प्रकार के लोग होते थे। एक वैसे लोग होते थे जो मनुष्य के बाहरी (भौतिक) जीवन की आवश्यकतों की खोज करते थे तो वहीं दूसरी ओर ऐसे भी लोग होते थे जो मनुष्य की अंदरूनी (चैतसिक) जरूरत की खोज करते थे। बाहरी जरूरत सम्पूर्ण भौतिक आवश्यकता का स्वरूप था तो अन्दरूनी जरूरत सम्पूर्ण चैतसिक आवश्यकता का स्वरूप था। चैतसिक स्वरूप मनुष्य का राग, द्वेष और मूढ़ता (मन की शुद्धि) शुद्ध करता था, इसी वजह से ऐसे शोधकर्ता, खोजकर्ता को मुनि कहा जाता था। जिसमें भगवान बद्ध और भगवान महावीर जैसे को क्रमशः शाक्य मुनि जाता था। आदर से ऐसे लोगों को मुनिवर भी कहा जाता था। दूसरी ओर मानव जीवन के बाहर की भौतिक आवश्यकता के खोजकर्ता, शोधकर्ता को ऋषि कहा जाता था। लेकिन उस ऋषि में जो ऋ वर्ण है वह धम्म लिपि (ब्राह्मी लिपि) के वर्णमाला में नहीं होने के कारण उसका उच्चारण ‘इ’ से किया जाता था। इसलिए सम्यक संस्कृति के समय ऋषि का संबोधन इसि से होता था। आज भी बोल-चाल में ऋषि और मुनि दो नामों का उपयोग होता है। लेकिन इस इसि के अंत में वर जुड़ा हुआ है, जिस वजह से यह इसिवर बन गया। अब देखना है कि यह वर क्या है?

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    1. इन सब पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि भगवान् बुद्ध वेद, आर्य, ब्राह्मण सभी के प्रति अति श्रद्धा का भाव रखते थे। वे जन्मना जातिव्यवस्था के विरोधी थे परन्तु कर्मणा वर्णव्यवस्था के प्रबल समर्थक थे। तब प्रश्न उठता है कि बौद्ध-मत वेद व ब्राह्मण विरोधी कैसे बन गया? इस विषय में हमारा मत है कि यद्यपि वे वेदादि शास्त्र पढ़े थे परन्तु वे वेद के विशेष विद्वान् नहीं थे। उन दिनों वेेद के नाम पर कथित जन्मना ब्राह्मण, जो भगवान् मनु के अनुसार अनार्य व दस्यु बन चुके थे, मांसाहार, पशुबलि आदि पापों को विस्तार दे रहे थे। गौतम बुद्ध महर्षि दयानन्द जी सरस्वती की भाँति उन नकली ब्राह्मणों व कथित वेदज्ञों से शास्त्रार्थ नहीं कर सकते थे, इस कारण मौन हो जाते थे। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके शिष्यों ने अपने गुरु की वेद के सम्बंध में विशेष रुचि न देखने से उन्हें वेदविरोधी तथा वेद के नाम पर दुष्टता करने वालों को ही वेदज्ञ ब्राह्मण समझकर वेद व ब्राह्मण आदि के विरुद्ध भारी अभियान चलाया। उन बौद्धों व जैनों ने क्यों बुद्ध के विचारों, जो सुपानिपात व धम्मपद में थे, को ध्यान से नहीं पढ़ा अथवा वे भी नकली ब्राह्मणों की करतूतों से ग्रस्त होकर सिर दर्द दूर करने हेतु सिर कटाने को ही अपना उद्देश्य समझ बैठे। फिर ईश्वर, वेद आदि से भी दूर होकर अनीश्वरवाद की छाया में पलता बढ़ता बौद्ध मत मद्यमांसादि को अपनाने की ओर पूर्ण प्रवृत्त हुआ है।

      इस प्रकार संसार के बौद्ध ही अपने आराध्य भगवान् बुद्ध की हत्या कर रहे हैं तथा इस देश के कुछ विघटनकारी संगठन विदेशी षड्यन्त्रों में फंसकर भारत के कथित दलित ही नहीं अपितु कथित पिछड़ा वर्ग को भी आर्य, वेद, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि के विरुद्ध भड़काकर उन्हें बौद्ध मत अपनाने की प्रेरणा देेकर देश में गृहयुद्ध के बीज बो रहे हैं। ये लोग न बुद्ध को समझते हैं और न वेदादि शास्त्रों को बल्कि, विदेशी षडय़न्त्रकारियों के षडय़न्त्र में फंसे कठपुतली की भाँति नाचते हैं।

  3. दरअसल 'वर' शब्द का प्रयोग सम्यक संस्कृति में काफी होता था। उस या शब्द का अर्थ श्रेष्ठ होता था। जैसे बुद्ध वन्दना का एक वाक्य है-
    ॥ नत्थि मे सरणं अञ्ज, बुद्धो मे सरणं वरं ॥ 
    हिन्दी अनुवाद-मेरा अन्य कोई शरण नहीं है, केवल बुद्ध ही मेरा श्रेष्ठ शरण है।
    ॥ यो सन्निसिनो वरं बोधिमूले, मारं ससेनं महतिं विजेत्वा ॥ 
    हिन्दी अनुवाद-जिन्होंने श्रेष्ठ बोधिवृक्ष के नीचे बैठ कर, महती सेना सहित मार को पराजित कर सम्बोधी प्राप्त की।
    सम्यक संस्कृति के समय वर का प्रयोग तो आप लोगों ने देख ही लिया कि यह जहां भी प्रयोग हुआ है वहां इसका अर्थ आज की संस्कारित भाषा द्वारा श्रेष्ठ ही हुआ है। इसी वजह से उस समय सभी वैसे आदरसूचक नामा के अंत में वर का उपयोग होता था। फलस्वरूप इसि और मुनि जस लोगों को आदरसूचक संबोधन के साथ पालि भाषा में 'इसिवर' और ‘मुनिवर' कहा जाता था।
    सम्यक संस्कृति के सदृश्य सामंती संस्कृति में भी बहुत सारे आदर सूचक पदनाम हैं जिसके संबोधन के समय हम सभी लोग अंत में वर को जोड देते है। ताकि उनकी श्रेष्ठता बनी रहे, उनका सम्मान बना रहे, उनका आदर होता रहे। ऐसे प्रयोग का पदनाम मान्यवर, गुरुवर, पूज्यवर।
    सम्यक संस्कृति के काल में सारनाथ उत्तर भारत का एक प्रमुख स्थान था, जहां लोग कदरत के रीत की एचना करने, प्रवेचना करने, विवेचना और शोध करने जाते थे, जिस वजह से उस स्थान का नाम ‘इसि पत्तन’ पड़ गया था। यहां 'इसि' आर ‘पत्तन' दो शब्द हैं। जिस स्थान महता जिस कार्य के लिए या जिस खास व्यक्ति के लिए उपयोग हो, आगे उस स्थान का नाम उसी से ज्यादा प्रसिद्ध हो जाता है। यहां की भूमि इसि लोगों का पसन्दीदा स्थान था इसलिए इस स्थल का नाम इसि से प्रमुख बन गया। इस इसिपत्तन नाम की चर्चा भगवान बुद्ध के वचनों या बौद्धिक ग्रंथों में भी है। जैसे-एकं समयं भगवा बाराणसियं विहरति इसिपत्तने मिगदाये।

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    1. महात्मा बुद्ध को उनके अनुयायी ईश्वर में विश्वास न रखने वाला नास्तिक मानते हैं। इस सम्बन्ध में आर्यजगत के एक महान विद्वान पं. धर्मदेव विद्यामार्तण्ड अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “बौद्धमत एवं वैदिक धर्म” में लिखते हैं कि आजकल जो लोग अपने को बौद्धमत का अनुयायी कहते हैं उनमें बहुसंख्या ऐसे लोगों की है जो ईश्वर और आत्मा की सत्ता से इन्कार करते हैं तथा वेदों की निन्दा करते हैं। माननीय डा. भीमराव अम्बेदकर भी जिस बौद्धमत के प्रचार के लिए प्रयत्नशील थे उसमें भी बौद्धमत का ऐसा ही नास्तिक स्वरूप माना जाता है, किन्तु बौद्ध ग्रन्थों के निष्पक्ष अनुशीलन करने पर वह (पं. धमदेव विद्यामार्तण्ड) इस परिणाम पर पहुंचें हैं कि महात्मा बुद्ध ईश्वर की सत्ता से सर्वथा इनकार करनेवाले और वेदों की निन्दा करने वाले न थे, प्रत्युत आस्तिक थे। एक बड़ी कठिनाई महात्मा बुद्ध के यथार्थ विचार जानने में यह है कि उन्होंने स्वयं कोई ग्रन्थ नहीं लिखा अब दीघनिकाय, मज्झिनिकाय, विनयम पिटक आदि जो भी ग्रन्थ महात्मा बुद्ध के नाम से पाये जाते हैं उनका संकलन उनके निर्वाण की कई शताब्दियों के पश्चात् किया गया जिनमें से बहुत-सी उक्तियां किंवदन्ती के ही रूप में हैं।



      नास्तिक कौन होता है? इस प्रश्न को उठाकर उसका समाधान करते हुए आर्यविद्वान पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि अष्टाध्यायी के ‘अस्ति नास्ति दिष्टं मतिं’ इस सुप्रसिद्ध सूत्र के अनुसार जो परलोक और पुनर्जन्म आदि के अस्तित्व को स्वीकार करता है वह आस्तिक है और जो इन्हें नहीं मानता वह नास्तिक कहाता है। महात्मा बुद्ध परलोक और पुनर्जन्म को मानते थे इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। इसलिये उन्हें सिद्ध करने के लिए अनेक प्रमाण देना अनावश्यक है। प्रथम प्रमाण के रूप में धम्मपद के जरावग्गो श्लोक (संख्या 153) ‘अनेक जाति संसारं, सन्धाविस्सं अनिन्विस। गृहकारकं गवेस्संतो दुक्खा जाति पुनप्पुनं।।’ में महात्मा बुद्ध ने कहा है कि अनेक जन्मों तक मैं संसार में लगातार भटकता रहा। गृह निर्माण करनेवाले की खोज में। बार-बार जन्म दुःखमय हुआ। श्लोक का यह अर्थ महाबोधि सभा, सारनाथ-बनारस द्वारा प्रकाशित श्री अवध किशोर नारायण द्वारा अनुदित धम्मपद के अनुसार है। दूसरा प्रमाण ब्रह्मजाल सुत्त का है जहां महात्मा बुद्ध ने अपने 2 या 4 नहीं अपित लाखों जन्मों के चित्तसमाधि आदि के द्वारा स्मरण का वर्णन किया है। वहां उन्होंने कहा है–भिक्षुओं ! कोई भिक्षु संयम, वीर्य, अध्यवसाय, अप्रमाद और स्थिर चित्त से उस प्रकार की चित्त समाधि को प्राप्त करता है जिस समाधि को प्राप्त चित्त में अनेक प्रकार के जैसे कि एक सौ, हजार, लाख, अनेक लाख पूर्वजन्मों की स्मृति हो जाती है—“मै। इस नाम का, इस गोत्र का, इस रंग का, इस आहार का, इस प्रकार के सुखों और दुःखों का अनुभव करनेवाला और इतनी आयु तक जीनेवाला था। सो मैं वहां मरकर वहां उत्पन्न हुआ। वहां भी मैं इस नाम का था। सो मैं वहां मरकर यहां उत्पन्न हुआ।“ इत्यादि। अगला तीसरा प्रमाण धम्मपद के उपर्युक्त वर्णित श्लोक का अगला श्लोक है जिसमें गृहकारक के रूप में आत्मा का निर्देश किया गया है। श्लोक है- ’गह कारक दिट्ठोऽसि पुन गेहं न काहसि। सब्वा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसंखितं। विसंखारगतं चित्तं तण्हर्निं खयमज्झागा।।‘ इस श्लोक के अनुवाद में इसका अर्थ दिया गया है कि हे गृह के निर्माण करनेवाले! मैंने तुम्हें देख लिया है, तुम फिर घर नहीं बना सकते। तुम्हारी कडि़यां सब टूट गईं, गृह का शिखर गिर गया। चित्त संस्कार रहित हो गया, तृष्णाओं का क्षय हो गया। इस पर टिप्पणी करते हुए पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि यह मुक्ति अथवा निर्वाण के योग्य अवस्था का वर्णन है। जब तक ऐसी अवस्था नहीं हो जाती तब तक जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है। इस प्रकार यह सर्वथा स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध परलोक, पुनर्जन्म आदि में विश्वास करने के कारण आस्तिक थे।

  4. दूसरा नाम पत्तन यानी जलमार्ग के किनारे वाला वह स्थान जहां नाव या जहाज को खड़ा करके उतार-चढ़ाव का कार्य किया जाता हो। उसे पालि भाषा में पत्तन कहते हैं, ऐसे यह पत्तन नाम का संबोधन आज भी यथावत है और वैसे ही कुछ स्थानों को संबोधित किया जाता है जो जलमार्ग के किनारे वाले स्थान हैं। जैसे विशाखा पत्तन, मुरगांव पत्तन। ऐसे सम्यक संस्कृति के पत्तन (Port) रहे बहुत से स्थानों का नाम आज बदल गया है। यह इसि नाम का स्थान भी गंगा नदी के तट पर बसा हुआ है, जहां इसि लोग जलमार्ग का उतार चढ़ाव करते हुए नदी किनारे घने जंगल वाले स्थान पर साधना करने जाते थे। इसी वजह से उस नदी किनारे घने जंगल स्थान को इसिपत्तन कहते थे, जिसे आज सारनाथ कहते हैं। यही वह क्षेत्र है जहां इसि लोग जाकर कुदरत के सभी गुण स्वभाव का शोध करत थे। इस जगह पर भगवान बुद्ध (नाथ) ने प्रथम धम्मचकप्पवत्तन करते हुए पच वग्गीय भिक्खुओं को सार दिया था। नाथ ने पांच भिक्खुओं को सार दिया इस वजह से इसिपत्तन स्थान के नाम का बाद में रूपांतरण होकर इसका नाम सारनाथ हो गया।
    इससे साफ पता चलता है कि सम्यक संस्कृति में इसिवर (ईश्वर) शब्द गुणवाचक संज्ञा के रूप में गुणवत्ता के आधार पर गुणवाचक उपाधि बनता था, लेकिन यही गुणवाचक संज्ञा सम्यक अंत काल में नामवाचक संज्ञा बनकर किसी का नाम बनकर शोभा दे रही है। जिससे उस शब्द का पूरा भावार्थ ही बदल गया है।

    इन सब बातों से स्पष्ट हो जाता है कि सम्यक संस्कृति में इसि (ईश्वर) शब्द का प्रयोग किसी अदृश्य, अलौकिक, सर्वशक्तिमान जैसी संज्ञा के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य के बाहरी (भौतिक) जीवन की आवश्यकताओं को बेहतर बनाने हेतु निरंतर खोज करने वाले वैज्ञानिक (इसि) को कहा जाता था। जिन्हें लोग आदर के साथ इसिवर कहकर संबोधित करते थे।

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    1. बुद्धत्व की प्राप्ति के पश्चात् अपने प्रथम ही उपदेश में जो सारनाथ में महात्मा बुद्ध जी ने दिया उसमें उन्होंने कहा—“अहं भिक्खवे! तथागत सम्मासम्बुद्धो उदूहथ भिक्खवे। सोतं अमतं अधिगतम् अहमनुसासामि अहं धम्र्मं देसेमि।“ अर्थात् भिक्षुओं ! मैं अब बुद्ध हो गया हूं। मैंने ‘अमृत’ की प्राप्ति कर ली है। अब मैं धर्म का उपदेश करता हूं। पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि अमृत नाम वेद और उपनिषदों में ब्रह्म अर्थात् ईश्वर के लिए प्रयुक्त हुआ। इसके उदाहरण भी आपने दिये हैं। धम्मपद श्लोक 160 (अत्तवग्गो 4) “अत्ताहि अत्तनो नथो को हि नाथो परो सिया अत्तनां व सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं।।“ में ईश्वर की सत्ता को महात्मा बुद्ध स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हुए कहते हैं कि आत्मा ही आत्मा का नाम है और कौन उस (परमात्मा) से बड़ा नाथ व स्वामी हो सकता है। अच्छी प्रकार आत्मा का दमन कर लेने से दुर्लभ नाथ (परमात्मा) की प्राप्ति होती है। ‘नाथं लभति दुल्ल्भं’ यह शब्द अत्यन्त स्पष्टरूप से दुर्लभ नाथ (परमात्मा) का निर्देश करते हैं। यद्यपि अनीश्वरवादी आधुनिक बौद्ध इसका अर्थ निर्वाण कर देते हैं जो संगत नहीं होता और जिसमें खींचा-तानी भी बहुत अधिक करनी पड़ती है।



      उपर्युक्त विवरण से सिद्ध है कि महात्मा बुद्ध ईश्वर विश्वासी व आस्तिक थे, अनीश्वरवादी नहीं।

  5. 'सनातन’
    'सनातन' यह शब्द आज लोगों को काफी दिग्भ्रमित कर रहा है, आइए जा सनातन क्या है या सनातन कहते किसे हैं!
    आज के समय में तथाकथित कुछ लोग भ्रमवंशी धूतों द्वारा प्र हिन्दू समुदाय को समय समय पर हिन्दू से अलग उसका एक नाम देते रहते हैं। क्योंकि इसके पीछे उनकी भी मजबूरा लोग अपने समुदाय का जो भी नामकरण करते हैं, उस न ग्रंथों द्वारा इतनी टीका टिप्पणी होने लगती है, कि भ्रमव प्रत्यारोपित समुदाय का नाम हमेशा बदलना पड़ता है। नया सम्बोधन सनातन शब्द से किया है।
    फिर यह सनातन शब्द क्या है?
    वस्तुतः भारत की सम्यक संस्कति के समृद्ध व उत्ट भारत में 'धर्म' प्रकृति के गुण, स्वभाव व नियम (Law of nature) को कहते थे। जिसकी वजह से गुण, स्वभाव व कुदरत के नियम को सष्टि के आदि से अंत तक को बोला जाता था। यानी भारत की समृद्धशाली भाषा में उसे 'एस धम्मो सनंतनो' कहा जाता था, यानी यह कदरत का गुण, स्वभाव, धर्म सनातन है, जो कभी खत्म नहीं होगा। यानी पहला तो धर्म गुणवाचक है और दूसरा उस गुणवाचक धर्म की विशेषता है, कि वह आदि और अनंत है। लेकिन इसी गुण और गुण की विशेषता है की बोधित करने वाले शब्द को जब संज्ञा बना देंगे तो वह उत्पन्न होना और नष्ट होने का स्वरूप धारण कर लेगा। आज उसी का परिणाम है कि पुर्व कालीन कुदरती गुण, स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने वाले 'धर्म' की जगह पर आज के नए विकसित सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले धर्म को भ्रमवंशियों ने प्रत्यारोपित कर दिया है इसलिए कभी-कभी हिन्दू के जगह पर सनातन भी बताने लगते हैं। ये दोनों ही सर्वथा अनुचित ही नहीं, बल्कि अप्रासंगिक है।
    सनातन का अर्थ होता है जिसका आदि और अंत नहीं हो, जो शाश्वत हो, जो निरंतर रहे। ऐसे सभी गुण, धर्म, स्वभाव जिसका आदि और अंत नहीं हो, उसे सनातन धर्म कहते हैं।

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  6. जैसे-कोई मनुष्य जब गुस्सा करता है तो उसका मन व्याकुल हो जाता है। यहां मन का व्याकुल होना ही उसके मन का गुण-धर्म, स्वभाव है, जो मानव के उद्भव से लेकर मानव जीवन के अन्त तक रहने वाला यहा जो मन का गुण-धर्म, स्वभाव है वही सनातन है। अब कोई आज मनुष्य गुस्सा करे या पाषाण काल का मनुष्य गुस्सा करे, या आने वाले काल का मनुष्य गुस्सा करे, गुस्सा के बाद उसे व्याकुल होना ही पडेगा। उसी प्रकार पृथ्वी का घूमना, सूर्य द्वारा रोशनी व ऊष्मा देना, चंद्रमा शीतलता प्रदान करना, इन सभी का जो गुण-धर्म, स्वभाव
    आदि और अनंत है। वह कभी खत्म नहीं होगा। इसी वजह से वैसे भाव को सनातन धर्म कहा जाता है। इसे किसी सम्प्रदाय (आज का धर्म जो संप्रदाय का पर्यावाची बना है) से जोड़ना एक मूर्खता ही कहा जा सकता है। क्योंकि कोई भी संप्रदाय आदि व अनंत नहीं होता है। अनुसार सभी सम्प्रदायों का परिवर्तन होना निश्चित है यानी आज का हिन्दू सम्प्रदाय भी परिवर्तनशील है। जबकि कुदरत का गुण, स्वभाव, नियम अपरिवर्तनशील है।
    ऐसा करने के पीछे भ्रमवंशी समुदाय की एक मजबूरी है कि इसने अपने जन्म काल के बाद से ही अपने द्वारा निर्मित अनेक संप्रदाय को एकीकृत कोई एक नाम कभी दे नहीं पाया है। आज भी भ्रमवंशी समुदाय के अन्दर विभिन्न मतों का जमावड़ा है, जिसमें सभी का दर्शन अलग है सभी के ललाट पर चन्दन टीका के निशान अलग-अलग हैं, सभी के ग्रंथ अलग-अलग हैं, सभी के आराधना स्थल अलग-अलग हैं, सब लोग ज किसी मजबूरी बस किसी प्रायोजन में एक जगह इकट्ठे होते हैं तो सभी की मतभिन्नता जगजाहिर हो जाती है और यह मतभिन्नता कभी-कभी इतनी बढ जाती है कि आपस में झगड़ा फसाद का बड़ा रूप ले लेती है (कंभ मेला)।

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  7. ऐसे इस शैव सम्प्रदाय और वैष्णव सम्प्रदाय के झगड़ा फसाद पर कृष्ण झा और धीरेन्द्र कुमार झा द्वारा लिखित पुस्तक 'अयोध्या की वह स्याह रात' जिसका अंग्रेजी संस्करण हार्पर कालिन्स पब्लिशर्स इंडिया लिमिटेड और हिन्दी संस्करण फालकोण फालकोण से प्रकाशित है, जिसमें पेज नम्बर 169-170 पर लेखक लिखते हैं कि रामानंदी सम्प्रदाय वैष्णव संप्रदाय के कई पंथों में एक पंथ है। इसमें विष्णु के विभिन्न अवतारों की पूजा होती है। रामानंद का जन्म तेरहवीं शताब्दी में इलाहाबाद में हुआ था। इस रामानदा पंथ में साधु और नागाओं की सबसे बड़ी फौज पायी जाती है। प्रतीत होता है कि रामानंदियों ने अपनी सैन्य संरचना शैवों से सुरक्षा बनाई थी। आगे लिखते हैं कि आदिशंकर द्वारा स्थापित शैव सम्प्रदाय लोगों ने अपने विस्तार हेतु सात प्रमुख शैव अखाड़ों का निमाण किया था जिसे दशनामी सम्प्रदाय कहा जाता था। दशनामी अखाड़ा भगवान शिव की पूजा करते हैं और आदि शंकर को अपना गुरु मानते हैं। उसी प्रकार रामानंदी के नागा सैनिक भगवान राम की पूजा करते है और रामानंद को अपना गुरु मानते हैं। रामानंदी के लोग तुलसीदास द्वारा लिखित रामचरित मानस को अपना प्रमख ग्रंथ मानते हैं।(आखाडा उसे कहते है जहां शस्त्रधारी लड़ाकू नागा साधु निवास करते हों।)
    वे आगे लिखते हैं कि दशनामी अखाड़ों का गठन सम्यक संस्कृति में स्थापित बुद्ध विहार, संघाराम, बौद्ध मठ, सम्यक शिक्षण संस्थान, जैन मठ के साथ-साथ सामंतवाद के समय बनी वैष्णव या अन्य संप्रदाय के बने मठ मंदिरों के ऊपर जबरन कब्जा जमाने के लिए किया जाता था। इसी वजह से रामानंदी अखाड़ा दशनामी अखाड़ों से बचने के लिए बनाया गया था।
    इसी कारण दशनामी अखाड़ा और रामानन्दी अखाड़ा के बीच आपस में हत्या प्रतिहत्या के कई प्रमाण मिलते हैं। 1690 ईस्वी में नासिक के सिंहस्थ नामी अखाड़ा के नागा साधु और रामानंदी अखाड़ा के नागा साधुओं के बीच भारी नरसंहार हुआ था। उसी प्रकार 1760 ईस्वी में हरिद्वार स्नान में इन दोनों के बीच खूनी लड़ाई हुई थी जिसमें दोनों ओर कई हजार नागा साधुओं की मौत हुई थी। प्रयाग का तो कहना ही नहीं है यहां पर दशनामी और रामानंदी अखाड़ा के बीच प्रत्येक कुम्भ मेला में दोनों ओर से शस्त्रों का प्रदर्शन होता है। इसी वजह से दशनामी अखाडा का एक नागा, जिसका नाम भैरव गिरी गोस्वामी था, उसने यह प्रण कर रखा था कि प्रत्येक दिन कम-से-कम एक वैष्णव नागा की हत्या नहीं कर दूं तब तक भोजन नहीं करूंगा। भैरव गिरी नागा के इस हिंसात्मक कार्य को देखते हुए रामानन्दी अखाड़ा का एक नागा, जिसका नाम रामदास था, ने भी प्रतिज्ञा की कि मैं भी जब तक एक दशनामी अखाड़ा के नागा की हत्या नहीं कर लूंगा तब तक मैं भी भोजन नहीं करूंगा।
    भ्रमवंशियों द्वारा स्थापित सम्प्रदाय की यही कहानी रही है और इसका जन्मकाल तो आप लोग देख ही लिए कि यह नौवीं शताब्दी के बाद पैदा हुआ और आजादी पूर्व काल तक विभिन्न नामों से बट कर मौजूद था। जात-इनके धार्मिक ग्रंथ और अंग्रेजी काल की जनगणना को देख सकते हैं।

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  8. धर्म / धम्म
    सर्वप्रथम धर्म या धम्म शब्द की प्रथम जानकारी भारत की ज्ञात 530 वर्ष पूर्व में हुई थी। इस ज्ञात सभ्यता से पूर्व की रही सभ्यता-संस्कृति धर्म/धम्म की जगह पर किस भाषा में किस शब्द प्रयोग होता था, इस बात की पक्की जानकारी आज तक किसी को नहीं है। इसके बारें में आज जो भी लोग कुछ कहते हैं या लिखते हैं, वह सारा कलम कसाईयों का कपोल-कल्पित कल्पना द्वारा निर्मित भ्रम का पुलिंदा है। ज्ञात काळ में भगवान गौतम बुद्ध ने पहली बार अपना ज्ञान प्राप्ति के बाद इस शब्द को धम्म चक्क पवत्तन (धर्म चक्र प्रवर्तन) के रूप में प्रयोग करते हुए स्थापित किया था। उस समय भगवान गौतम बुद्ध के भी धम्म/धर्म का अभिप्राय “धारेती'ति धम्मो” से था। अब धारण क्या करेगा, तो अत्तनो सभावं, अत्तनो लक्खनं, धारेती'ति धम्मो। यानी इस साल अंदर जो भी है, वह अपने अंदर, अपने स्वभाव से, अपने लक्षण से जो कुछ भी धारण करता है, वह उसका धम्म/धर्म है या उसे ही धम्म/धर्म कहते हैं। यही धम्म/धर्म मनुष्य के अंदर विराजित राग और द्वेष के रूप में गुण स्वभाव, लक्षण का पर्यायवाची माना जाता था। यह गुण सधम्म के रूप में सदगुण का प्रतिनिधित्व करता था तो वहीं यह गुण अधम्म के रूप में अवगुण का प्रतिनिधित्व करता था। इसी सद्गुण और अवगुण वाली राग का चक्र और सद्गुण और अवगुण वाली द्वेष के चक्र से मनुष्य के मुक्ति का मार्ग धम्म चक्क पवत्तन है। इस गुणकारी धम्म/धर्म शब्द का इसके पूर्व लिखित साक्ष्य या अविष्कार भी नहीं हुआ था।
    वस्तुतः धर्म और धम्म के लिखावट में सिर्फ भाषा-लिपि का अन्तर है। सम्यक संस्कृति के समय मौजूद पालि भाषा-लिपि में 'र' का संयुक्त प्रयोग नहीं होने की वजह से उस समय इसका लेखन धम्म होता था, जो आज की संस्कारित भाषा में र का संयुक्त प्रयोग होने की वजह से अब यह धर्म लिखा जाता है। इसी 'धर्म' के ज्ञान पर सम्यक काल के समय भारत 1500 वर्ष तक विश्वगुरु था। जिसमें अनेक विश्व विख्यात विश्वविद्यालय थे। जहां देश-विदेश के लोग धर्म को समझने आते थे। वह कोई बौद्ध धम्म नहीं, बल्कि कुदरत का गुण, धर्म, स्वभाव यानी कुदरत के कानून (Law of Nature) को समझने आते थे। प्रकृति के अंदर अपना गुण, होता है, लोग उसे ही धर्म कहते थे। जैसे आग का जलना धर्म है, बर्फ का शीतल होना धर्म है, गुस्सा होने पर व्याकुल होना धर्म है। अब कोई आग है और वह आग जले ही नही, बर्फ हो और वह शीतल हो ही नहीं, कोई गुस्सा हो और वह व्यक्ति व्याकुल हो ही नहीं तो समझो सबका गुण-धर्म, स्वभाव खत्म है। ये सभी नकली गुण-धर्म, स्वभाव वाले है। यही तो गुण, स्वभाव और प्रकृति की रीत है जिसे धर्म कहते है।

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  9. धम्म और धर्म में कोई अंतर नहीं है, अंतर तो सम्यक काल और सम्यक अंत काल (सामंत काल) में इसके प्रयोग और भावार्थ का है। दोनों काल में इसका उपयोग अलग-अलग भावार्थ के साथ हुआ है। यही सबसे बड़ा अन्तर है। जैसे सम्यक काल में धम्म/धर्म का प्रयोग कुदरत के कानून, कुदरत के गुण, स्वभाव (Law of Nature) के सम्बोधन के लिए किया जाता था तो सम्यक अंत के काल में इस धर्म/ धम्म का प्रयोग भ्रमिक वंश द्वारा प्रत्यारोपित (Implant) भ्रम का पुलिंदा के लिए होने लगा। यह भ्रमवादी धर्म सम्प्रदाय, पंथ, मजहब, रिलीजन का पर्यायवाची है जिसको भ्रमिक लोगों के कलम कसाइयों ने धर्म/धम्म का पर्यायवाची खडा कर दिया है। भ्रमवादियों द्वारा प्रत्यारोपित संप्रदाय कुदरत का कानून नहीं है। प्रकृति की रीत नहीं है, स्वभाव नहीं है। इसी वजह से आज का धर्म किसी भी दृष्टिकोण से पूर्व के धर्म का पर्यायवाची नहीं है। सम्यक काल का धम्म/धर्म गुण-स्वभाव कुदरत का प्रतिनिधित्व करने के कारण सभी का होता था जिस वजह से उस समय जितने भी विदेशी शासक आये, सभी सम्यक काल के धर्म में समाहित हो गये, लेकिन भ्रमवंशियों द्वारा स्थापित धर्म एक खास समूह वर्ग का होने के कारण इसके समय में जितने भी विदेशी शासक यहां आये, कोई भी इनके संप्रदाय में समाहित नहीं हुआ। क्योंकि
    सम्प्रदाय (संस्कारित शब्द) एक दर्शन है जो एक खास समाज विशेष का होता है, लेकिन धर्म सभी का होता है।
    रिलीजन (अंग्रेजी शब्द) एक दर्शन है जो एक खास रीजन विशेष का होता है, लेकिन धर्म सभी का होता है।
    मजहब (फारसी शब्द) एक दर्शन है जो एक खास मजलिस (सभा) व का होता है, लेकिन धर्म सभी का होता है।
    पंथ (पाली शब्द) एक दर्शन है जो एक साथ रहने वाले खास पथिक विशेष का होता है, लेकिन धर्म सभी का होता है।
    लेकिन इस कलम कसाई को देखिए कि सम्यक काल वाले शुद्ध धर्म की जगह पर, सम्यक अंत काल वाले एक समुदाय विशेष द्वारा किया जाने वाला कर्मकाण्ड (सम्प्रदाय, मजहब, पंथ. रिलीजन) को ही धर्म का पर्यावाची बनाते हुए भ्रम का पुलिंदा के रूप में प्रत्यारोपित (Implant) कर दिया।

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  10. अध्यात्म
    भारत लगभग 1500 वर्षों तक धर्म व अध्यात्म (धम्म व अज्झत्त) का विद्याध्ययन करने कराने का बहुत बड़ा केन्द्र था, जिसकी। से इसे विश्वगुरु का दर्जा भी प्राप्त था। धर्म और अध्यात्म का पूरे विश्व में सबसे बड़ा विश्वविख्यात विद्याध्ययन केंद्र 'नालन्दा विश्वविद्यालय’ जिसमें धर्म और अध्यात्म का ज्ञान दिया जाता था।
    इस धर्म व अध्यात्म में धर्म की व्याख्या आप लोगों ने देखी, परंतु अध्यात्म क्या है और भ्रमिक लोग इसे क्या कहते हैं, इस पर भी गौर करे। 
    भारत की सम्यक संस्कृति में जिस प्रकार लोगों के कर्मकांड से अलग चेतन और अवचेतन वाले गुण, स्वभाव, नियम को ही 'धर्म' कहते थे, उसी प्रकार 'अध्यात्म' की भी अलग व्याख्या थी।
    आइए जानते हैं अध्यात्म को.............
    सम्यक काल के समय प्रयोग होने वाला शब्द अज्झत्त को संस्कारित करने के बाद ही भ्रमवंशियों ने अध्यात्म बनाया। पालि में अज्झत (अज्झ+अत्त) का अर्थ अपने भीतर यानी अत्त का अर्थ अपना और अझ का अर्थ अंदर होता है। यानी कि अध्यात्म का सम्पूर्ण अर्थ हुआ कि अपने शरीर के अंदर उस पूरी चैतसिक क्रिया को जानना, समझना और उसे अपना कर अपने शरीर की हर गतिविधि को समझना। यह शरीर जब किसी पर गुस्सा करता है तो व्याकुल क्यों होता है! यह शरीर जब किसी पर प्रसन्न होता है तो प्रफुल्लित क्यों होता है! यह शरीर जब दुखी होता है तो बैचेन क्यों होता है! यह शरीर जब सुखी होता है तो अमन-चैन से क्यों रहता है। इन्हीं सब प्रश्नों को जानने की विधि को अध्यात्म कहते है। 
    लेकिन भारत की दुर्दशा नौंवी शताब्दी के बाद से उदित भ्रमिकों ने शुरु कर दी। प्रत्येक शब्दों को अपहृत करते हुए उसके भावार्थ को ही बदलना शुरू कर दिया था। भ्रमिक लोग पूर्व कालीन अध्यात्म में आत्मा और परमात्मा का समावेश करते हुए, इस प्रकार के पुस्तक करने वाले को आध्यात्मिक बोलने लगे तथा आत्मा या कर्मकाण्ड पर अधिक बल देने वाले को सब लगे। भ्रमिकों का भ्रम का पुलिंदा भी अलबेला है। 

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  11. “सरस्वती या सुरसती"
    भारत सम्यक काल की जितनी भी शब्दावली थी, उसका प्रयोग व समय की भाषा (पालि) के अनुसार काफी उत्कृष्ट व ज्ञानवर्धक होता था। लेकिन भारत में सम्यक काल जैसे-जैसे निरंतर आगे बढ़ता गया, से सम्यक पालि भाषा का संस्कार (संस्कृत बनते) होते हुए, भाषा अविकास कहें या विनाश कहें, होता गया। प्रत्येक वर्ष फागुन महीना में पंचमी आती है, उस दिन लोग स्वरसती नाम (अपभ्रंश सरस्वती) की देवी की स्थापना करते हैं और बड़े ही धूम-धाम से उसकी पूजा करते हैं। लोगों की ऐसी मान्यता है कि स्वरसती नाम की देवी की पूजा करने से विद्या बढ़ती है या जिसके पास विद्या नहीं है उसे विद्या प्राप्त हो जाती है।
    लेकिन सम्यक संस्कृति में विद्या अध्ययन कराने वाले शिक्षण संस्थानों के अनेक साक्ष्य मिले हैं। जिनमें ऐसी या किसी भी प्रकार की सरस्वती देवी से संबंधित कोई साक्ष्य लिखित रूप से या मूर्ति के रूप में प्राप्त नहीं हुआ है। फिर आज की मान्यता ऐसी कैसे बन गयी? 
    दरअसल यहां के लोग भ्रमवंशियों द्वारा प्रत्यारोपित (Implant) भ्रम का पुलिंदा वाली व्यवस्था के चंगुल में इतना फंस गये हैं कि उनके द्वारा बताई गई कथा कहानियों से बाहर निकलकर कुछ सोचना ही नहीं चाहते है। आइए इस 'सरस्वती' शब्द को समझें कि इस शब्द का उद्भव कहा व कैसे होते हुए आज लोगों के पास पहुंचा है।
    पालि भाषा में एक शब्द है सती जिसका अर्थ होता है सजग। इसको उदाहरण से समझें। सम्यक संस्कति में आष्टांगिक मार्ग के अंदर एक मार्ग का नाम है 'सम्यक सती'। इसमें जो 'सती' शब्द है उस 'सती' का अर्थ पालि में ‘सजग रहना' होता है।
    दूसरा, सम्यक काल में जो पालि भाषा और धम्म लिपि थी। वर्णमाला में सुर होते थे जिसे आज संस्कारित भाषा में स्वर कहते है। किसी भी भाषा में सुर का महत्त्व बहुत ज्यादा होता है। चाहे वह मनुष्य की भाषा हो या जानवर की ही भाषा क्यों न हो। यह ‘सुर’ जन्म से ही प्रत्येक प्राणी जगत को प्रकृति प्रदत्त प्राप्त होता है, जिस वजह से इसका उपयोग पृथ्वीलोक में जन्म से सभी प्राणी जगत करता है।
    जैसे अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ।
    यह प्रकृति प्रदत्त 'सुर' जब 'सती' के साथ काम करता है तभी यह व्यंजन का रूप लेता है, अन्यथा यह सुर बेसुरे स्वरूप में ही यथावत बरकरार रहेगा। इसी को सम्यक काल में 'सुरो का सती' कहते थे। आज भी कई लोग कहते हैं कि यह सुरो का सरताज है।
    इसी ‘सुर' और 'सती' को जब संस्कारित भाषा (स्वर और सती) में एक साथ लिखेंगे तो यह 'स्वरसती' का रूप ले लेगा।
    लेकिन दुर्भाग्य!
    यह सम्यक काल की उत्कृष्ट अभ्यास वाली प्रणाली को भ्रमवंशी कलम कसाई ने कर्मकांड के रूप में विकृत करते हुए भ्रम का पुलिंदा बनते हुए जीवकोपार्जन हेतु प्रत्यारोपित (Implant) कर दिया है।

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  12. पितृ पक्ष और दुर्गा पूजा 
    (पितु पक्ख और मातु पक्ख)
    अश्विन (पालि में अस्सयुज-असोज्ज) महीना का कृष्ण पक्ष (कण्ह पक्ख) में 'पितृपक्ष' (पितु पक्ख) और दूसरा शुक्ल पक्ष (सित पक्ख) 'दुर्गासाधना पक्ष' के रूप में मनाने वाली परंपरा की सच्चाई हेतु भारत में स्थापित सम्यक संस्कृति (बौद्धिक संस्कृति) को समझना होगा। क्योंकि आज का जितनी भी विकृतिपूर्ण कुरीति या परंपरा दिखती हैं, वह सब उसी सम्यक संस्कृति के आर्य-थेर संघ और आर्य महासांघिक संघ से निकले वज्रयान के घुसपैठिये हैं, जो आगे अपने-अपने नाम से नये-नये विकृतिपूर्ण संप्रदाय को बनाते हुए बंगाल की खाड़ी (ब्राह्मणी संस्कृति) में मिला है।
    आज का काल्पनिक पितृ पक्ष और दुर्गा पूजा जैसी आडंबर पाखंड से परिपूर्ण कुरीति कर्मकांड की वास्तविकता को समझने हेतु सम्यक संस्कृति में संघ होता था। उस संघ में देसना देणे वाले (देवगण) जितने भी अरहत भिक्खु होते थे, वे वर्ष के 9 महीने गृहस्थों (Layman) के बीच ज्ञान की देशना (Teachings) देते थे और 3 महीना वर्षावास (सावन, भादो, अश्विन) करते थे। जिसमें भिक्खु और भिक्खुनी दोनों अपने ज्ञान को मजबूत करने हेतु, साधना (Practice of Insight meditation) करते थे। इसी वजह से आज की प्रचलित मान्यता अनुसार वर्षावास के समय सभी देवगण को अनुपस्थित रहने की वजह से शुभ कार्य बंद रहता है।
    वर्षावास का अंतिम महीना अश्विन होता है। इस महीने के बाद सभी अहंत भिक्खु और भिक्खुनी (देवगण) को देशना (ज्ञान देना) देने हेतु गृहस्थों के बीच जाना निश्चित होता है।
    इस वजह से भिक्खु और भिक्खुनी को अपनी प्राप्त ज्ञान साधना की जांच होती है।
    यह जांच साधना-विधि द्वारा की जाती है। जिसमें अश्विन महीना का पहला कृष्णपक्ष (कण्ह पक्ख) में पुरुष भिक्खुओं की साधना जांच होती है।

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  13. इस वजह से इस पक्ख (पक्ष) का नाम 'पितु साधना पक्ख' से जाना जाता था, जो आज विकृत होते हुए पितु साध पख से 'पितृ श्राद्ध पक्ष' बन गया है या किसी साजिश के तहत किसी धूर्त ने भ्रम का पुलिंदा बनाते हुए इसे जीवकोपार्जन का साधन बना लिया है।
    वहीं अश्विन महीने के दूसरे पक्ख में महिला भिक्खुनी की साधना जांच होती थी।
    पिटक के अनुसार महिला भिक्खुनी का नियम पुरुष भिक्खुओं से बहुत कठिन होता था, जिस वजह से महिला साधु (भिक्खुनी) की जांच साधना का नाम ‘दुग्गम मातु साधना पख' से जाना जाता था। यह नाम आग वित मातु साधना से संस्कारित होते हुए 'दुर्गम मातु साधना पक्ष’ द्वारा आज 'दुर्गा माता साधना पक्ष' बन गया है और भ्रम का पुलिंदा बनते हुए शाक्त पंथ का हिस्सा बनकर रह गया है। ऐसे ही एक जानकारी और प्राप्त कर लें कि यह दुर्गा साधना की प्रथा वज्रयान से निकली शाक्त पंथ में थी, जिस वजह से आज यह परम्परा सिर्फ शाक्त पंथी क्षेत्रों में ही मिलेगी। यह अलग बात है कि आज 25-30 वर्षों से हर ब्राह्मणी कर्मकांड का वैश्वीकरण होने की वजह से सारा कर्मकाण्ड का थोड़ा बहुत स्वरूप हर जगह मिल जाता है। लेकिन दुर्गा पूजा का जो स्वरूप आपको उत्तर-पूर्वी भारत (पाल वंश का क्षेत्र) में मिलेगा, वैसा स्वरूप कहीं नहीं मिलेगा। क्योंकि यह पूर्व काल में शाक्त पंथ बहुलता का क्षेत्र हुआ करता था।
    यह दोनों अश्विन के पहले कृष्ण पक्ष और दूसरे शुक्ल पक्ष में होता है।
    इसके बाद भिक्खु-संघ के लोग देशना देने हेतु, गृहस्थों के बीच निकल जाते हैं, जिस वजह से पुनः 9 महीना शुभ-कार्य इन सभी (भिक्खु-संघ) के द्वारा सम्पन्न होने लगता है। लेकिन यही पितु पक्ख और मातु पक्ख को कलम कसाइयों द्वारा भ्रम का पुलिंदा के तौर पर पितृ पक्ष और दुर्गा माता पक्ष बना दिया गया है।

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  14. महात्मा बुद्ध के आस्तिक होने से संबंधित अगला प्रश्न यह है कि क्या वह अनीश्वरवादी अर्थात ईश्वर में विश्वास न रखने वाले थे? इसका समाधान करते हुए पं. धर्मदेव जी लिखते हैं कि नास्तिक शब्द का एक प्रचलित अर्थ ईश्वर की सत्ता से इन्कार करनेवाले का है। क्या महात्मा बुद्ध ईश्वर की सत्ता से इन्कार करनेवाले थे इस विषय में अपने विचार संक्षेप से माननीय डा. अम्बेदकर जी से बात-चीत के प्रसंग में (संदर्भः सार्वदेशिक जुलाई 1951 अंक) प्रकट कर चुका हूं। इस विषय पर कुछ अधिक प्रकाश डालने से पूर्व मैं ‘सन्त सुधा’ के सम्पादक श्री ईश्वरदत्त मेधार्थी अणुभिक्षु बुद्धपुरी कानपुर के लेख से कुछ उद्धरण देना उचित समझता हूं। ‘सन्त सुधा’ के बुद्ध जयन्ती अंक में ‘सन्त सिद्धार्थ’ शीर्षक से महत्वपूर्ण अपने लेख में श्री मेधार्थी ने लिखा है कि ब्रह्म के विषय में भगवान बुद्ध स्वयं कहते हैं—“ब्रह्मभूतो अतितुलो मारसेन प्पमद्दनो। सब्वा मित्ते बसीकत्वा, मोदामि अकुतोभयो।।“ अर्थात् –मैं अब ब्रह्म पद को प्राप्त हुआ हूं, मेरी तुलना अब किसी से नहीं है, मैंने मार (कामदेव) की सेना को मर्दित कर दिया है। अब मैं काम, क्रोध आदि सब अन्तः शत्रुओं को वश में करके निर्भय होकर मस्त हो रहा हूं। विद्वान लेखक पं. धर्मदेव इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि यह एक ही वचन भगवान बुद्ध की आस्तिकता और ब्रह्मपद प्राप्ति के लिये पर्याप्त है। जरा-सी समझने की बात है कि जो स्वयं ब्रह्मविहार करता हो, ब्रह्मचारी हो, ब्रह्मभूत हो (यह सम्भव ही नहीं है कि) वह ब्रह्म को न माने? वास्तव में बौद्ध साहित्य में निर्वाण, ब्रह्म, अमृतपद, परमसुख, उत्तम अर्थ, अनाष्यात, दुलर्भनाथा आदि शब्द एकार्थवाचक हैं





  1. जिज्ञासुओं को भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये। भगवान बुद्ध ने स्वयं कहा है–जो नास्तिक हैं उन्हें विनाशोन्मुख समझो। एक बात है–भगवान् बुद्ध आस्तिक तो थे ही, आर्य भी थे। आर्य शब्द से उन्हें बड़ा प्रेम था। चार आर्य सत्य, आर्य, अष्टांगिक मार्ग और आर्यश्रावक तो बहुत प्रसिद्ध हैं। आर्य शब्द गुणवाची है। आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ। इसलिये श्रेष्ठता, उच्चता, और उत्तमता की भावना के लिये ‘आर्य शब्द’ भगवान बुद्ध ने प्रयोग किया है। इसीलिये बुद्धपरी में आस्तिकता और अहिंसकता की श्रेष्ठ भावना को पुष्ट करने के लिये ‘आर्य बौद्ध’ शब्द का प्रचार किया जाता है। भगवान बुद्ध ने भी धम्मपद में स्वयं कहा है–’न तेन अरियो होति, येन पाणानि हिंसति। अहिंसा सबपाणानं, अरियोति पवुच्चति।।‘ (धम्मपद श्लोक 270, धम्मट्ठवग्गो 15) अर्थात् प्राणियों का हनन कर कोई आर्य नहीं होता, सभी प्राणियों की हिंसा न करने से उसे आर्य कहा जाता है। (सत्नसुधा कानपुर बुद्ध जयन्ती अंक मई 1950 पृष्ठ 10-11)। लेखक महोदय कहते हैं कि आचार्य मेधार्थीजी का उपर्युक्त लेख महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने बौद्ध ग्रन्थों का विशेष अनुशीलन करके उसे लिखा है और वे अपने को आर्य बौद्ध नाम से ही कहते हैं। पत्रिका सन्त-सुधा के मई 1950 अंक में आर्य बौद्ध संघ बुद्धपुरी के कुलगुरू श्री ज्ञानक्षेत्रजी की एक सूक्ति भी प्रस्तुत की गई है। यह सूक्ति है ”You will find so many Bhikshoos coming here (in Buddha Puri). They are the enemies of Om; but you will never leave Om, every thing is in Om, Lord Buddha is also in Om.” अर्थात् यहां बुद्धपुरी में आप कई भिक्षुओं को आते हुए पाते हैं जो ओम् (परमात्मा) के शत्रु या विरोधी हैं किन्तु आपको ओम् का परित्याग कभी नहीं करना चाहिये। सब कुछ ओम् में है। बुद्ध भगवान् भी ओम् में हैं।

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  2. महात्मा बुद्ध को उनके अनुयायी ईश्वर में विश्वास न रखने वाला नास्तिक मानते हैं। इस सम्बन्ध में आर्यजगत के एक महान विद्वान पं. धर्मदेव विद्यामार्तण्ड अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘बौद्धमत एवं वैदिक धर्म” में लिखते हैं कि आजकल जो लोग अपने को बौद्धमत का अनुयायी कहते हैं उनमें बहुसंख्या ऐसे लोगों की है जो ईश्वर और आत्मा की सत्ता से इन्कार करते हैं तथा वेदों की निन्दा करते हैं। माननीय डा. भीमराव अम्बेदकर भी जिस बौद्धमत के प्रचार के लिए प्रयत्नशील थे उसमें भी बौद्धमत का ऐसा ही नास्तिक स्वरूप माना जाता है, किन्तु बौद्ध ग्रन्थों के निष्पक्ष अनुशीलन करने पर वह (पं. धमदेव विद्यामार्तण्ड) इस परिणाम पर पहुंचें हैं कि महात्मा बुद्ध ईश्वर की सत्ता से सर्वथा इनकार करनेवाले और वेदों की निन्दा करने वाले न थे, प्रत्युत आस्तिक थे। एक बड़ी कठिनाई महात्मा बुद्ध के यथार्थ विचार जानने में यह है कि उन्होंने स्वयं कोई ग्रन्थ नहीं लिखा। अब दीघनिकाय, मज्झिनिकाय, विनयम पिटक आदि जो भी ग्रन्थ महात्मा बुद्ध के नाम से पाये जाते हैं उनका संकलन उनके निर्वाण की कई शताब्दियों के पश्चात् किया गया जिनमें से बहुत-सी उक्तियां किंवदन्ती के ही रूप में हैं।

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  3. नास्तिक कौन होता है? इस प्रश्न को उठाकर उसका समाधान करते हुए आर्यविद्वान पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि अष्टाध्यायी के ‘अस्ति नास्ति दिष्टं मतिं’ इस सुप्रसिद्ध सूत्र के अनुसार जो परलोक और पुनर्जन्म आदि के अस्तित्व को स्वीकार करता है वह आस्तिक है और जो इन्हें नहीं मानता वह नास्तिक कहाता है। महात्मा बुद्ध परलोक और पुनर्जन्म को मानते थे इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। इसलिये उन्हें सिद्ध करने के लिए अनेक प्रमाण देना अनावश्यक है। प्रथम प्रमाण के रूप में धम्मपद के जरावग्गो श्लोक (संख्या 153) ‘अनेक जाति संसारं, सन्धाविस्सं अनिन्विस। गृहकारकं गवेस्संतो दुक्खा जाति पुनप्पुनं।।’ में महात्मा बुद्ध ने कहा है कि अनेक जन्मों तक मैं संसार में लगातार भटकता रहा। गृह निर्माण करनेवाले की खोज में। बार-बार जन्म दुःखमय हुआ। श्लोक का यह अर्थ महाबोधि सभा, सारनाथ-बनारस द्वारा प्रकाशित श्री अवध किशोर नारायण द्वारा अनुदित धम्मपद के अनुसार है। दूसरा प्रमाण ब्रह्मजाल सुत्त का है जहां महात्मा बुद्ध ने अपने 2 या 4 नहीं अपित लाखों जन्मों के चित्तसमाधि आदि के द्वारा स्मरण का वर्णन किया है। वहां उन्होंने कहा है–भिक्षुओं ! कोई भिक्षु संयम, वीर्य, अध्यवसाय, अप्रमाद और स्थिर चित्त से उस प्रकार की चित्त समाधि को प्राप्त करता है जिस समाधि को प्राप्त चित्त में अनेक प्रकार के जैसे कि एक सौ, हजार, लाख, अनेक लाख पूर्वजन्मों की स्मृति हो जाती है–‘‘मै। इस नाम का, इस गोत्र का, इस रंग का, इस आहार का, इस प्रकार के सुखों और दुःखों का अनुभव करनेवाला और इतनी आयु तक जीनेवाला था। सो मैं वहां मरकर वहां उत्पन्न हुआ। वहां भी मैं इस नाम का था। सो मैं वहां मरकर यहां उत्पन्न हुआ।” इत्यादि। अगला तीसरा प्रमाण धम्मपद के उपर्युक्त वर्णित श्लोक का अगला श्लोक है जिसमें गृहकारक के रूप में आत्मा का निर्देश किया गया है। श्लोक है- ‘गह कारक दिट्ठोऽसि पुन गेहं न काहसि। सब्वा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसंखितं। विसंखारगतं चित्तं तण्हर्निं खयमज्झागा।।’ इस श्लोक के अनुवाद में इसका अर्थ दिया गया है कि हे गृह के निर्माण करनेवाले ! मैंने तुम्हें देख लिया है, तुम फिर घर नहीं बना सकते। तुम्हारी कड़ियां सब टूट गईं, गृह का शिखर गिर गया। चित्त संस्कार रहित हो गया, तृष्णाओं का क्षय हो गया। इस पर टिप्पणी करते हुए पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि यह मुक्ति अथवा निर्वाण के योग्य अवस्था का वर्णन है। जब तक ऐसी अवस्था नहीं हो जाती तब तक जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है। इस प्रकार यह सर्वथा स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध परलोक, पुनर्जन्म आदि में विश्वास करने के कारण आस्तिक थे।

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  4. कई लोग विशेषतः भारत के नवबौद्ध ऐसा कहते नहीं थकते की गौतम बुद्ध सनातन धर्म और सनातन धर्म के पौराणिक ग्रंथो के विरोधी थे, पर वस्तुतः ये पूरी तरह से गलत है , दुष्प्रचार है। सत्य तो ये है गौतम बुद्ध वेद और वेदो में निहित ज्ञान विज्ञान के बड़े प्रशंशक थे और उनकी दृष्टि में वेद ज्ञान के भंडार है।

    इस सत्य की पुष्टि अनेक बौद्ध साहित्य और बौद्ध ग्रंथो से होती है।



    आइये आज हम इसी विषय पर चर्चा करते है और जानते है की विभिन्न बौद्ध ग्रंथो में भगवन बुद्ध ने वेद के बारे में क्या विचार प्रकट किये थे।



    इस तथ्य को समझने के लिए हमने विभिन्न बौद्ध साहित्य और बौद्ध धार्मिक ग्रंथो का अध्ययन किया है और ये लेख उसी शोध के आधार पर लिखा है

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  5. 1) सुत्त निपात बौद्ध दर्शन का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जिसके सभिय सुत्त में महात्मा बुद्ध ने एक वेदज्ञ ( वेद को जाननेवाला ) के लक्षण को बताया है जो इस प्रकार है

    वेदानि विचेग्य केवलानि समणानं यानि पर अत्थि ब्राह्मणानं।

    सब्बा वेदनासु वीतरागो सब्बं वेदमनिच्च वेदगू सो।।

    (सुत्त निपात 529)

    इस सूक्त में बुद्ध बताते है जिसने सब वेदो और कैवल्य वा मोक्ष-विधायक उपनिषदो का अध्ययन कर लिया है और जो सब वेदनाओ से वीतराग होकर सबको अनित्य जानता है वही वेदज्ञ है ।

    2) एक प्रश्न आता है कि किन गुणोँ को प्राप्त करके मनुष्य श्रोत्रिय होता है?

    बुद्ध इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार देते है

    "सुत्वा सब्ब धम्मं अभिञ्ञाय लोके सावज्जानवज्जं यदत्थि किँचि।

    अभिभुं अकथं कथिँ विमुत्त अनिघंसब्बधिम् आहु 'सोत्तियोति"।।



    बुद्ध बताते है की " जितने भी निन्दित और अनिन्दित धर्म है उन सबको सुनकर और जानकर जो मनुष्य उनपर विजय प्राप्त करके निश्शंक, विमुक्त, और सर्वथा निर्दुख हो जाता है, उसे श्रोत्रिय कहते है "।

    यहाँ ध्यान देने की बात है की संस्कृत भाषा में श्रोत्रिय शब्द का प्रयोग ' श्रोत्रियछश्न् दोऽधीते ' वेद पढ़नेवाले के लिए किया जाता है जो अष्टाध्यायी के सूत्र के अनुसार सही है।

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  6. 3) मनुस्मृति में महर्षि मनु गायत्री मन्त्र को सावित्री मन्त्र के नाम से भी पुकारते हैं जिसका कारण ये है कि परमेश्वर को 'सविता' के नाम से स्मरण किया गया है।

    "ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् , भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् " । ।

    गायत्री मन्त्र का भावार्थ - उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें । वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

    महात्मा बुद्ध गायत्री मंत्र के बड़े प्रशंशक थे जो सुत्तनिपात महावग्ग सेलसुत्त के इस श्लोक से स्पष्ट होता है।

    "अग्गिहुत्तमुखा यज्ञाः सावित्री छन्दसो मुखम्"।

    छन्दो मे सावित्री छन्द (गायत्री मंत्र) प्रधान है तथा इससे अग्रिहोत्र ( विषयक श्रद्धा ) का भी आभास मिलता है।

    4) बौद्ध धर्म ग्रन्थ सुत्तनिपात के एक श्लोक 322 मे महात्मा बुद्ध कहते है -

    एवं पि यो वेदगू भावितत्तो, बहुस्सुतो होति अवेध धम्मो।

    सोखो परे निज्झपये पजानं सोतावधानूपनिसूपपत्रे।।

    इस श्लोक में बुद्ध कहते है " जो वेद जाननेवाला है, जिसने अपने को सधा रखा है, जो बहुश्रुत है और धर्म का निश्चय पूर्वक जाननेवाला है वह निश्चय से स्वयं ज्ञान बनकर अन्योँ को जो श्रोता सीखने के अधिकारी है ज्ञान दे सकता है। "

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  7. 5) बौद्ध ग्रन्थ सुन्दरिक भारद्वाज सुत्त में एक रोचक कथा आती है जिसमे सुन्दरिक भारद्वाज ने जब अपना यज्ञ समाप्त कर लिया तो वह यज्ञ शेष किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को देना चाहते थे , तभी उनकी दृष्टि संन्यासी बुद्ध पर पड़ी। सुन्दरिक भारद्वाज ने जब बुद्ध से उनकी जाति पूछी तब बुद्ध ने खुद को ब्राह्मण कहा और उसे सत्य का उपदेश देते हुए कहा -



    "यदन्तगु वेदगु यञ्ञ काले। यस्साहुतिँल ले तस्स इज्झेति ब्रूमि।।"



    श्लोक का हिंदी भावार्थ - वेद को जाननेवाला जिसकी आहुति को प्राप्त करे उसका यज्ञ सफल होता है ऐसा मै कहता हूं।

    6) बौद्ध धर्म ग्रन्थ सुत्तनिपात के श्लोक 1059 में महात्मा बुद्ध ने जो कहा वो इस श्लोक के रूप में उल्लेखित है -

    यं ब्राह्मणं वेदगुं अभिजञ्ञा अकिँचनं कामभवे असत्तम्।

    अद्धाहि सो ओघमिमम् अतारि तिण्णो च पारम् अखिलो अडंखो।।

    श्लोक का हिंदी भावार्थ - जिसने उस वेदज्ञ ब्राह्मण को जान लिया जिसके पास कोई धन नही, जो भौतिक कामनाओ मे आसक्त नही है , वह आकांक्षा से रहित होनेवाला इस संसार सागर के पार पहुंच जाता है।

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  8. 7) बौद्ध धर्म ग्रन्थ सुत्तनिपात के एक अन्य श्लोक में बुद्ध कहते है

    "विद्वा च वेदेहि समेच्च धम्मम्|

    न उच्चावचं गच्छति भूरिपञ्ञो|(सुत्तनिपात २९२)

    श्लोक का हिंदी भावार्थ - जो विद्वान वेदो से धर्म का ज्ञान प्राप्त करता है, वह कभी भी विचलित नही होता है।

    8) बौद्ध धर्म ग्रन्थ सुत्तनिपात के एक अन्य श्लोक में बुद्ध कहते है

    विद्वा च सो वेदगू नरो इध, भवाभवे संगं इमं विसज्जा।

    सो वीतवण्हो अनिघो निरासो,आतारि सो जाति जंराति ब्रमीति।। (सुत्तनिपात१०६०)

    श्लोक का हिंदी भावार्थ - वेद को जानने वाला विद्वान इस संसार मे जन्म और मृत्यु की आसक्ति का त्याग करके शोक , इच्छा ,तृष्णा तथा पाप से रहित होकर जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।

    इन सभी तथ्यों से ये स्पष्ट होता है कि भगवान बुध्द वेदो के विरोधी नही थे बल्कि वेदो को वे ज्ञान विज्ञान का अक्षय स्तोत्र मानते थे। उन्होंने अपने किसी भी उपदेश में वेद में निहित ज्ञान विज्ञान पर किसी प्रकार का संदेह प्रकट नहीं किया बल्कि सदैव उन्होंने वेदो के प्रति आदर का ही भाव प्रकट किया है।

    बुद्ध के उपदेशो में जहा कही भी निन्दासूचक शब्द आये है वे उन ब्राह्मणोँ के लिए आये है जिन्होंने वेदो में निहित ज्ञान विज्ञान के अनुरूप आचरण नहीं किया और पथभ्रस्ट हो गए।

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  9. SJL37 | दयानंद सरस्वती का षड्यंत्र | Historical Conspiracy by Dayanand Sarasvati | Science Journey

    https://www.youtube.com/watch?v=Qj-3X7o7OVk

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  10. गौतम बुद्ध के पिछले जन्म में भी वेदों का अस्तित्व!

    गौतमबुद्ध के पिछले जन्म में भी वेदों का अस्तित्व था। न केवल अस्तित्व था, बल्कि गौतम बुद्ध पिछले जन्म में एक पुरोहित थे और वेदों का समर्थन भी करते थे।
    बुद्ध के पिछले जन्मों की कथायें,बुद्ध के ही द्वारा बताई गई हैं। इन्हीं को "जातक कथायें" कहते हैं, जोकि सुत्तपिटक का एक भाग है़।
    इन्हीं जातकों में से एक 'सेतकेतु(श्वेतकेतु) जातक' है जो जातक कथा नंबर ३७७ है।
    इसमें गौतम बुद्ध एक राजा के पुरोहित हैं और सेतकेतु एक दंभी,विलासप्रिय संन्यासी है। ये अपने शिष्यों के ऐशो आराम के लिये राजा के पास आता है और अपनी सिद्धई जमाने की कोशिश करता है। पर राजा का पुरोहित, जो पिछले जन्म में बुद्ध थे, उसके मत का खंडन करते हैं। सेतकेतु वेदों पर आक्षेप करता है व पुरोहित उसका खंडन करते हैं। देखिये:-
    When the king heard this, he took away his favour from the ascetics. Setaketu thought: “This king took a liking to the ascetics, but this priest has destroyed it as if he had cut it हैं।
    an axe: I must talk to him”: so talking to him he spoke the fifth stanza:
    सेतकेतु ने सोचा, कि ये राजा हम संन्यासियों व चेलों के पक्ष में है,पर ये राजपुरोहित सारे किये कराये पर पानी फेर रहा है। तब पुरोहित से 'सेतकेतु पांचवें पद्य के रूप में कहता है:-
    “A learned sage may do ill deeds, O king:
    A learned sage may fail to follow right”
    You say: then Vedas are a useless thing:
    Just works with self-restraint are requisite.
    "हे राजन्! तुम ( राजा- पुरोहित दोनों) कहते हो कि एक ज्ञानी संत बुरे कर्म कर सकता है व अच्छे मार्ग पर चलने से नाकाम हो सकता है। यदि ऐसा है तो सारे वेद व्यर्थ की चीजें हैं।"
    The priest hearing this, spoke the sixth stanza:
    Nay, Vedas are not useless utterly:
    Though works with self-restraint true doctrine is:
    Study of Vedas lifts man’s name on high,
    But ’Tis by conduct that he reaches Bliss.
    So the priest refuted Setaketu’s doctrine.
    पुरोहित यानी बुद्ध ने उसको छठवें पद्य में जवाब दिया:-
    " नहीं! वेद व्यर्थ की चीज नहीं होते। वेद का पठन पाठन व्यक्ति की आत्मोन्नति करता है। केवल उनको आचरण में पालन करके ही उच्चता पाई जा सकती है।"
    इस तरह पुरोहित ने सेतकेतु के मत का खंडन किया।
    After the lesson the Master identified the Birth: “At that time Setaketu was the cheating priest, the candala was Sariputta, and the King’s priest was myself.”
    इस कथा के बाद बुद्ध कहते हैं-"सेतकेतु उस जन्म में धोखा देने वाला पुरोहित था, चांडाल सारिपुत्त था, और मैं ही उस राजा का पुरोहित था।"
    stories of the buddha’s former births
    book 6 chanipāta
    377. Setaketu Jātaka
    ( बुद्ध के पिछले जन्मों की कहानियां। सेतकेतु जातक ३७७)
    इस बौद्ध वेबसाइट suttacentral.com का लिंक है। यहीं से कथा उठाई है।
    https://suttacentral.net/ja377/en/francis-neil
    अतः सिद्ध हुआ कि बुद्ध के पिछले जन्म में भी वेदों का अस्तित्व था साथ ही, बुद्ध भी वेद के समर्थक थे।
    ये प्रमाण उन भीमसैनिकों के मुंह पर करारा तमाचा है जो संस्कृत व वेदों को बुद्ध के बहुत बाद का बताते हैं।
    अतः भीमसैनिकों को अपने बुद्ध की बात मानते हुये वेदों का समर्थन करना चाहिए।
    नमस्ते
    ।।ओ३म्।।

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    1. Complete untruth!!!

      जातक कथा सिर्फ बोध कथा मात्र है, इतिहास कतय नहीं है!

    2. Complete truth है। 
      तुम भीम सैनिक पहले कहते हो की बुद्ध से पहले भी २८ बुद्ध और बौधिसत्व रहे हे। इसके लिए प्रमाण जातक से दिखाते हो और अब जातक को ही नकार रहे हो। कितने बड़े दोगले हो बे। 

      चलो एक समय के लिए मान भी ले की ये सिर्फ कथा हे फिर भी इसमें तो वेदों का जिक्र तो हे ना। कथा भी मान ले तब भी वेद बुद्ध के समकालीन या फिर उससे पप्राचीन ही होंगे।

  11. विज्ञान vs अज्ञान ||Neuro Science of consciousness? Modern science and nature part 1

    https://youtu.be/q6yqr7pPfcM

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  12. @Alok Sahu,

    गलत जानकारी। मनुवादी बालक,दयानंदी नियोगपुत्र, तुझे कुछ भी पता नहीं है, तु हवा में तीर मार रहा है। तुझे 'जातक' कथा (बोध कथा) और 'बुद्धवंस' इन दो ग्रंथों को तु एक ही ग्रंथ समझ रहा है, बालक 'बुद्धवंस' इस ग्रंथ मे पूर्व बुद्धोन्की जानकारी मिलती है। अभ्यास बढा दे और सत्य को स्वीकार कर, मूर्खतापूर्ण बातें मत कर, सुधर जा !!!

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  13. @Asatya Ka Bhandafod

    अबे बिलकुल सही जानकारी हे बे भीमटे। अबे तूझे सच बर्दास्त नही हो रहा हे तो में क्या करू??? बामसेफि गज नियोगपुत्र पता तो तुझे घंटा कुछ नही हे और लेक्चर मुझे दे रहा हे। २८ बुद्ध का जिक्र जातकों में भी हे। जातक की पहली कथा दूरें निदान में ही दीपांकर से ले कर २७वे बुद्ध का जिक्र हे। सत्य तो स्वीकार नही कर पा रहा हे इसीलिए बिलबिला कर जातको को ही नकार रहा है। 

    एक समय के लिए जातक को काल्पनिक कहानियां मान भी ले तब भी। बुद्ध के मुख से वेदों का जिक्र वेद को बुद्ध से ही प्राचीन साबित करता है।

    REPLY
    1. @Alok Sahu,
      मनुवादी बालक,दयानंदी नियोगपुत्र, युधिष्ठिरटे, भीमटे, अर्जुनटे, नकुलटे, सहदेवटे,
      तेरा कुछ भी नहीं हो सकता, सच में तेरा मगज गिरवी रखा हुया है! अक्कल शून्य बालक वेद का जिकर किसी भी पाली टिपिटक (त्रिपिटक) ग्रंथ में नहीं है! त्रिरत्न या त्रिविद्या का मतलब तीन वेद नहीं है!!!


    2. अबे भीमटे बामसेफी गज नियोगपुत्र
      भीमवादी, बुधटे तू अपना संभाल मेरी चिंता मत कर। बिलकुल वेद,यज्ञ के जिक्र से तेरा पूरा पाली कैनन भरा हुआ हे। तेरे ना मानने से कुछ नही होता। सांची बौद्ध स्तूप पर खुद कश्यप जटिल की कहानी का चित्र है जिस पर यज्ञ करते हुए ऋषि मुनि का जिक्र है। तेरे आंख बंद कर देने से सच नही बदल जाता। इसीलिए अपना दो कौड़ी का अज्ञान का पिटोरा अपने पास रख। पहले त्रि रत्न होते क्या हे वोह पता कर फिर ज्ञान पेलना।

  14. @Alok Sahu,
    मनुवादी बालक,दयानंदी नियोगपुत्र, बामटे, युधिष्ठिरटे, भीमटे, अर्जुनटे, नकुलटे, सहदेवटे,
    तू तो संपूर्ण असत्य लिख रहा है, जरा शरम कर, बेशरम की तरह कब तक ऐसे झूठ पे झूठ लिखता रहेगा? फर्जी आर्य समाजी किडे सुधर जा, नहीं तो गोबर-मूत्र भरे खोपडी वाले एक दीन पागल खाने मे भरती जरूर भरती होगा!!!

    REPLY
  15. भीमटे बालक, बामसैफी गज नियोगपुत्र, बामटे, बुधटे,
    में बिल्कुल सच लिख रहा हु बे। तुझे सच बर्दास्त नही हो रहा तो में क्या करू?? 
    जा नही सुधारता बोल क्या बिगाड़ लेगा बे। बाम सेफी गधे। सच सुन का तुम लोगो के गुर्दों में दर्द कहे होने लगता है बे।

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    1. This comment has been removed by the author.

  16. दयानंदटे, नियोगटे, फर्जी आर्यटे, अत्रीटे, सुरेन्द्र कुमारटे, भीमटे, बामसैफी तथाकथित ब्रह्मपुत्र तथा नियोगपुत्र, बामटे, बुधटे,
    तु बिल्कुल असत्य ही लिख रहा है बे। तुझे असत्य ही जादा पसंद है तो में क्या करू??
    तु नियोगपुत्र सुधरनेवाला बिलकुल नहीं है, इसलीये तेरा सबकुछ बिगडनेवाला है बे। बामसेफी-आर्य समाजी गधे, सुअर, कुत्ते। असत्य लिखकर ही तुम लोगो के गुर्दों में दर्द चालू हो जाता है बे।

    REPLY
  17. आंबेडकरटे,गज नियोगटे, फर्जी आर्यटे, अत्रीटे, सुरेन्द्र कुमारटे, बुधटे, आर्य समाजी तथाकथित शाक्यपुत्र तथा गज नियोगपुत्र, बामटे, युधिष्ठिरटे, अअसत्य तो तू लिख रहा है बे। अपनी आदत मुझ पर मत डाल
    गज नियोगपुत्र नही सुधरनेवाला वाला हू में जा जो उखाड़ना है उखाड़ ले। बिगाड़ कर दिखा मेरा बामसेफी-आर्य समाजी गधे, सुअर, कुत्ते। असत्य लिखकर ही तो तेरे जेसे लोगो का धंधा चलता है। हुमारा धंधा तो सत्य लिख कर चलता है।

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    1. वाह भाई मै लगातार आपका और इस सुतीये के तर्क वितर्क पढ़ रहा था बहुत जबरदस्त जवाब दिया आपने इस वजह से ही ये गाली गलौच पर उतर आया आपको नमन।

  18. Science journey is fake..propaganda and false is feeding of nav baudhist thinking

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  19. Buddh dharm ne bharat ko gulam bana diya.afganistan buddhist ho gaya yuddh karna chhod diya .jhola pahan liya .to mullon ne inko mara kuta.to kuchh bhag gae baki ke mulley ban gae .aaj afganistan mulla desh hai . Islia buddhon ne buddh dharm chhod vapas hindu ban gae

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