क्या भर्हुत और सांचि के स्तूपों पर बनी गजों द्वारा जलाभिषेत देवी वाले फलक गजलक्ष्मी न हो कर मायादेवी हैं? (क्या लक्ष्मी प्रतिमायें मायादेवी की नकल हैं?)
क्या भर्हुत और सांचि के स्तूपों पर बनी गजों द्वारा जलाभिषेत देवी वाले फलक गजलक्ष्मी न हो कर मायादेवी हैं? (क्या लक्ष्मी प्रतिमायें मायादेवी की नकल हैं?)
नमस्तें! प्रिय पाठकों, आज हम आप सब के लिए एक महत्वपूर्ण विषय लेकर आ रहे हैं। यहां हम नवबौद्धों के एक और दावे की पडताल करेगें। यह दावा है कि भर्हुत और सांचि आदि स्तूपों पर बनी गजों द्वारा जलाभिषेत देवी के फलक गजलक्ष्मी नहीं है बल्कि मायादेवी है। मायादेवी से ही ब्राह्मणों ने लक्ष्मी को नकल किया था। यहां गजों द्वारा कुंभों से अभिषेक की हुई भर्हुत स्तूप पर बनी एक देवी का चित्रण देखा जा सकता है -
- South Asian Studies, 26.1, Page no. 78, fig.2
इस फलक में आप देख सकते हैं कि एक देवी एक कलश से निकलते कमल पर खडी है तथा दो हाथी उसका जल से भरे कलशों से अभिषेक कर रहे हैं। आजकल ऐसी प्रतिमायें हिंदुओं द्वारा गजलक्ष्मी की बनाई जाती है। इसी प्रतिमा के बारे में नवबौद्ध ऐसा दावा करते हैं कि यह प्रतिमा बुद्ध की माता मायादेवी की है। और गजलक्ष्मी या लक्ष्मी मायादेवी की नकल है। जबकि वास्तिवकता यह है कि लक्ष्मी या गजलक्ष्मी का चित्रण इन स्तूपों से पहले भारतीयों में प्रचलित था जो कि भारत में लक्ष्मी पूजन अथवा लक्ष्मी प्रतिमाओं के स्वतंत्र अस्तित्व को प्रकट करता है। लक्ष्मी को हिंदुओं के वैदिक, शाक्तों और वैष्णवों में धन ऐश्वर्य की देवी के रूप में स्थान प्राप्त हुआ है। वेदों की आश्वलायनशाखा की ऋग्वेद संहिता के श्रीसूक्त में श्री, लक्ष्मी नाम से धन के प्रतीक के रूप में देवी का उल्लेख प्राप्त होता है -
- आश्वलायनशाखीय ऋग्वेदसंहिता 5.6.88
यहां तक की बौद्धों के मान्य ग्रंथ त्रिपिटक में भी ऐश्वर्य की देवी के रूप में श्री (लक्ष्मी) देवी का उल्लेख प्राप्त होता है, जिसके आह्वान का बुद्ध ने विरोध भी किया था।
- महासीलं 26, ब्रह्मजालसुत्तं 1, सीलक्खन्धवग्गपालि, दीघनिकायो, सुत्तपिटक
यहां पालि में सिरिव्हायनं (संस्कृत - श्री आह्वान) इस सुत्त के अंग्रेजी अनुवाद में भी goddess of luck लिखा है।
- 3 The long Section on Virtue (Mahasila) 26, Brahmajala Sutta: The All - embracing Net of Views, Digha Nikaya, Tiptaka
https://www.accesstoinsight.org/tipitaka/dn/dn.01.0.bodh.html
इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि भारतीय जनमानस में प्राचीनकाल से लेकर ही धन, ऐश्वर्य तथा भाग्य की प्रतीकात्मक देवी के रूप मे श्री लक्ष्मी की स्वतंत्र मान्यता थी। न केवल ग्रंथों और साहित्यों अपितु प्राचीन मृणशिल्पों, फलकों और मुद्राओं पर भी लक्ष्मी देवी का चित्रण था -
- Classical Numismatic Gallery, Auction 5, lot no. 289
कोशाम्बी से प्राप्त यह सिक्का 200 ईसापूर्व प्राचीन है तथा इस पर गजलक्ष्मी का चित्रण है।

सारी वैदिक (भोगवादी) संस्कृति का एक ही नारा था-गो ब्राह्मण हिताय । गौ धन का प्रतीक है। गौ का तरह-तरह से उपभोग और ब्राह्मणों के मंत्रों का उपयोग-गौ और ब्राह्मण सुरक्षित रहें, यही उसका नारा था। इसके विपरीत, भगवान बुद्ध ने बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय का नारा बुलन्द किया। उन्होंने कहा-गो ब्राह्मण हिताय नहीं, बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय । भगवान बुद्ध का यह नारा इस देश के कुटिल कपटी, मानवता के घोर शत्रु स्वार्थी भोगवादी ब्राह्मण वादियों को भला कैसे सहन हो सकता था। इसलिए उन्होंने इसको नष्ट करने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। तरह-तरह के छल, कपट प्रपंच रचकर बुद्ध को भुलवाया गया। भोगवादी संस्कृति ने इस देश पर फिर से कब्जा कर लिया। लेकिन उसी तरह से जैसे मिट्टी का घड़ा घी को सोख लेता है, परन्तु उस घड़े को सूंघने से घी की गन्ध फिर भी आती है, ठीक उसी तरह से ब्राह्मण संस्कृति ने भगवान बुद्ध के त्यागवादी संस्कृति पर कब्जा कर लिया लेकिन हजारों वर्ष के गुजर जाने के बावजूद ब्राह्मण संस्कृति से भगवान बुद्ध की त्यागवादी संस्कति की गन्ध आज भी आ रही है। हमें सारे सिद्धों, नायों और सन्तों की वाणी में भगवान बुद्ध की त्यागवादी आध्यात्मिक वाणी की सुगन्ध मिलती है। हजारों सालों से नष्ट करने के बावजूद उस बाणी में आज भी आकर्षण है । और यही कारण है कि आज भी लोगों को सन्तों की वाणी अच्छी लगती है। गांवों में अनेकों लोग ऐसे मिलेंगे जो व्रत नहीं रखते, तीर्थ नहीं जाते, यज्ञ नहीं करते । जब उनसे पूछा जाता है तो वे कहते हैं कि मन शुद्ध है तो सब कुछ शुद्ध है। भीतर को ठीक रखो, बाहर में क्या रखा है। नेक बनो, दूसरों की सहायता करो। यह जो कुछ हमारे जीवन में अच्छाई रह गई है, वह सब बुद्ध की वाणी है, यह सब उसी महापुरुष की देन है जिसे हजारों तरह से विकृत करने की चेष्टा की गई । इह सम्बन्ध में एक दो बातों का स्मरण रखना आवश्यक है :
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भारतवर्ष कैसे फैला? भारतीयता कैसे फैली? वैदिक धर्म कहाँ गया? कहाँ फेला? वैदिक धर्म ने इस देश को खण्डित किया। यदि बौद्ध धर्म और बुद्ध नहीं होते तो यह देश आज एक न होता । अशोक से गुप्तकाल तक उनके देश के सब लोग बौद्ध बन गये। ब्राह्मण कहते थे कि यहां न आओ अन्यथा भ्रष्ट हो जाओगे। वे आस-पास के प्रदेश की यात्रा को पाप समझते थे और कहते थे कि नदी पार करने पर नरक की प्राप्ति होती है। आज भी कर्मनासा नदी, जो बनारस के पास है, को लांघना अनिष्ट बताते हैं क्योंकि इस नदी के उस पार की भूमि बुद्ध की भूमि रही है। आज भी लोग उस नदी का पानी नहीं छूते । बाढ़ आने पर लोग नाव में इस तरह से चढ़ते हैं कि पानी में पैर न लगे। कबीर ने कहा कि यदि काशी में रहने से ही मुक्ति होती है तो वह मगध में जाकर क्यों न मरे क्योंकि वह बुद्ध की कर्म भूमि है। इसीलिए कबीर मगध में जाकर मरे।
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जब अंग्रेजों के साथ संबंध स्थापित हुआ तो उन्होंने चाहा कि हिन्दुस्तानी बूचड़ समुद्र पार कर यूरोप जाएं और इंग्लैण्ड देखें। लेकिन उनका कहना मानकर जो भी इंग्लैण्ड गये वे सबके सब जाति से बहिष्कृत कर दिये गए। क्या यही संस्कृति है? इनके साथ संस्कृति शब्द को जोड़ना, संस्कृति शब्द का अपमान करना है, उसका दुरुपयोग करना है। इन लोगों ने सारे देश को नरक बना दिया। हिन्दु धर्म के साथ संस्कृति शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता। संस्कृति के असली उत्तराधिकारी वे लोग हैं जिन्होंने नदी पार की, समुद्र पार किया और बुद्ध के संदेश को सारे संसार में फैलाया तथा उसे आलोकित किया। उन्होंने सांस्कृतिक विस्तार के द्वारा विभिन्न देशों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित किया। संस्कृति का लक्षण हम बौद्धों के अनुकल और हिन्दुओं के प्रतिकूल है। जब बोधिसत्व बाबा साहेब डा० अम्बेडर ने लाखों करोड़ों लोगों को इकट्ठा किया और उन्हें बुद्ध की शरण में ले आये तो क्या यह भारतीय संस्कृति का काम नहीं है? निस्सन्देह ऐसा करके बाबा साहेब ने भारतीय संस्कृति का उद्धार किया है। यह महान कार्य बाबा साहेब ही कर सकते थे।
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भारतीय संस्कृति के तीन प्रवाह
भक्ति, ज्ञान और कर्म, भारतीय संस्कृति के तीन प्रवाह माने जाते हैं। इनके विकास में बौद्धों ने अपना अमूल्य योगदान दिया है। इसी की प्रेरणा से बौद्धों ने बड़े-बड़े काव्य लिखे, ग्रन्थ लिखे, कथाएं लिखी और मूर्तिकला, वास्तुकला आदि विविध कलाओं का विकास किया। भगवान बुद्ध की मूर्ति पर जो शांति झलक रही है उसमें सारी आध्यात्मिकता को पत्थर पर तरासकर उतार देना, यह कितनी आश्चर्यजनक चीज है । सारनाथ की बुद्ध प्रतिमा को देखो, चाहे मथुरा की बुद्ध प्रतिमा को देखो, सबमें आध्यात्मिकता झलकती है। तिब्बत, चीन, जापान के चित्रों में किस प्रकार आध्यात्मिकता उभारी गई! यह है भारतीय संस्कृति जिसे हमें संजोकर रखना है, दूसरों के आक्रमण से बचाना है। बाबा साहेब डा० अम्बेडकर के अनुयायियों का यह परम पुनीत कर्तव्य है कि वे इस महान संस्कृति को इसके उत्तराधिकारी के रूप में इस विशाल भूमि पर पुनः प्रतिष्ठित करें।
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बौद्ध दष्टि में अस्तित्व की अवधारणा और उसका सामाजिक सन्दर्भ
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– डा. जगन्नाथ उपाध्याय
सम्पूर्ण भारतीय दर्शनों के बीच बौद्धों की अस्तित्व सम्बन्धी अबधारणा मौलिक रूप से अत्यन्त भिन्न रही है। परम्परा के अनुसार अस्तित्व का जड या चेतन में विभाजन करें तो उनका किसी भी अवसर में कालिक या दैशिक स्थिरता या दीर्घता नहीं मिलती। अस्तिता या चेतन वह पदार्थ-बिन्दु है, जिसकी परिभाषा मात्र प्रयोजन-निष्पत्ति है। प्रयोजन-निष्पत्ति वस्तु की असाधारणता को स्पष्ट करती है। अस्तित्व का महत्व विशेष ही होता है सामान्य नहीं। प्रतीतिगत सामान्य का अस्तित्व असाधारणता के अर्थ में स्वीकार नहीं किया जाता । अस्तित्व की असाधारणता का अधिक स्पष्टीकरण उनमें गभित नास्तित्व से होता है। 'उत्पत्ति के अनन्तर विनाश' यह बाह्य और अन्तर पदार्थों की नियति है। इन दोनों के बीच अन्तर सिर्फ इतना ही है कि अस्तित्व प्रयत्न-साध्य होता है जबकि नास्तित्व के लिए अतिरिक्त प्रयत्न नहीं करना पड़ता। अस्तित्व सकारण और नास्तित्व अकारण' का सिद्धांत बौद्धों की अस्तित्व सम्बन्धी सारवत्ता को खड़ा करता है। इस तरह सभी प्रकार के अस्तित्व अपने नास्तित्व से सम्पूटित रहते हैं। उत्पत्ति के साथ ही विनाश की यह जानवार्यता बस्तित्व,देशिक और कालिक विस्तार या देध्यं की संभावना माप्त कर दता है। यह ध्यान देने की बात है कि उत्पत्ति और विनाश के बीच कहीं भी स्थिरता के लिए अवकाश नहीं है । अस्तित्व का बार प्राकलन सामान्यगत प्रवाह के रूप में ही संभव है, जिसमें सादृश्य-बोध का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इस प्रकार जब स्थिरता के लिए किसी प्रकार की गुजाश नहीं है तो वस्तुगत नित्यता की बात करना तो अस्तित्व को नहीं समझना है । ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता एक ही अस्तित्वनिन्ट के त्रिघा विभाजन या विश्लेषण हैं। इसका अनुभव ही वास्तविक अस्तित्व-बोध है। प्रातीतिक स्तर इससे भिन्न है। अस्तित्वानभव की सूक्ष्मता इससे अधिक स्पष्ट होती है कि भाषा सीधे अस्तित्व को विषय नहीं बना पाती, अन्यव्यावृत्ति के द्वारा वस्तु की व्यावहारिक प्रतीति करा पाती है । संक्षेप में, यही अस्तित्व की वस्तुगत एवं प्रातीतिक अवधारणा है ।
प्रयोजन की निष्पत्ति का सिद्धांत कार्यकारण के सिद्धांत से अतिमा रूप में सम्बद्ध है । जैसे प्रयोजन-निष्पत्ति अनित्यता पर आधारित है वो ही कार्यकारण भाव की व्यवस्था भी। अनित्यता की दष्टि से कार्य और कारण के बीच भी कोई अन्तर नहीं है । जैसे कार्य अपने कारणों से उत्पन्न और अनित्य है, वैसे ही कारण भी अपने कारणों से उत्पन्न और स्वयं में अनित्य है । 'कार्य से पूर्व होना' मात्र कारणता है । कारण स्वयं अनित्य रहकर ही अनित्य कार्य को उत्पन्न कर सकते हैं। जैसे कार्य का किंचित्मात्र अस्तित्व कारण में नहीं होता, वैसे ही कारण भी किंचित मात्र कार्य में अनुस्यूत नहीं होते । इस प्रकार कारणता एक संकेत मात्र है । उससे एक ओर कार्य को अस्तित्व मिलता है दूसरी ओर किसी कार्य या घटना की आकस्मिकता या रहस्यमयता खण्डित होता है। कर्ता भी कारणों में से ही एक है, अतः उसका अस्तित्व भी अन्य की तरह ही अनित्यता से कवलित है । किसी भी दशा में किसी घटना के घटकों में से कोई भी एक अशतः या पूर्णतः अनित्यता एवं परिवर्तन से अस्पृष्ट या तटस्थ नहीं रह सकता। वास्तव मे कर्ता, कर्म, करण आदि किसी एक घटना के विश्लेषण का प्रयास करते हैं।
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प्रयोजन-निष्पत्ति के द्वारा जिस अस्तित्व-बिन्दु को समझने की यहाँ चेष्टा की गई है, इसे अधिक स्पष्ट करने के लिए इस प्रश्न का उत्तर देना चाहिए कि क्या अस्तित्व की कोई अपनी आत्मा, केन्द्र अवयवी या स्वभाव होता है ? स्थिरता एवं नित्यता के अर्थ में आत्मा या स्वभाव आदि से सम्बन्धित यदि प्रश्न है, तो उसका बौद्ध सम्मत उत्तर 'नहीं' में होगा । इसके भिन्न अभिप्राय से किये गये प्रश्न के मोटे रूप में दो उत्तर होंगे । एक वस्तुवादी दार्शनिकों द्वारा अनित्य सद्-बिन्दू के रूप में, दूसरा शून्यवादी दार्शनिकों द्वारा सर्वथाअनात्म, निःस्वभाव एवं अस्वीकार के रूप में। इन दो परस्पर विरोधी उत्तरों में भी अस्तित्व की प्रयोजननिष्पत्ति बाधित नहीं होती। अस्तित्व के सम्बन्ध में ये दोनों निष्कर्ष कार्यकारण सिद्धान्त 'प्रतीत्य समुत्पाद' से ही प्रतिफलित होते हैं। दोनों के दर्शन भिन्न हैं अतः जीवनादर्श भी भिन्न हैं, किन्तु अस्तित्व की अवधारणा बहुत कुछ समान है। एक सत्ता-आधारित अस्तित्व है और दूसरा अनस्तित्वाधारित अस्तित्व है। जहां तक अस्तित्व की अवधारणा की सुसंगति और उसके व्यापक आयाम का प्रश्न है उसमें प्रथम (सत्ताधारित) पक्ष से द्वित्तीय (असत्ताधारित) पक्ष अधिक महत्वपूर्ण है। इन दोनों की स्थितियों में जो अन्तर है, वह आगे स्पष्ट होगा।
उपर्युक्त विवेचन से इतना तो स्पष्ट है कि अस्तित्व के संदर्भ में गतिहीनता या नित्यता के लिए किसी प्रकार की भी गुजाइश नहीं है। इसलिए आत्मवादी ईश्वरवादियों से बौद्धों की अस्तित्व-धारणा नितान्त भिन्न है। किन्तु इसका ध्यान रखना होगा कि बौद्धों द्वारा शाश्वतवाद का विरोध उन्हें उच्छेदवादी नहीं बना देता। उच्छेदवाद का पर्यवसान जीवन की निरन्तरता को अस्वीकार करने में होता है, जबकि बौद्ध जीवन को गतिमय प्रवाह में देखते हैं । शाश्वत एवं उच्छेददृष्टियों से प्रतिफलित जीवन-मूल्य प्रायः समान होते हैं, जबकि बौद्धों का मध्यम-मार्ग इन दोनों का निषेध है । यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो जीवन और दर्शन के प्रत्येक स्तर पर शाश्वतवादी एवं उच्छेदवादी प्रवृत्तियों का विभाजन करती है। और उनका वर्जन कर नये जीवन मूल्यों की स्थापना के लिए अवसर देती है । मध्यम-मार्ग एक सम्यक् दृष्टि और सम्यक-जीवन है, जो प्रत्येक नय सन्दर्भो में मिथ्या दृष्टियों का प्रहाण करता है।
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मानव के सन्दर्भ में अस्तित्व की अवधारणा में एक ऐसे विशप व्यक्तित्व का संयोजन होता है, जो स्वयं में न तो नित्य एवं रहस्य और न उनके संयोजन में अनित्य बाह्य शक्तियों के हस्तक्षेप की गुंजाइश है। मानव व्यक्तित्व में एक ओर जड और चेतन सहवर्ती रूप में रहत है। दूसरी ओर चेतना और उसके सभी व्यापार एवं प्रवृत्तियां सहयुक्त एवं आत्योन्याश्रित रहती है। जड़ से चेतन या चेतन से जड़ का प्रश्न यहां नहीं है और न तो चेतना और उसके व्यापारों के बीच परस्पर में आश्रयआश्रयी-भाव है। मनुष्य को अपने जीवन के साथ ही कुछ प्राकृतिक साधन एवं कुछ सहज एषणाएं प्राप्त हैं, जो उसके व्यक्तित्व के विभिन्न अंग हैं। प्राप्त साधनों के प्रयोग के बीच उसके विवेक का स्वातंत्र्य विकसित होता है। उसमें अनेक ज्ञात प्रवृत्तियों के साथ कुछ अज्ञात तत्व भी रहते हैं। अज्ञात अंश भी उपार्जित हैं, जो अविज्ञापित रहकर उसके पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करते रहते हैं । इस जीवन-सातत्य में बौद्धों का कर्म सिद्धांत बहुत ही महत्वपूर्ण है जो पूर्व से पर के जीवन को जोड़ता है। कर्म मल में एक चेतना है जो मानव व्यापार के रूप में खड़ा होता है। कार्य-वाक आदि अन्य सभी व्यापारों का वही प्रेरक है। सम्पूर्ण कर्म चेतना के रूप में व्यक्तित्व से अभिन्नता प्राप्त करते रहते हैं। सभी दशा में व्यक्ति की स्वतन्त्रता अक्षुण्ण रहती है। कुशल-अकुशल, उचित-अनुचित, पापपुण्य, नीति-अनीति के निर्धारण में तथा अन्य का निषेध कर अन्य के वरण में व्यक्ति स्वतन्त्र है। व्यक्तित्व की अनन्यता की पहचान उसकी स्वतन्त्रता है। व्यक्ति की अनन्यता उसकी स्वतन्त्रता है । यह ठीक है कि चित्त व्यक्ति का अपना है किन्तु वह अन्योऽन्यापेक्ष अनेकानेक कारणों से मिलकर निमित है। एक ऐसे बड़े परिवेश में उसका व्यक्तित्व खड़ा है कि जगत से विच्छिन्न कर उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। उस परिवेश के अन्तर्गत ही उसमें उत्तरदायित्व की चेतना भी खड़ी होती है। किन्तु बाहरी आरोपण या दबाव में न आकर उत्तरदायित्व की भावना को उत्तरोत्तर मूल्य प्रदान करना और उसे समाज में स्थापित करना व्यक्तित्व का शौर्य है । सतत गतिशील अस्तित्व के प्रवाह में अतिक्रमण की पूरी सम्भावना सुरक्षित है ।
व्यक्ति अपना विधाता स्वयं है, वह आत्म-दीप और अनन्य शरण है। उसमें अपना निरीक्षण करना और अपनी ही बौद्धिक प्रामाणिकता के आधार पर हेय और उपादेय का निर्णय लेना, सहज हो जाना चाहिए । ऐसे निर्णय की प्रामाणिकता का आधार होता है श्रेष्ठ प्रयोजन की निष्पत्ति, जो व्यक्तित्व के बौद्धिक अस्तित्व को अर्थवत्ता प्रदान करती है । इस प्रक्रिया में व्यक्ति को मूल्यात्मक उत्तमता के विकास का अवसर मिलता है। स्वगत हीनांश के विरोध में स्वयं ही प्रतिपक्ष खड़ा कर 'सम्यक' अस्तित्व का वरण करना, व्यक्ति का निरपेक्ष पुरुषार्थ है । कहना नहीं है कि व्यक्ति के अस्तित्व के अन्तर्गत ही है-उत्पत्ति-विनाश, सत्यप्रसत्य और निषेध-निर्माण । स्पष्ट होगा कि व्यक्तित्व का संकट और उसका निवारण उसके अस्तित्व का ही अंग है। एक ओर व्यक्ति ने मिथ्या धारणाओं के आधार पर एषणाओं को बढ़ाया है और उसकी तप्ति में राग-द्वेषादि से प्रेरित सम्बन्धों को खड़ा किया है। तो दूसरी ओर यथाभूत सत्य के आकलन के आधार पर एक ऐसा मार्ग भी रखा है, जिससे वह अपनी मिथ्या रचनाओं का अतिक्रमण कर सके ।
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वास्तव में अस्तित्व 'जो है' उतना मात्र है, किन्तु 'जो था', 'जो होना है उन्हें भी वह अपने स्व में रखता है । इस प्रकार का स्वत्व-बोध परत्व के प्रसंग में ही संभव है। इस प्रकार व्यक्ति का दूसरों से सम्बन्ध उसके व्यक्तित्व का अंग बन जाता है। व्यक्ति का अन्य व्यक्ति या समाज से सम्बन्ध किस प्रकार का होगा, यह निर्भर करता है, अस्तित्व सम्बन्धी उनकी अवधारणा पर । बौद्ध-दृष्टि में तृष्णा वह विभाजक रेखा है, जिसके आधार पर श्रेष्ठता या हीनता का निर्णय लिया जा सकता है। तृष्णा दृष्टि है और व्यवस्था भी है। तृष्णा की मूल वे मिथ्या-दृष्टियां हैं, जो व्यक्तित्व को अयथार्थ बना देती हैं। व्यक्ति के साथ अपनी और अपने परिवेश की अभिलाषाएं और आकांक्षाएं सापेक्ष समूह के रूप में जुटी हुई हैं। उसके साथ व्यक्ति का जितना और जैसा आग्रह एवं तृष्णा लगी रहेगी, उसी के अनुपात में स्व-पर के बीच परिग्रह और द्वेषादि से प्रेरित उसके सम्बन्ध खड़े होंगे।
व्यक्ति की स्वतन्त्रता के प्रसंग में व्यक्तित्व के परिष्कार की बात ऊपर कही गई है। उसके बावजूद क्या किसी ऐसे जीवनास्तित्व का कल्पना की जा सकती है जिसमें जगत के साथ स्वापेक्षी सम्बन्धी जगह नये प्रकार के सम्बन्धों को खडा किया जा सके ? बौद्ध दाट उत्तर में यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति जैसे अपने श्रेष्ठ एव जान णिक अस्तित्व को जानकर हीन आकांक्षाओं और अभिलाषाओं के स्थूल बन्धनों का अतिक्रमण कर सकता है, वैसे ही उन सारे आधारों को भी | तोड़ सकता है, जिन पर उसके व्यक्तित्व की सारी इमारत खड़ी है। यह एक प्रकार का व्यक्तित्व-विलोप है, जो व्यक्ति का परम पुरुषार्थ है। इस पर यह शंका व्यक्त की जा सकती है कि क्या यह व्यक्तित्व की विशेषता है, तो इसके लिए क्या व्यक्ति प्रवृत्त हो सकता है ? उत्तर है कि यह तष्णा की विशेषता है, और तृष्ण-हीन व्यक्तित्व की कल्पना की जा सकती है।
प्रश्न है कि अस्तित्व ग्रह जब स्वयं में एक तृष्णा है, तो क्या उसका अतिक्रमण करना स्व-स्कन्धारोहण के समान असम्भव नहीं होगा? असम्भव नहीं होगा, क्योंकि व्यक्तित्व का कुशल-अकुशल दोनों ही पक्ष व्यक्ति की स्व-निर्मित हैं। कुशल के द्वारा अकुशल का अपनयन, श्रेष्ठ तृष्णा से हीन तृष्णा का अपनयन है, पुनः आधारभूत तृष्णा को निःशेष करना, जिससे आगे चलकर इस प्रकार के नैतिक द्वन्द्वों की समस्या व्यक्ति या समाज में खड़ी न हो, इसकी पूरी सम्भावना है। इस अवस्था में कारणों का केवल अपनयन मात्र नहीं होता, प्रत्युत उनका सर्वथा अभाव हो जाता है । बौद्ध-दृष्टि में यह निर्वाण-प्राप्त जीवन की अवस्था है । यह आधारभूत व्यक्तित्व का मूलभूत परावृत्ति है या परिवर्तन है, या निषेधारित नव-निर्माण है।
प्रश्न है कि ऐसे व्यक्ति के जीवन का भविष्य क्या है ? और उसके प्रयोजन का निर्धारण कौन करेगा? स्पष्ट है कि इन प्रश्नों का उत्तर व्यक्ति के अस्तित्व-परिवेश में ही प्राप्त होना चाहिए। ऊपर जो कुछ कहा गया है, उससे यह प्रतिफलित होता है कि सभी प्रकार के वैयक्तिक या सामाजिक अवमूल्यन का कारण तृष्णा है। तृष्णा स्वयं में मिथ्या दृष्टिकोण है, जिसके कारण जीव और जगत के प्रति अनेकानेक प्रकार के मिथ्या अध्यारोप खड़े होते हैं। ये अध्यारोप ही दुःख के स्रोत बने हैं, जिससे व्यक्ति और समाज के सम्बन्ध और उसकी सभी प्रकार की मान्यताए परिचालित हैं । इन सारे आरोपणों को हटाकर 'यथाभूत दर्शन' के द्वारा दुःख के सामूहिक कारणों को समाप्त करने की चेष्टा में सतत एवं सहज रूप से व्याप्त रहना एक आदर्श व्यक्तित्व का लक्षण है। दुःख एक व्यापक सत्य है, जिसने व्यक्ति एवं समाज के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित कर रखा है। उसका यथावत् संवेदन तृष्णा-परिचालित समाज में नहीं होता। इस व्यापक दुःखता के साक्षात्कार एवं संवेदन के साथ व्यक्ति के अस्तित्व का आनुगुण्य होना चाहिए, जो मिथ्या दृष्टियों और मिथ्या आचारों से घिरे तृष्णावान के लिए संभव नहीं है। इस व्यापक तृष्णा-व्यूह को तोड़ने वाले पुरुषार्थी की वेदना इतनी तीव्र होनी चाहिए कि उसके सामने दु:खता की समस्या व्यक्तिपरक नहीं रहे। ऐसा महापुरुष उस व्यवस्था या स्त्रोत को सुखा देने की चेष्टा करता है, जहां से दुःख पीड़ा प्रवाह चलता है। इस प्रकार की श्रेष्ठ संवेदना के साथ एक ऐसी व्यापक एवं सूक्ष्मदर्शी बौद्धिकता चाहिए, जो विश्लेषण से दुःख एवं पीड़ा के व्यापक कारणों को और उनके निवारण को भलीभांति जान सके। यह महान कार्य अविद्या, तृष्णा और उनसे प्रेरित आचरणों के अभ्यास को छोड़े बिना कदापि संभव नहीं है।
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अस्तित्व-बोध का यह नया धरातल है, जिसमें करुणा और प्रज्ञा की युगनद्धता या सहजता है। इससे अस्तित्व की नई अवधारणा खड़ी हो जाती हैं। इसे 'अनस्तित्वाधारित अस्तित्व' कह सकते हैं। यहां का मानस एक ऐसे श्रेष्ठ चित्त को धारण करता है, जिसे अचित्ताधारितचित्त' कह सकते हैं । इस परिवेश के व्यक्ति की अपने प्रति आत्म-दष्टि उन्मूलित है, इसलिए उसका मानस एवं व्यवहार स्व-केन्द्रित न होकर समस्या-केन्द्रित हो चुका है । इसके दोष उन्मूलित हो चुके हैं, रागद्वेषादि के उपद्रव शांत हैं अतः स्वयं में वह सुखी एवं शांत जीवन व्यतीत कर सकता था, किन्तु 'करुणा' के कारण एक ओर वह आर्त्त-जगत् छोड़ नहीं सकता और दूसरी ओर व्यापक एवं सूक्ष्मदर्शी प्रज्ञा के कारण जगत् में व्याप्त मिथ्या आचार-विचारों में फंस नहीं सकता। ऐसे व्यक्ति का जीवन पराधीन है। इस पराधीनता को उसने स्वयं वरण किया है । उसके व्यक्तित्व की अवधारणा को 'अनस्तित्वाधारित अस्तित्व' के रूप में समझा जा सकता है। अस्तित्व सम्बन्धी अवधारणाओं में मौलिक परिवर्तन के कारण करुणा का आलम्बन दुःखी व्यक्ति नहीं, प्रत्युत दुःख प्रवाह की दुःख व्यवस्था है। उस दुःख का संस्पर्श होने मात्र से व्यक्ति में करुणा का उदय होगा। अब मानवीय समस्या का स्वरूप अपने या
अपने आत्मीयजनों के अस्तित्व की रक्षा एवं सुख-सुविधा का नहीं रह गया है, अपितु 'सर्व' या 'बहुजन' की समस्या खड़ी हो गई है। इस महान उत्तरदायित्व के वहन के लिए इस आदर्श व्यक्ति ने दुःख में निमग्न जगत का आह्वान किया है। उसकी सारी चेष्टाएं सकारण नहीं सहज होंगी, ससीम नहीं निःसीम होंगी। उसे श्रेष्ठ व्यक्तित्व का स्वयं अन्दाज मिल चुका है । उस श्रेष्ठता का भी विसर्जन एवं वितरण अन्य सत्वों के लिए कर रहा है । यह प्रज्ञा एवं करुणा का महान प्रयोग है। समस्याओं के नये-नये सन्दर्भो में इसके नये-नये समाधान प्रस्तुत होंगे। यह एक बड़ी मानवीय योजना का महान प्रारम्भ है। यह परिवर्तन की वह गतिशील प्रक्रिया है, जिसमें धर्म, दर्शन, संस्कृति की प्रचलित आस्थाएं बदलेंगी। इसमें निषेध-निर्माण, सत्-असत्, विलासिता और दरिद्रता, राग-द्वेष के द्वन्द्व समाप्त होंगे।
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🎯165 | स्वामी विवेकानंद का काला इतिहास | Black History of Vivekanand Part1 | Science Journey
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https://www.youtube.com/watch?v=meSTmwR7hmY
🎯168 | स्वामी विवेकानंद के काले कारनामें Part2 | Black History of VivekaNand | Science Journey
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https://www.youtube.com/watch?v=YI8Rm8JjTPg
🎯170 | Black History of VivekaNand Part3 | बुद्ध ने ईश्वर और निर्वाण पर क्या कहा? | Science Journey
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https://www.youtube.com/watch?v=DnGzV_2Q0do
सम्यक संस्कृति के शब्द व भाव का अपहरण
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सम्यक संस्कृति के समय पालि भाषा का उपयोग होता था, जिस स हर शब्द का भावार्थ भी पालि शब्दकोश के अनुसार निकलता था। सम्यक संस्कृति में आज का कोई भी शब्द अदृश्य, अलौकिक और चमत्कार का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। आज के वैसे शब्द में अपनी विशिष्ठता और गुणवत्ता की वजह से गुणवाचक स्वरूप में जाने जाते थे, जिस वजह से वैसे सभी शब्दों का प्रयोग सम्यक संस्कृति के समय गुणवाचक संज्ञा द्वारा उपाधि के तौर पर प्रयोग होता था। लेकिन जैसे ही धूर्त भ्रमवंशियों ने सम्यक संस्कृति का रूपांतरण किया, वैसे ही सबसे पहले पूर्व की पालि भाषा को संस्कारित करते हुए एक नई भाषा ‘संस्कृत’ और पूर्व की धम्म लिपि को परिमार्जित करते हुए नागरी लिपि में रूपांतरित किया। जिस वजह से पूर्व के कुछ शब्दों का जहां उन्नत और गुणवत्तापूर्ण भावार्थ निकलता था, उससे अब चमत्कार युक्त अर्थ, अलौकिक शक्ति का अर्थ, अदृश्य शक्ति का अर्थ, जाति समूह का अर्थ निकलने लगा था। आज भ्रमवंशियों द्वारा सबसे ज्यादा इसी बात का फायदा उठाया जा रहा है।
सम्यक संस्कृति का पहला शब्द नाम-
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भगवान/भगवा
आज का 'भगवान' शब्द सम्यक संस्कृति के समय पालि भाषा में प्रयोग होने वाला 'भगवा' का संस्कारित स्वरूप है। पालि के अनेक अभिलेख में इस भगवां, भगवता, भगवतो को देखा जा सकता है।
सम्यक संस्कृति में भगवा का अर्थ (पालि) भग्ग रागो, भग्ग दोषो, भग्ग मोहो इतिपि सो भगवा कहा जाता था। यानी जब कोई भी व्यक्ति अपन अन्दर से समस्त राग (आसक्ति), द्वेष, मोह (मूढ़ता) को भग्न कर दिया छोड़ दिया, त्याग दिया या त्याग देता था. सिर्फ वैसे ही व्यक्ति को भगवा या आज की संस्कारित भाषा संस्कृत हिन्दी द्वारा भगवान कहा सम्यक संस्कृति में भगवान की गुणवाचक उपाधि को प्राप्त ही व्यक्ति का नाम मिलता है। जिसमें एक भगवान बुद्ध और दुसरे भगवान महावीर है। कयोंकि ये दोनों अपने अन्दर से राग, द्वेष और मूढ़ता को मिटा दिए थे। लेकिन
भ्रमवंशियों ने इस भगवान नाम का सम्बोधन किसी अदृश्य, अलौकिक, मोक्षदाता, मुक्तिदाता या चामत्कारिक व्यक्ति को करते हुए अपने द्वारा स्थापित भ्रमिक कथाओं के पात्रों को या आज के समय में चमत्कार दीखाने वाले पात्रों के संबोधन से करने लगे हैं, जो किसी भी दृष्टिकोण से पूर्व वाले गुणवाचक अर्थ का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।
“इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरण सम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिस-दम्म-सारथी सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा'ति।"
अर्थ- ऐसे ही तो है वे भगवान! अरहंत, सम्यक-सम्बुद्ध, विद्या तथा सदाचरण से सम्पन्न, उत्तम गति प्राप्त, समस्त लोकों के ज्ञाता, सर्वश्रेष्ठ, भटके लोगों को सही मार्ग पर ले आने वाले सारथी (पथ-भ्रष्ट घोड़ों की तरह), देवताओं और मनुष्यों के शास्ता (आचार्य) बुद्ध भगवान।
"स्वाक्खातो भगवता धम्मो सन्दिट्ठिको अकालिको एहिपस्सिको ओपनेयिको पच्चत्तं वेदितब्बो विञ्ञूही’ति।"
अर्थ-भगवान के द्वारा भली प्रकार आख्यात किया गया यह धर्म संदृष्टिक है काल्पनिक नहीं है, प्रत्यक्ष है, तत्काल फलदायक है, आओ और देखो (कहलाने योग्य है), निर्वाण तक ले जाने योग्य है, प्रत्येक समझदार व्यक्ति के साक्षात करने याग्य है।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स।
अर्थ-नमस्कार है उन अर्हत सम्यक सम्बुद्ध भगवान को।
इसी पालि के भगवा सम्बोधन से पालि व्याकरण के अनुसार भगवतो (भगवान के द्वारा), भगवतो (भगवान का), भगवता (भगवान में) सम्बोधन । जिसको आज भ्रमवंशियों ने संस्कारित भाषा द्वारा भगवान को भगवती को स्त्रिलिंग का प्रतिनिधित्व प्रदान कर दिया है।
इससे साफ पता चलता है कि सम्यक संस्कृति में भगवा (भगवान) संज्ञा के रूप में गुणवत्ता के आधार पर गुणवाचक उपाधि बनती थी, लेकिन यही गुणवाचक संज्ञा सम्यक अंत काल में नामवाचक संज्ञा बनकर किसी का नाम बनकर शोभा दे रही है। जिससे उस शब्द का पूरा भावार्थ ही बदल गया है ।
देव
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सम्यक संस्कृति का यह संबोधन अपने आप में काफी दिग्भ्रमित वाला है। आज इस नाम से भ्रमवंशियों के साथ-साथ भ्रमवंशियों द्वारा निर्मित भ्रम के पुलिंदे से काफी लोग उलझे हुए हैं। इसी देव से देवी और देवता का निर्माण हुआ है, जो आज भ्रमवंशी संस्कृति में एक अदृश्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। भ्रमवंशी संस्कृति का संस्थापक पुत्र आज इसी देव का प्रतिनिधि बनकर स्वयं भूदेव बन बैठा है और सभी भ्रमिक संस्कृति के अनुयायियों को देव के भरोसे बैठाकर आर्थिक व मानसिक दोहन कर रहा है।
सम्यक संस्कृति में दो सम्राट ऐसे हुए हैं जो अपने नाम की 'देवानाम पिय' और पालि भाषा में देवानड्ग पिय लिखते और उनका लिखा अभिलेख भी मिला है, जिसे आप लोग भी देख सकते हैं। इन दो नामों में एक नाम सम्राट अशोक का है तो दूसरा नाम सम्राट समुद्रगुप्त का है। इन दोनों सम्राटों के व्यवहार से उस समय के देव कहे जाने वाले लोग बहुत ज्यादा प्यार करते थे, इस वजह से ये दोनों सम्राट अपने नाम से ज्यादा देवानाम पिय से प्रसिद्ध थे। जिसके कारण ये दोनों सम्राट अभिलेख में 'देवानाम पिय' लिखते थे। लेकिन इस बात पर लोगों के दो मत हैं। एक मत के अनुयायी भ्रमवंशी हैं जिनका कहना है कि दोनों सम्राट अलौकिक शक्ति देव के प्रिय थे इसलिए उनको देवानाम लोग कहते थे या वे स्वयं लिखते थे। अब भला सम्यक संस्कृति में अलौकिक देव कहां से आ टपके, जिसके सम्राट अशोक और सम्राट समुद्रगुप्त अनुयायी बन गये? यह बिल्कुल ही अतार्किक बात है। वहीं कुछ दूसरे ऐसे भी मान्याताधारी लोग हैं जिनका कहना है कि ये दोनों सम्राट भगवान बुद्ध के प्रिय होने की वजह से अपने नाम की जगह पर देवानाम पिय लिखते थे। यह बात भी सटीक नहीं लग रही है। क्योंकि जो व्यक्ति उस समय जीवित नहीं है, उसका प्रिय कोई कैसे हो सकता है? जैसे कोई व्यक्ति का जन्म होता है और उस व्यक्ति के जन्म से पूर्व उसके दादा की मृत्यु हो जाती है। वह व्यक्ति अपने मृत हो गये दादा का प्रिय कैसे प्रिय तभी हो सकता है, जब उसको प्यार करने वाला जिंदा होगा, अन्यथा उसको प्यार कौन करेगा और जब प्यार नहीं करेगा तो फिर वह किसी का प्रिय कैसे कहलायेगा?
यहां भी दोनों सम्राटों से काफी वर्ष पूर्व ही भगवान गौतम बुद्ध का महापरिनिर्वाण हो गया था। इस तर्क से इन लोगों को भगवान गौतम बुद्ध कभी प्यार नहीं किये थे। यह बात भी तर्क की कसौटी पर सही नहीं बैठ रही है। जब ये लोग भगवान गौतम बुद्ध को प्यार करते थे तो इन दोनों सम्राटों को बुद्धपिय अशोक और बुद्धपिय समुद्रगुप्त लिखना चाहिए था, लेकिन ये लोग ऐसा लिखते थे। फिर क्या भगवान बुद्ध को देव कहा जाता था? नही! भगवान बुद्ध का ऐसा नाम कहीं नहीं मिला है। उल्टे भगवान गौतम बुद्ध को देवों का शास्ता (आचार्य) कहा जाता था।
बुद्ध वंदना-“इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरण सम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिस-दम्म-सारथी सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा’ति।"
यह जो बुद्ध वंदना देख रहे हैं उसमें भगवान गौतम बुद्ध को सभी देव और मनुष्य दोनों का शास्ता बताया गया है। इस बात से तो स्पष्ट हो जाता है कि देव कोई अलौकिक या स्वयं भगवान गौतम बुद्ध का प्रतिनिधित्व करने वाला शब्द नहीं है। यह जरूर ही उस समय भगवान गौतम बुद्ध जिनके शास्ता (आचार्य) होते थे, वैसे लोगों का देव नाम से संबोधन होने वाला शब्द है। अब देखना है कि भगवान गौतम बुद्ध का शिष्य मनुष्य के अलावा देव शिष्य कौन है, जिसको हम लोग जान नहीं पाए हैं? उसमें भी वह देव शिष्य भगवान गौतम बद्ध के बाद का स्थान लेता हो! तभी भी तो सम्राट उसके प्रिय होते थे। ऐसा एक ही नाम है जो संघ के अन्दर भिक्खु / भिक्खुनियां होती थीं। उनमें से कुछ अपनी साधना की वजह से ऊंची अवस्था प्राप्त कर अरहत बन जाते थे। इनके बारे में भगवान बुद्ध बोलते थे कि तुम लोग जिस दिशा में देसना (उपदेश) देने जा रहो हो तो समझो कि उस दिशा में भगवान बुद्ध स्वयं देशना देने जा रहे है। ये लोग भी भगवान को अपना शास्ता (आचार्य) ही मानते थे। ऐसे देसना देने वाले को ही देव कहा जाता था।
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सम्यक संस्कृति के समय एक राज्य विदिशा था जहां सांची स्तूप का साक्ष्य मिला है। उस विदिशा की राजधानी उस समय भरहुत थी। भरहुत सतना से 16 किलोमीटर दूर एक ग्रामीण क्षेत्र है। आज भरहुत की खुदाई से बहुत ही बड़ी मात्रा में बौद्ध अवशेष मिले हैं। वहां से पुष्यमित्र शुंग का किला होने के भी साक्ष्य मिले हैं। वह क्षेत्र मध्य प्रदेश में आता है। उसी विदिशा में एक नगर का नाम देवास मिला है, तो एक का नाम देव कोठार (देउरकोठार) मिला है। इस देव कोठार में पच्चाय ज्यादा स्तूप होने का साक्ष्य मिला है, जो आज भी खड़ा है। यह देव कोठार पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर अवस्थित है। इसी देव कोठार की पहाडी के नीचे देवास नाम का गांव भी है।
देव कोठार में जो कोठार शब्द है, यह आज का संस्कारित भाषा का शब्द है, जिसको पालि में या आज भी गांवों की प्रचलित भाषा में कोठा कहते है। यह कोठा शब्द का प्रयोग मकान के सबसे ऊपरी छत या जगह कहते हैं। यह कोठा शब्द का प्रयोग मकान के सबसे ऊपरी को कहते हैं। देव कोठार में भी निर्मित स्तूपों का परिसर पहाड़ी भाग के सबसे ऊपरी ऊंचाई पर स्थित है। यह तीन ओर से खाई से घिरा हुआ बहुत ही रमणीक स्थान है। उस देव कोठार की पहाड़ी सतह पर स्वाभाविक रूप से कुछ कन्दरा बने हैं, जिसमें सामूहिक रूप से बैठकर साधना करने का साक्ष मिलता है। यहां जो स्तप मिला है उसमें एक स्तूप बहुत विशाल है और बाकी सभी स्तूपों की संरचना एक समान है। अब आप लोगों को पता ही होगा कि सामान्य भिक्खु लोगों का स्तूप नहीं मिला है। स्तूप जो भी बना था, वह अरहत प्राप्त भिक्खु और भिक्खुनियों का बनता था। ये सभी देशना देने वाले अरहत भिक्खु या भिक्खुनियों के स्तूप है। इसी वजह से इस स्थान को देव लोगों का कोठा या घर (देव कोठार) कहते हैं। पाली भाषा के इसी कोठा से कोठी और कोठरी बना है। जिस वजह से आज बहुत से क्षेत्रों में बने बड़े घर को कोठी बोलते हैं और बहुत से क्षेत्रों में घर के अन्दर बने कमरा (रूम) को कोठरी कहते हैं। कहीं-कहीं जो अनाज रखने हेतु मिट्टी से बने गोलाकार आकार के घर को भी अनाज की कोठी कहा जाता है।
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सम्यक संस्कृति में असाढ़ पूर्णिमा के बाद जब वर्षावास प्रारम्भ होता था, तो बद्ध संघ के अन्दर धम्म देशना देने वाले भिक्खु-संघ के लोग पहाड़ों की कन्दराओं में चले जाते थे और अपनी धम्म देशना को साधना के माध्यम से और ज्यादा तीक्ष्ण करते थे, ताकि वर्षावास के बाद ज्यादा प्रभावी तरीके से गृहस्थ लोगों को धम्म देशना दे पाएं। ऐसा ही एक बहुत विशाल स्थल पहाड़ों के ऊपर कंदराओं में है जिसका नाम “देव कोठार" है। वर्षावास खत्म होने के बाद सभी लोग धम्म देशना देने पहाड़ों और कन्दराओं से निकलकर गृहस्थों के बीच में नीचे चले आते थे। जिस वजह से इनके नीचे रहने वाले स्थानों को देव का वास यानी देवास से लोग संज्ञा से संबोधन करते थे और उन देव के जलाशयों को लोग देव तालाब के नाम से जानते थे। आज ऐसे कई देवास और देव तालाब देखने का मिलेंगे। इसी देव से देव अरिओ या देव अरिहंत का अपभ्रंश आज का देवरिया (उ.प्र.) स्थापित है।
धम्म प्रिय उपाधि प्राप्त सम्राट अशोक और सम्राट समुद्रगुप्त धम्म वाले अरहत भिक्खु (देव) का प्रिय होने की वजह से ही लोग उन्हेंदेसना देने वाले देवों के प्रिय कहते थे, इसलिए इन दोनों का नाम ‘देवानामप्रिय' (देवानड्ग पिय) प्रचलित था।
बुद्ध वंन्दना से भी स्पष्ट हो गया कि भगवान बुद्ध देव और मनुष्य दोनों के शास्ता हैं।
इससे साफ पता चलता है कि सम्यक संस्कृति में देव (देवता) शब्द गुणवाचक संज्ञा के रूप में गुणवत्ता के आधार पर देसना देने वाले भिक्खुओं का गुणवाचक उपाधि बनता था, लेकिन यही गुणवाचक संज्ञा सम्यक काल के अंत में नामवाचक संज्ञा बनकर किसी का नाम बनकर शोभा दे रही है। जिससे उस शब्द का पुरा भावार्थ ही बदल गया है।
ईश्वर / इसिवर
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'ईश्वर' शब्द आज की संस्कारित भाषा संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ अलौकिक, सर्वशक्तिमान, सृष्टि का संचालक जैसे कर्ता भाव से जाना जाता है। लेकिन यही ईश्वर जब संस्कारित भाषा से पूर्व सम्यक संस्कृति वाली पालि भाषा का शब्द बनता था, तो इस शब्द का स्वरूप 'इसिवर' हो जाता था। जिसका अर्थ अलौकिक, सर्वशक्तिमान, अदृश्य नहीं होकर सदृश्य व्यक्तियों की एक गुणवाचक उपाधि बन जाता था। परन्तु आज उसी शब्द की शल्य क्रिया करते हुए अलौकिक, सर्वशक्तिमान, सृष्टि का संचालक जैसे न जाने कौन कौन-सा चामत्कारिक संबोधन कर प्रत्यारोपण (Implant) करते हुए भ्रम का पुलिंदा बनाकर खूब प्रचार किया गया है।
मानव सभ्यता की शुरुआत से ही मानव जीवन के विकास क्रम हेतु कुछ विशिष्ठ लोगों के शोध का काफी अहम योग्यदान रहा है, जो सम्यक संस्कृति के ज्ञात और पठनीय संस्कृति में खूब फला-फूला था। वैसे महान लोग मानव के दैनिक जीवन की जीवकोपार्जन से लेकर हर प्रकार के कुदरतन प्राप्त वस्तुओं के रहस्यों की एचना करते थे, पर्वेचना करते थे, लाभ-हानि की विवेचना करते थे, गुण-दोष की तुलना करते थे। ऐसे विवेचना करन वाले विशिष्ठ लोगों में दो प्रकार के लोग होते थे। एक वैसे लोग होते थे जो मनुष्य के बाहरी (भौतिक) जीवन की आवश्यकतों की खोज करते थे तो वहीं दूसरी ओर ऐसे भी लोग होते थे जो मनुष्य की अंदरूनी (चैतसिक) जरूरत की खोज करते थे। बाहरी जरूरत सम्पूर्ण भौतिक आवश्यकता का स्वरूप था तो अन्दरूनी जरूरत सम्पूर्ण चैतसिक आवश्यकता का स्वरूप था। चैतसिक स्वरूप मनुष्य का राग, द्वेष और मूढ़ता (मन की शुद्धि) शुद्ध करता था, इसी वजह से ऐसे शोधकर्ता, खोजकर्ता को मुनि कहा जाता था। जिसमें भगवान बद्ध और भगवान महावीर जैसे को क्रमशः शाक्य मुनि जाता था। आदर से ऐसे लोगों को मुनिवर भी कहा जाता था। दूसरी ओर मानव जीवन के बाहर की भौतिक आवश्यकता के खोजकर्ता, शोधकर्ता को ऋषि कहा जाता था। लेकिन उस ऋषि में जो ऋ वर्ण है वह धम्म लिपि (ब्राह्मी लिपि) के वर्णमाला में नहीं होने के कारण उसका उच्चारण ‘इ’ से किया जाता था। इसलिए सम्यक संस्कृति के समय ऋषि का संबोधन इसि से होता था। आज भी बोल-चाल में ऋषि और मुनि दो नामों का उपयोग होता है। लेकिन इस इसि के अंत में वर जुड़ा हुआ है, जिस वजह से यह इसिवर बन गया। अब देखना है कि यह वर क्या है?
दरअसल 'वर' शब्द का प्रयोग सम्यक संस्कृति में काफी होता था। उस या शब्द का अर्थ श्रेष्ठ होता था। जैसे बुद्ध वन्दना का एक वाक्य है-
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॥ नत्थि मे सरणं अञ्ज, बुद्धो मे सरणं वरं ॥
हिन्दी अनुवाद-मेरा अन्य कोई शरण नहीं है, केवल बुद्ध ही मेरा श्रेष्ठ शरण है।
॥ यो सन्निसिनो वरं बोधिमूले, मारं ससेनं महतिं विजेत्वा ॥
हिन्दी अनुवाद-जिन्होंने श्रेष्ठ बोधिवृक्ष के नीचे बैठ कर, महती सेना सहित मार को पराजित कर सम्बोधी प्राप्त की।
सम्यक संस्कृति के समय वर का प्रयोग तो आप लोगों ने देख ही लिया कि यह जहां भी प्रयोग हुआ है वहां इसका अर्थ आज की संस्कारित भाषा द्वारा श्रेष्ठ ही हुआ है। इसी वजह से उस समय सभी वैसे आदरसूचक नामा के अंत में वर का उपयोग होता था। फलस्वरूप इसि और मुनि जस लोगों को आदरसूचक संबोधन के साथ पालि भाषा में 'इसिवर' और ‘मुनिवर' कहा जाता था।
सम्यक संस्कृति के सदृश्य सामंती संस्कृति में भी बहुत सारे आदर सूचक पदनाम हैं जिसके संबोधन के समय हम सभी लोग अंत में वर को जोड देते है। ताकि उनकी श्रेष्ठता बनी रहे, उनका सम्मान बना रहे, उनका आदर होता रहे। ऐसे प्रयोग का पदनाम मान्यवर, गुरुवर, पूज्यवर।
सम्यक संस्कृति के काल में सारनाथ उत्तर भारत का एक प्रमुख स्थान था, जहां लोग कदरत के रीत की एचना करने, प्रवेचना करने, विवेचना और शोध करने जाते थे, जिस वजह से उस स्थान का नाम ‘इसि पत्तन’ पड़ गया था। यहां 'इसि' आर ‘पत्तन' दो शब्द हैं। जिस स्थान महता जिस कार्य के लिए या जिस खास व्यक्ति के लिए उपयोग हो, आगे उस स्थान का नाम उसी से ज्यादा प्रसिद्ध हो जाता है। यहां की भूमि इसि लोगों का पसन्दीदा स्थान था इसलिए इस स्थल का नाम इसि से प्रमुख बन गया। इस इसिपत्तन नाम की चर्चा भगवान बुद्ध के वचनों या बौद्धिक ग्रंथों में भी है। जैसे-एकं समयं भगवा बाराणसियं विहरति इसिपत्तने मिगदाये।
दूसरा नाम पत्तन यानी जलमार्ग के किनारे वाला वह स्थान जहां नाव या जहाज को खड़ा करके उतार-चढ़ाव का कार्य किया जाता हो। उसे पालि भाषा में पत्तन कहते हैं, ऐसे यह पत्तन नाम का संबोधन आज भी यथावत है और वैसे ही कुछ स्थानों को संबोधित किया जाता है जो जलमार्ग के किनारे वाले स्थान हैं। जैसे विशाखा पत्तन, मुरगांव पत्तन। ऐसे सम्यक संस्कृति के पत्तन (Port) रहे बहुत से स्थानों का नाम आज बदल गया है। यह इसि नाम का स्थान भी गंगा नदी के तट पर बसा हुआ है, जहां इसि लोग जलमार्ग का उतार चढ़ाव करते हुए नदी किनारे घने जंगल वाले स्थान पर साधना करने जाते थे। इसी वजह से उस नदी किनारे घने जंगल स्थान को इसिपत्तन कहते थे, जिसे आज सारनाथ कहते हैं। यही वह क्षेत्र है जहां इसि लोग जाकर कुदरत के सभी गुण स्वभाव का शोध करत थे। इस जगह पर भगवान बुद्ध (नाथ) ने प्रथम धम्मचकप्पवत्तन करते हुए पच वग्गीय भिक्खुओं को सार दिया था। नाथ ने पांच भिक्खुओं को सार दिया इस वजह से इसिपत्तन स्थान के नाम का बाद में रूपांतरण होकर इसका नाम सारनाथ हो गया।
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इससे साफ पता चलता है कि सम्यक संस्कृति में इसिवर (ईश्वर) शब्द गुणवाचक संज्ञा के रूप में गुणवत्ता के आधार पर गुणवाचक उपाधि बनता था, लेकिन यही गुणवाचक संज्ञा सम्यक अंत काल में नामवाचक संज्ञा बनकर किसी का नाम बनकर शोभा दे रही है। जिससे उस शब्द का पूरा भावार्थ ही बदल गया है।
इन सब बातों से स्पष्ट हो जाता है कि सम्यक संस्कृति में इसि (ईश्वर) शब्द का प्रयोग किसी अदृश्य, अलौकिक, सर्वशक्तिमान जैसी संज्ञा के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य के बाहरी (भौतिक) जीवन की आवश्यकताओं को बेहतर बनाने हेतु निरंतर खोज करने वाले वैज्ञानिक (इसि) को कहा जाता था। जिन्हें लोग आदर के साथ इसिवर कहकर संबोधित करते थे।
'सनातन’
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'सनातन' यह शब्द आज लोगों को काफी दिग्भ्रमित कर रहा है, आइए जा सनातन क्या है या सनातन कहते किसे हैं!
आज के समय में तथाकथित कुछ लोग भ्रमवंशी धूतों द्वारा प्र हिन्दू समुदाय को समय समय पर हिन्दू से अलग उसका एक नाम देते रहते हैं। क्योंकि इसके पीछे उनकी भी मजबूरा लोग अपने समुदाय का जो भी नामकरण करते हैं, उस न ग्रंथों द्वारा इतनी टीका टिप्पणी होने लगती है, कि भ्रमव प्रत्यारोपित समुदाय का नाम हमेशा बदलना पड़ता है। नया सम्बोधन सनातन शब्द से किया है।
फिर यह सनातन शब्द क्या है?
वस्तुतः भारत की सम्यक संस्कति के समृद्ध व उत्ट भारत में 'धर्म' प्रकृति के गुण, स्वभाव व नियम (Law of nature) को कहते थे। जिसकी वजह से गुण, स्वभाव व कुदरत के नियम को सष्टि के आदि से अंत तक को बोला जाता था। यानी भारत की समृद्धशाली भाषा में उसे 'एस धम्मो सनंतनो' कहा जाता था, यानी यह कदरत का गुण, स्वभाव, धर्म सनातन है, जो कभी खत्म नहीं होगा। यानी पहला तो धर्म गुणवाचक है और दूसरा उस गुणवाचक धर्म की विशेषता है, कि वह आदि और अनंत है। लेकिन इसी गुण और गुण की विशेषता है की बोधित करने वाले शब्द को जब संज्ञा बना देंगे तो वह उत्पन्न होना और नष्ट होने का स्वरूप धारण कर लेगा। आज उसी का परिणाम है कि पुर्व कालीन कुदरती गुण, स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने वाले 'धर्म' की जगह पर आज के नए विकसित सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले धर्म को भ्रमवंशियों ने प्रत्यारोपित कर दिया है इसलिए कभी-कभी हिन्दू के जगह पर सनातन भी बताने लगते हैं। ये दोनों ही सर्वथा अनुचित ही नहीं, बल्कि अप्रासंगिक है।
सनातन का अर्थ होता है जिसका आदि और अंत नहीं हो, जो शाश्वत हो, जो निरंतर रहे। ऐसे सभी गुण, धर्म, स्वभाव जिसका आदि और अंत नहीं हो, उसे सनातन धर्म कहते हैं।
जैसे-कोई मनुष्य जब गुस्सा करता है तो उसका मन व्याकुल हो जाता है। यहां मन का व्याकुल होना ही उसके मन का गुण-धर्म, स्वभाव है, जो मानव के उद्भव से लेकर मानव जीवन के अन्त तक रहने वाला यहा जो मन का गुण-धर्म, स्वभाव है वही सनातन है। अब कोई आज मनुष्य गुस्सा करे या पाषाण काल का मनुष्य गुस्सा करे, या आने वाले काल का मनुष्य गुस्सा करे, गुस्सा के बाद उसे व्याकुल होना ही पडेगा। उसी प्रकार पृथ्वी का घूमना, सूर्य द्वारा रोशनी व ऊष्मा देना, चंद्रमा शीतलता प्रदान करना, इन सभी का जो गुण-धर्म, स्वभाव
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आदि और अनंत है। वह कभी खत्म नहीं होगा। इसी वजह से वैसे भाव को सनातन धर्म कहा जाता है। इसे किसी सम्प्रदाय (आज का धर्म जो संप्रदाय का पर्यावाची बना है) से जोड़ना एक मूर्खता ही कहा जा सकता है। क्योंकि कोई भी संप्रदाय आदि व अनंत नहीं होता है। अनुसार सभी सम्प्रदायों का परिवर्तन होना निश्चित है यानी आज का हिन्दू सम्प्रदाय भी परिवर्तनशील है। जबकि कुदरत का गुण, स्वभाव, नियम अपरिवर्तनशील है।
ऐसा करने के पीछे भ्रमवंशी समुदाय की एक मजबूरी है कि इसने अपने जन्म काल के बाद से ही अपने द्वारा निर्मित अनेक संप्रदाय को एकीकृत कोई एक नाम कभी दे नहीं पाया है। आज भी भ्रमवंशी समुदाय के अन्दर विभिन्न मतों का जमावड़ा है, जिसमें सभी का दर्शन अलग है सभी के ललाट पर चन्दन टीका के निशान अलग-अलग हैं, सभी के ग्रंथ अलग-अलग हैं, सभी के आराधना स्थल अलग-अलग हैं, सब लोग ज किसी मजबूरी बस किसी प्रायोजन में एक जगह इकट्ठे होते हैं तो सभी की मतभिन्नता जगजाहिर हो जाती है और यह मतभिन्नता कभी-कभी इतनी बढ जाती है कि आपस में झगड़ा फसाद का बड़ा रूप ले लेती है (कंभ मेला)।
ऐसे इस शैव सम्प्रदाय और वैष्णव सम्प्रदाय के झगड़ा फसाद पर कृष्ण झा और धीरेन्द्र कुमार झा द्वारा लिखित पुस्तक 'अयोध्या की वह स्याह रात' जिसका अंग्रेजी संस्करण हार्पर कालिन्स पब्लिशर्स इंडिया लिमिटेड और हिन्दी संस्करण फालकोण फालकोण से प्रकाशित है, जिसमें पेज नम्बर 169-170 पर लेखक लिखते हैं कि रामानंदी सम्प्रदाय वैष्णव संप्रदाय के कई पंथों में एक पंथ है। इसमें विष्णु के विभिन्न अवतारों की पूजा होती है। रामानंद का जन्म तेरहवीं शताब्दी में इलाहाबाद में हुआ था। इस रामानदा पंथ में साधु और नागाओं की सबसे बड़ी फौज पायी जाती है। प्रतीत होता है कि रामानंदियों ने अपनी सैन्य संरचना शैवों से सुरक्षा बनाई थी। आगे लिखते हैं कि आदिशंकर द्वारा स्थापित शैव सम्प्रदाय लोगों ने अपने विस्तार हेतु सात प्रमुख शैव अखाड़ों का निमाण किया था जिसे दशनामी सम्प्रदाय कहा जाता था। दशनामी अखाड़ा भगवान शिव की पूजा करते हैं और आदि शंकर को अपना गुरु मानते हैं। उसी प्रकार रामानंदी के नागा सैनिक भगवान राम की पूजा करते है और रामानंद को अपना गुरु मानते हैं। रामानंदी के लोग तुलसीदास द्वारा लिखित रामचरित मानस को अपना प्रमख ग्रंथ मानते हैं।(आखाडा उसे कहते है जहां शस्त्रधारी लड़ाकू नागा साधु निवास करते हों।)
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वे आगे लिखते हैं कि दशनामी अखाड़ों का गठन सम्यक संस्कृति में स्थापित बुद्ध विहार, संघाराम, बौद्ध मठ, सम्यक शिक्षण संस्थान, जैन मठ के साथ-साथ सामंतवाद के समय बनी वैष्णव या अन्य संप्रदाय के बने मठ मंदिरों के ऊपर जबरन कब्जा जमाने के लिए किया जाता था। इसी वजह से रामानंदी अखाड़ा दशनामी अखाड़ों से बचने के लिए बनाया गया था।
इसी कारण दशनामी अखाड़ा और रामानन्दी अखाड़ा के बीच आपस में हत्या प्रतिहत्या के कई प्रमाण मिलते हैं। 1690 ईस्वी में नासिक के सिंहस्थ नामी अखाड़ा के नागा साधु और रामानंदी अखाड़ा के नागा साधुओं के बीच भारी नरसंहार हुआ था। उसी प्रकार 1760 ईस्वी में हरिद्वार स्नान में इन दोनों के बीच खूनी लड़ाई हुई थी जिसमें दोनों ओर कई हजार नागा साधुओं की मौत हुई थी। प्रयाग का तो कहना ही नहीं है यहां पर दशनामी और रामानंदी अखाड़ा के बीच प्रत्येक कुम्भ मेला में दोनों ओर से शस्त्रों का प्रदर्शन होता है। इसी वजह से दशनामी अखाडा का एक नागा, जिसका नाम भैरव गिरी गोस्वामी था, उसने यह प्रण कर रखा था कि प्रत्येक दिन कम-से-कम एक वैष्णव नागा की हत्या नहीं कर दूं तब तक भोजन नहीं करूंगा। भैरव गिरी नागा के इस हिंसात्मक कार्य को देखते हुए रामानन्दी अखाड़ा का एक नागा, जिसका नाम रामदास था, ने भी प्रतिज्ञा की कि मैं भी जब तक एक दशनामी अखाड़ा के नागा की हत्या नहीं कर लूंगा तब तक मैं भी भोजन नहीं करूंगा।
भ्रमवंशियों द्वारा स्थापित सम्प्रदाय की यही कहानी रही है और इसका जन्मकाल तो आप लोग देख ही लिए कि यह नौवीं शताब्दी के बाद पैदा हुआ और आजादी पूर्व काल तक विभिन्न नामों से बट कर मौजूद था। जात-इनके धार्मिक ग्रंथ और अंग्रेजी काल की जनगणना को देख सकते हैं।
धर्म / धम्म
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सर्वप्रथम धर्म या धम्म शब्द की प्रथम जानकारी भारत की ज्ञात 530 वर्ष पूर्व में हुई थी। इस ज्ञात सभ्यता से पूर्व की रही सभ्यता-संस्कृति धर्म/धम्म की जगह पर किस भाषा में किस शब्द प्रयोग होता था, इस बात की पक्की जानकारी आज तक किसी को नहीं है। इसके बारें में आज जो भी लोग कुछ कहते हैं या लिखते हैं, वह सारा कलम कसाईयों का कपोल-कल्पित कल्पना द्वारा निर्मित भ्रम का पुलिंदा है। ज्ञात काळ में भगवान गौतम बुद्ध ने पहली बार अपना ज्ञान प्राप्ति के बाद इस शब्द को धम्म चक्क पवत्तन (धर्म चक्र प्रवर्तन) के रूप में प्रयोग करते हुए स्थापित किया था। उस समय भगवान गौतम बुद्ध के भी धम्म/धर्म का अभिप्राय “धारेती'ति धम्मो” से था। अब धारण क्या करेगा, तो अत्तनो सभावं, अत्तनो लक्खनं, धारेती'ति धम्मो। यानी इस साल अंदर जो भी है, वह अपने अंदर, अपने स्वभाव से, अपने लक्षण से जो कुछ भी धारण करता है, वह उसका धम्म/धर्म है या उसे ही धम्म/धर्म कहते हैं। यही धम्म/धर्म मनुष्य के अंदर विराजित राग और द्वेष के रूप में गुण स्वभाव, लक्षण का पर्यायवाची माना जाता था। यह गुण सधम्म के रूप में सदगुण का प्रतिनिधित्व करता था तो वहीं यह गुण अधम्म के रूप में अवगुण का प्रतिनिधित्व करता था। इसी सद्गुण और अवगुण वाली राग का चक्र और सद्गुण और अवगुण वाली द्वेष के चक्र से मनुष्य के मुक्ति का मार्ग धम्म चक्क पवत्तन है। इस गुणकारी धम्म/धर्म शब्द का इसके पूर्व लिखित साक्ष्य या अविष्कार भी नहीं हुआ था।
वस्तुतः धर्म और धम्म के लिखावट में सिर्फ भाषा-लिपि का अन्तर है। सम्यक संस्कृति के समय मौजूद पालि भाषा-लिपि में 'र' का संयुक्त प्रयोग नहीं होने की वजह से उस समय इसका लेखन धम्म होता था, जो आज की संस्कारित भाषा में र का संयुक्त प्रयोग होने की वजह से अब यह धर्म लिखा जाता है। इसी 'धर्म' के ज्ञान पर सम्यक काल के समय भारत 1500 वर्ष तक विश्वगुरु था। जिसमें अनेक विश्व विख्यात विश्वविद्यालय थे। जहां देश-विदेश के लोग धर्म को समझने आते थे। वह कोई बौद्ध धम्म नहीं, बल्कि कुदरत का गुण, धर्म, स्वभाव यानी कुदरत के कानून (Law of Nature) को समझने आते थे। प्रकृति के अंदर अपना गुण, होता है, लोग उसे ही धर्म कहते थे। जैसे आग का जलना धर्म है, बर्फ का शीतल होना धर्म है, गुस्सा होने पर व्याकुल होना धर्म है। अब कोई आग है और वह आग जले ही नही, बर्फ हो और वह शीतल हो ही नहीं, कोई गुस्सा हो और वह व्यक्ति व्याकुल हो ही नहीं तो समझो सबका गुण-धर्म, स्वभाव खत्म है। ये सभी नकली गुण-धर्म, स्वभाव वाले है। यही तो गुण, स्वभाव और प्रकृति की रीत है जिसे धर्म कहते है।
धम्म और धर्म में कोई अंतर नहीं है, अंतर तो सम्यक काल और सम्यक अंत काल (सामंत काल) में इसके प्रयोग और भावार्थ का है। दोनों काल में इसका उपयोग अलग-अलग भावार्थ के साथ हुआ है। यही सबसे बड़ा अन्तर है। जैसे सम्यक काल में धम्म/धर्म का प्रयोग कुदरत के कानून, कुदरत के गुण, स्वभाव (Law of Nature) के सम्बोधन के लिए किया जाता था तो सम्यक अंत के काल में इस धर्म/ धम्म का प्रयोग भ्रमिक वंश द्वारा प्रत्यारोपित (Implant) भ्रम का पुलिंदा के लिए होने लगा। यह भ्रमवादी धर्म सम्प्रदाय, पंथ, मजहब, रिलीजन का पर्यायवाची है जिसको भ्रमिक लोगों के कलम कसाइयों ने धर्म/धम्म का पर्यायवाची खडा कर दिया है। भ्रमवादियों द्वारा प्रत्यारोपित संप्रदाय कुदरत का कानून नहीं है। प्रकृति की रीत नहीं है, स्वभाव नहीं है। इसी वजह से आज का धर्म किसी भी दृष्टिकोण से पूर्व के धर्म का पर्यायवाची नहीं है। सम्यक काल का धम्म/धर्म गुण-स्वभाव कुदरत का प्रतिनिधित्व करने के कारण सभी का होता था जिस वजह से उस समय जितने भी विदेशी शासक आये, सभी सम्यक काल के धर्म में समाहित हो गये, लेकिन भ्रमवंशियों द्वारा स्थापित धर्म एक खास समूह वर्ग का होने के कारण इसके समय में जितने भी विदेशी शासक यहां आये, कोई भी इनके संप्रदाय में समाहित नहीं हुआ। क्योंकि
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सम्प्रदाय (संस्कारित शब्द) एक दर्शन है जो एक खास समाज विशेष का होता है, लेकिन धर्म सभी का होता है।
रिलीजन (अंग्रेजी शब्द) एक दर्शन है जो एक खास रीजन विशेष का होता है, लेकिन धर्म सभी का होता है।
मजहब (फारसी शब्द) एक दर्शन है जो एक खास मजलिस (सभा) व का होता है, लेकिन धर्म सभी का होता है।
पंथ (पाली शब्द) एक दर्शन है जो एक साथ रहने वाले खास पथिक विशेष का होता है, लेकिन धर्म सभी का होता है।
लेकिन इस कलम कसाई को देखिए कि सम्यक काल वाले शुद्ध धर्म की जगह पर, सम्यक अंत काल वाले एक समुदाय विशेष द्वारा किया जाने वाला कर्मकाण्ड (सम्प्रदाय, मजहब, पंथ. रिलीजन) को ही धर्म का पर्यावाची बनाते हुए भ्रम का पुलिंदा के रूप में प्रत्यारोपित (Implant) कर दिया।
अध्यात्म
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भारत लगभग 1500 वर्षों तक धर्म व अध्यात्म (धम्म व अज्झत्त) का विद्याध्ययन करने कराने का बहुत बड़ा केन्द्र था, जिसकी। से इसे विश्वगुरु का दर्जा भी प्राप्त था। धर्म और अध्यात्म का पूरे विश्व में सबसे बड़ा विश्वविख्यात विद्याध्ययन केंद्र 'नालन्दा विश्वविद्यालय’ जिसमें धर्म और अध्यात्म का ज्ञान दिया जाता था।
इस धर्म व अध्यात्म में धर्म की व्याख्या आप लोगों ने देखी, परंतु अध्यात्म क्या है और भ्रमिक लोग इसे क्या कहते हैं, इस पर भी गौर करे।
भारत की सम्यक संस्कृति में जिस प्रकार लोगों के कर्मकांड से अलग चेतन और अवचेतन वाले गुण, स्वभाव, नियम को ही 'धर्म' कहते थे, उसी प्रकार 'अध्यात्म' की भी अलग व्याख्या थी।
आइए जानते हैं अध्यात्म को.............
सम्यक काल के समय प्रयोग होने वाला शब्द अज्झत्त को संस्कारित करने के बाद ही भ्रमवंशियों ने अध्यात्म बनाया। पालि में अज्झत (अज्झ+अत्त) का अर्थ अपने भीतर यानी अत्त का अर्थ अपना और अझ का अर्थ अंदर होता है। यानी कि अध्यात्म का सम्पूर्ण अर्थ हुआ कि अपने शरीर के अंदर उस पूरी चैतसिक क्रिया को जानना, समझना और उसे अपना कर अपने शरीर की हर गतिविधि को समझना। यह शरीर जब किसी पर गुस्सा करता है तो व्याकुल क्यों होता है! यह शरीर जब किसी पर प्रसन्न होता है तो प्रफुल्लित क्यों होता है! यह शरीर जब दुखी होता है तो बैचेन क्यों होता है! यह शरीर जब सुखी होता है तो अमन-चैन से क्यों रहता है। इन्हीं सब प्रश्नों को जानने की विधि को अध्यात्म कहते है।
लेकिन भारत की दुर्दशा नौंवी शताब्दी के बाद से उदित भ्रमिकों ने शुरु कर दी। प्रत्येक शब्दों को अपहृत करते हुए उसके भावार्थ को ही बदलना शुरू कर दिया था। भ्रमिक लोग पूर्व कालीन अध्यात्म में आत्मा और परमात्मा का समावेश करते हुए, इस प्रकार के पुस्तक करने वाले को आध्यात्मिक बोलने लगे तथा आत्मा या कर्मकाण्ड पर अधिक बल देने वाले को सब लगे। भ्रमिकों का भ्रम का पुलिंदा भी अलबेला है।
“सरस्वती या सुरसती"
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भारत सम्यक काल की जितनी भी शब्दावली थी, उसका प्रयोग व समय की भाषा (पालि) के अनुसार काफी उत्कृष्ट व ज्ञानवर्धक होता था। लेकिन भारत में सम्यक काल जैसे-जैसे निरंतर आगे बढ़ता गया, से सम्यक पालि भाषा का संस्कार (संस्कृत बनते) होते हुए, भाषा अविकास कहें या विनाश कहें, होता गया। प्रत्येक वर्ष फागुन महीना में पंचमी आती है, उस दिन लोग स्वरसती नाम (अपभ्रंश सरस्वती) की देवी की स्थापना करते हैं और बड़े ही धूम-धाम से उसकी पूजा करते हैं। लोगों की ऐसी मान्यता है कि स्वरसती नाम की देवी की पूजा करने से विद्या बढ़ती है या जिसके पास विद्या नहीं है उसे विद्या प्राप्त हो जाती है।
लेकिन सम्यक संस्कृति में विद्या अध्ययन कराने वाले शिक्षण संस्थानों के अनेक साक्ष्य मिले हैं। जिनमें ऐसी या किसी भी प्रकार की सरस्वती देवी से संबंधित कोई साक्ष्य लिखित रूप से या मूर्ति के रूप में प्राप्त नहीं हुआ है। फिर आज की मान्यता ऐसी कैसे बन गयी?
दरअसल यहां के लोग भ्रमवंशियों द्वारा प्रत्यारोपित (Implant) भ्रम का पुलिंदा वाली व्यवस्था के चंगुल में इतना फंस गये हैं कि उनके द्वारा बताई गई कथा कहानियों से बाहर निकलकर कुछ सोचना ही नहीं चाहते है। आइए इस 'सरस्वती' शब्द को समझें कि इस शब्द का उद्भव कहा व कैसे होते हुए आज लोगों के पास पहुंचा है।
पालि भाषा में एक शब्द है सती जिसका अर्थ होता है सजग। इसको उदाहरण से समझें। सम्यक संस्कति में आष्टांगिक मार्ग के अंदर एक मार्ग का नाम है 'सम्यक सती'। इसमें जो 'सती' शब्द है उस 'सती' का अर्थ पालि में ‘सजग रहना' होता है।
दूसरा, सम्यक काल में जो पालि भाषा और धम्म लिपि थी। वर्णमाला में सुर होते थे जिसे आज संस्कारित भाषा में स्वर कहते है। किसी भी भाषा में सुर का महत्त्व बहुत ज्यादा होता है। चाहे वह मनुष्य की भाषा हो या जानवर की ही भाषा क्यों न हो। यह ‘सुर’ जन्म से ही प्रत्येक प्राणी जगत को प्रकृति प्रदत्त प्राप्त होता है, जिस वजह से इसका उपयोग पृथ्वीलोक में जन्म से सभी प्राणी जगत करता है।
जैसे अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ।
यह प्रकृति प्रदत्त 'सुर' जब 'सती' के साथ काम करता है तभी यह व्यंजन का रूप लेता है, अन्यथा यह सुर बेसुरे स्वरूप में ही यथावत बरकरार रहेगा। इसी को सम्यक काल में 'सुरो का सती' कहते थे। आज भी कई लोग कहते हैं कि यह सुरो का सरताज है।
इसी ‘सुर' और 'सती' को जब संस्कारित भाषा (स्वर और सती) में एक साथ लिखेंगे तो यह 'स्वरसती' का रूप ले लेगा।
लेकिन दुर्भाग्य!
यह सम्यक काल की उत्कृष्ट अभ्यास वाली प्रणाली को भ्रमवंशी कलम कसाई ने कर्मकांड के रूप में विकृत करते हुए भ्रम का पुलिंदा बनते हुए जीवकोपार्जन हेतु प्रत्यारोपित (Implant) कर दिया है।
पितृ पक्ष और दुर्गा पूजा
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(पितु पक्ख और मातु पक्ख)
अश्विन (पालि में अस्सयुज-असोज्ज) महीना का कृष्ण पक्ष (कण्ह पक्ख) में 'पितृपक्ष' (पितु पक्ख) और दूसरा शुक्ल पक्ष (सित पक्ख) 'दुर्गासाधना पक्ष' के रूप में मनाने वाली परंपरा की सच्चाई हेतु भारत में स्थापित सम्यक संस्कृति (बौद्धिक संस्कृति) को समझना होगा। क्योंकि आज का जितनी भी विकृतिपूर्ण कुरीति या परंपरा दिखती हैं, वह सब उसी सम्यक संस्कृति के आर्य-थेर संघ और आर्य महासांघिक संघ से निकले वज्रयान के घुसपैठिये हैं, जो आगे अपने-अपने नाम से नये-नये विकृतिपूर्ण संप्रदाय को बनाते हुए बंगाल की खाड़ी (ब्राह्मणी संस्कृति) में मिला है।
आज का काल्पनिक पितृ पक्ष और दुर्गा पूजा जैसी आडंबर पाखंड से परिपूर्ण कुरीति कर्मकांड की वास्तविकता को समझने हेतु सम्यक संस्कृति में संघ होता था। उस संघ में देसना देणे वाले (देवगण) जितने भी अरहत भिक्खु होते थे, वे वर्ष के 9 महीने गृहस्थों (Layman) के बीच ज्ञान की देशना (Teachings) देते थे और 3 महीना वर्षावास (सावन, भादो, अश्विन) करते थे। जिसमें भिक्खु और भिक्खुनी दोनों अपने ज्ञान को मजबूत करने हेतु, साधना (Practice of Insight meditation) करते थे। इसी वजह से आज की प्रचलित मान्यता अनुसार वर्षावास के समय सभी देवगण को अनुपस्थित रहने की वजह से शुभ कार्य बंद रहता है।
वर्षावास का अंतिम महीना अश्विन होता है। इस महीने के बाद सभी अहंत भिक्खु और भिक्खुनी (देवगण) को देशना (ज्ञान देना) देने हेतु गृहस्थों के बीच जाना निश्चित होता है।
इस वजह से भिक्खु और भिक्खुनी को अपनी प्राप्त ज्ञान साधना की जांच होती है।
यह जांच साधना-विधि द्वारा की जाती है। जिसमें अश्विन महीना का पहला कृष्णपक्ष (कण्ह पक्ख) में पुरुष भिक्खुओं की साधना जांच होती है।
इस वजह से इस पक्ख (पक्ष) का नाम 'पितु साधना पक्ख' से जाना जाता था, जो आज विकृत होते हुए पितु साध पख से 'पितृ श्राद्ध पक्ष' बन गया है या किसी साजिश के तहत किसी धूर्त ने भ्रम का पुलिंदा बनाते हुए इसे जीवकोपार्जन का साधन बना लिया है।
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वहीं अश्विन महीने के दूसरे पक्ख में महिला भिक्खुनी की साधना जांच होती थी।
पिटक के अनुसार महिला भिक्खुनी का नियम पुरुष भिक्खुओं से बहुत कठिन होता था, जिस वजह से महिला साधु (भिक्खुनी) की जांच साधना का नाम ‘दुग्गम मातु साधना पख' से जाना जाता था। यह नाम आग वित मातु साधना से संस्कारित होते हुए 'दुर्गम मातु साधना पक्ष’ द्वारा आज 'दुर्गा माता साधना पक्ष' बन गया है और भ्रम का पुलिंदा बनते हुए शाक्त पंथ का हिस्सा बनकर रह गया है। ऐसे ही एक जानकारी और प्राप्त कर लें कि यह दुर्गा साधना की प्रथा वज्रयान से निकली शाक्त पंथ में थी, जिस वजह से आज यह परम्परा सिर्फ शाक्त पंथी क्षेत्रों में ही मिलेगी। यह अलग बात है कि आज 25-30 वर्षों से हर ब्राह्मणी कर्मकांड का वैश्वीकरण होने की वजह से सारा कर्मकाण्ड का थोड़ा बहुत स्वरूप हर जगह मिल जाता है। लेकिन दुर्गा पूजा का जो स्वरूप आपको उत्तर-पूर्वी भारत (पाल वंश का क्षेत्र) में मिलेगा, वैसा स्वरूप कहीं नहीं मिलेगा। क्योंकि यह पूर्व काल में शाक्त पंथ बहुलता का क्षेत्र हुआ करता था।
यह दोनों अश्विन के पहले कृष्ण पक्ष और दूसरे शुक्ल पक्ष में होता है।
इसके बाद भिक्खु-संघ के लोग देशना देने हेतु, गृहस्थों के बीच निकल जाते हैं, जिस वजह से पुनः 9 महीना शुभ-कार्य इन सभी (भिक्खु-संघ) के द्वारा सम्पन्न होने लगता है। लेकिन यही पितु पक्ख और मातु पक्ख को कलम कसाइयों द्वारा भ्रम का पुलिंदा के तौर पर पितृ पक्ष और दुर्गा माता पक्ष बना दिया गया है।
महात्मा बुद्ध के आस्तिक होने से संबंधित अगला प्रश्न यह है कि क्या वह अनीश्वरवादी अर्थात ईश्वर में विश्वास न रखने वाले थे? इसका समाधान करते हुए पं. धर्मदेव जी लिखते हैं कि नास्तिक शब्द का एक प्रचलित अर्थ ईश्वर की सत्ता से इन्कार करनेवाले का है। क्या महात्मा बुद्ध ईश्वर की सत्ता से इन्कार करनेवाले थे इस विषय में अपने विचार संक्षेप से माननीय डा. अम्बेदकर जी से बात-चीत के प्रसंग में (संदर्भः सार्वदेशिक जुलाई 1951 अंक) प्रकट कर चुका हूं। इस विषय पर कुछ अधिक प्रकाश डालने से पूर्व मैं ‘सन्त सुधा’ के सम्पादक श्री ईश्वरदत्त मेधार्थी अणुभिक्षु बुद्धपुरी कानपुर के लेख से कुछ उद्धरण देना उचित समझता हूं। ‘सन्त सुधा’ के बुद्ध जयन्ती अंक में ‘सन्त सिद्धार्थ’ शीर्षक से महत्वपूर्ण अपने लेख में श्री मेधार्थी ने लिखा है कि ब्रह्म के विषय में भगवान बुद्ध स्वयं कहते हैं—“ब्रह्मभूतो अतितुलो मारसेन प्पमद्दनो। सब्वा मित्ते बसीकत्वा, मोदामि अकुतोभयो।।“ अर्थात् –मैं अब ब्रह्म पद को प्राप्त हुआ हूं, मेरी तुलना अब किसी से नहीं है, मैंने मार (कामदेव) की सेना को मर्दित कर दिया है। अब मैं काम, क्रोध आदि सब अन्तः शत्रुओं को वश में करके निर्भय होकर मस्त हो रहा हूं। विद्वान लेखक पं. धर्मदेव इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि यह एक ही वचन भगवान बुद्ध की आस्तिकता और ब्रह्मपद प्राप्ति के लिये पर्याप्त है। जरा-सी समझने की बात है कि जो स्वयं ब्रह्मविहार करता हो, ब्रह्मचारी हो, ब्रह्मभूत हो (यह सम्भव ही नहीं है कि) वह ब्रह्म को न माने? वास्तव में बौद्ध साहित्य में निर्वाण, ब्रह्म, अमृतपद, परमसुख, उत्तम अर्थ, अनाष्यात, दुलर्भनाथा आदि शब्द एकार्थवाचक हैं
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जिज्ञासुओं को भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये। भगवान बुद्ध ने स्वयं कहा है–जो नास्तिक हैं उन्हें विनाशोन्मुख समझो। एक बात है–भगवान् बुद्ध आस्तिक तो थे ही, आर्य भी थे। आर्य शब्द से उन्हें बड़ा प्रेम था। चार आर्य सत्य, आर्य, अष्टांगिक मार्ग और आर्यश्रावक तो बहुत प्रसिद्ध हैं। आर्य शब्द गुणवाची है। आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ। इसलिये श्रेष्ठता, उच्चता, और उत्तमता की भावना के लिये ‘आर्य शब्द’ भगवान बुद्ध ने प्रयोग किया है। इसीलिये बुद्धपरी में आस्तिकता और अहिंसकता की श्रेष्ठ भावना को पुष्ट करने के लिये ‘आर्य बौद्ध’ शब्द का प्रचार किया जाता है। भगवान बुद्ध ने भी धम्मपद में स्वयं कहा है–’न तेन अरियो होति, येन पाणानि हिंसति। अहिंसा सबपाणानं, अरियोति पवुच्चति।।‘ (धम्मपद श्लोक 270, धम्मट्ठवग्गो 15) अर्थात् प्राणियों का हनन कर कोई आर्य नहीं होता, सभी प्राणियों की हिंसा न करने से उसे आर्य कहा जाता है। (सत्नसुधा कानपुर बुद्ध जयन्ती अंक मई 1950 पृष्ठ 10-11)। लेखक महोदय कहते हैं कि आचार्य मेधार्थीजी का उपर्युक्त लेख महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने बौद्ध ग्रन्थों का विशेष अनुशीलन करके उसे लिखा है और वे अपने को आर्य बौद्ध नाम से ही कहते हैं। पत्रिका सन्त-सुधा के मई 1950 अंक में आर्य बौद्ध संघ बुद्धपुरी के कुलगुरू श्री ज्ञानक्षेत्रजी की एक सूक्ति भी प्रस्तुत की गई है। यह सूक्ति है ”You will find so many Bhikshoos coming here (in Buddha Puri). They are the enemies of Om; but you will never leave Om, every thing is in Om, Lord Buddha is also in Om.” अर्थात् यहां बुद्धपुरी में आप कई भिक्षुओं को आते हुए पाते हैं जो ओम् (परमात्मा) के शत्रु या विरोधी हैं किन्तु आपको ओम् का परित्याग कभी नहीं करना चाहिये। सब कुछ ओम् में है। बुद्ध भगवान् भी ओम् में हैं।
महात्मा बुद्ध को उनके अनुयायी ईश्वर में विश्वास न रखने वाला नास्तिक मानते हैं। इस सम्बन्ध में आर्यजगत के एक महान विद्वान पं. धर्मदेव विद्यामार्तण्ड अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘बौद्धमत एवं वैदिक धर्म” में लिखते हैं कि आजकल जो लोग अपने को बौद्धमत का अनुयायी कहते हैं उनमें बहुसंख्या ऐसे लोगों की है जो ईश्वर और आत्मा की सत्ता से इन्कार करते हैं तथा वेदों की निन्दा करते हैं। माननीय डा. भीमराव अम्बेदकर भी जिस बौद्धमत के प्रचार के लिए प्रयत्नशील थे उसमें भी बौद्धमत का ऐसा ही नास्तिक स्वरूप माना जाता है, किन्तु बौद्ध ग्रन्थों के निष्पक्ष अनुशीलन करने पर वह (पं. धमदेव विद्यामार्तण्ड) इस परिणाम पर पहुंचें हैं कि महात्मा बुद्ध ईश्वर की सत्ता से सर्वथा इनकार करनेवाले और वेदों की निन्दा करने वाले न थे, प्रत्युत आस्तिक थे। एक बड़ी कठिनाई महात्मा बुद्ध के यथार्थ विचार जानने में यह है कि उन्होंने स्वयं कोई ग्रन्थ नहीं लिखा। अब दीघनिकाय, मज्झिनिकाय, विनयम पिटक आदि जो भी ग्रन्थ महात्मा बुद्ध के नाम से पाये जाते हैं उनका संकलन उनके निर्वाण की कई शताब्दियों के पश्चात् किया गया जिनमें से बहुत-सी उक्तियां किंवदन्ती के ही रूप में हैं।
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नास्तिक कौन होता है? इस प्रश्न को उठाकर उसका समाधान करते हुए आर्यविद्वान पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि अष्टाध्यायी के ‘अस्ति नास्ति दिष्टं मतिं’ इस सुप्रसिद्ध सूत्र के अनुसार जो परलोक और पुनर्जन्म आदि के अस्तित्व को स्वीकार करता है वह आस्तिक है और जो इन्हें नहीं मानता वह नास्तिक कहाता है। महात्मा बुद्ध परलोक और पुनर्जन्म को मानते थे इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। इसलिये उन्हें सिद्ध करने के लिए अनेक प्रमाण देना अनावश्यक है। प्रथम प्रमाण के रूप में धम्मपद के जरावग्गो श्लोक (संख्या 153) ‘अनेक जाति संसारं, सन्धाविस्सं अनिन्विस। गृहकारकं गवेस्संतो दुक्खा जाति पुनप्पुनं।।’ में महात्मा बुद्ध ने कहा है कि अनेक जन्मों तक मैं संसार में लगातार भटकता रहा। गृह निर्माण करनेवाले की खोज में। बार-बार जन्म दुःखमय हुआ। श्लोक का यह अर्थ महाबोधि सभा, सारनाथ-बनारस द्वारा प्रकाशित श्री अवध किशोर नारायण द्वारा अनुदित धम्मपद के अनुसार है। दूसरा प्रमाण ब्रह्मजाल सुत्त का है जहां महात्मा बुद्ध ने अपने 2 या 4 नहीं अपित लाखों जन्मों के चित्तसमाधि आदि के द्वारा स्मरण का वर्णन किया है। वहां उन्होंने कहा है–भिक्षुओं ! कोई भिक्षु संयम, वीर्य, अध्यवसाय, अप्रमाद और स्थिर चित्त से उस प्रकार की चित्त समाधि को प्राप्त करता है जिस समाधि को प्राप्त चित्त में अनेक प्रकार के जैसे कि एक सौ, हजार, लाख, अनेक लाख पूर्वजन्मों की स्मृति हो जाती है–‘‘मै। इस नाम का, इस गोत्र का, इस रंग का, इस आहार का, इस प्रकार के सुखों और दुःखों का अनुभव करनेवाला और इतनी आयु तक जीनेवाला था। सो मैं वहां मरकर वहां उत्पन्न हुआ। वहां भी मैं इस नाम का था। सो मैं वहां मरकर यहां उत्पन्न हुआ।” इत्यादि। अगला तीसरा प्रमाण धम्मपद के उपर्युक्त वर्णित श्लोक का अगला श्लोक है जिसमें गृहकारक के रूप में आत्मा का निर्देश किया गया है। श्लोक है- ‘गह कारक दिट्ठोऽसि पुन गेहं न काहसि। सब्वा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसंखितं। विसंखारगतं चित्तं तण्हर्निं खयमज्झागा।।’ इस श्लोक के अनुवाद में इसका अर्थ दिया गया है कि हे गृह के निर्माण करनेवाले ! मैंने तुम्हें देख लिया है, तुम फिर घर नहीं बना सकते। तुम्हारी कड़ियां सब टूट गईं, गृह का शिखर गिर गया। चित्त संस्कार रहित हो गया, तृष्णाओं का क्षय हो गया। इस पर टिप्पणी करते हुए पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि यह मुक्ति अथवा निर्वाण के योग्य अवस्था का वर्णन है। जब तक ऐसी अवस्था नहीं हो जाती तब तक जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है। इस प्रकार यह सर्वथा स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध परलोक, पुनर्जन्म आदि में विश्वास करने के कारण आस्तिक थे।
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कई लोग विशेषतः भारत के नवबौद्ध ऐसा कहते नहीं थकते की गौतम बुद्ध सनातन धर्म और सनातन धर्म के पौराणिक ग्रंथो के विरोधी थे, पर वस्तुतः ये पूरी तरह से गलत है , दुष्प्रचार है। सत्य तो ये है गौतम बुद्ध वेद और वेदो में निहित ज्ञान विज्ञान के बड़े प्रशंशक थे और उनकी दृष्टि में वेद ज्ञान के भंडार है।
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इस सत्य की पुष्टि अनेक बौद्ध साहित्य और बौद्ध ग्रंथो से होती है।
आइये आज हम इसी विषय पर चर्चा करते है और जानते है की विभिन्न बौद्ध ग्रंथो में भगवन बुद्ध ने वेद के बारे में क्या विचार प्रकट किये थे।
इस तथ्य को समझने के लिए हमने विभिन्न बौद्ध साहित्य और बौद्ध धार्मिक ग्रंथो का अध्ययन किया है और ये लेख उसी शोध के आधार पर लिखा है
1) सुत्त निपात बौद्ध दर्शन का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जिसके सभिय सुत्त में महात्मा बुद्ध ने एक वेदज्ञ ( वेद को जाननेवाला ) के लक्षण को बताया है जो इस प्रकार है
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वेदानि विचेग्य केवलानि समणानं यानि पर अत्थि ब्राह्मणानं।
सब्बा वेदनासु वीतरागो सब्बं वेदमनिच्च वेदगू सो।।
(सुत्त निपात 529)
इस सूक्त में बुद्ध बताते है जिसने सब वेदो और कैवल्य वा मोक्ष-विधायक उपनिषदो का अध्ययन कर लिया है और जो सब वेदनाओ से वीतराग होकर सबको अनित्य जानता है वही वेदज्ञ है ।
2) एक प्रश्न आता है कि किन गुणोँ को प्राप्त करके मनुष्य श्रोत्रिय होता है?
बुद्ध इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार देते है
"सुत्वा सब्ब धम्मं अभिञ्ञाय लोके सावज्जानवज्जं यदत्थि किँचि।
अभिभुं अकथं कथिँ विमुत्त अनिघंसब्बधिम् आहु 'सोत्तियोति"।।
बुद्ध बताते है की " जितने भी निन्दित और अनिन्दित धर्म है उन सबको सुनकर और जानकर जो मनुष्य उनपर विजय प्राप्त करके निश्शंक, विमुक्त, और सर्वथा निर्दुख हो जाता है, उसे श्रोत्रिय कहते है "।
यहाँ ध्यान देने की बात है की संस्कृत भाषा में श्रोत्रिय शब्द का प्रयोग ' श्रोत्रियछश्न् दोऽधीते ' वेद पढ़नेवाले के लिए किया जाता है जो अष्टाध्यायी के सूत्र के अनुसार सही है।
3) मनुस्मृति में महर्षि मनु गायत्री मन्त्र को सावित्री मन्त्र के नाम से भी पुकारते हैं जिसका कारण ये है कि परमेश्वर को 'सविता' के नाम से स्मरण किया गया है।
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"ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् , भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् " । ।
गायत्री मन्त्र का भावार्थ - उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें । वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
महात्मा बुद्ध गायत्री मंत्र के बड़े प्रशंशक थे जो सुत्तनिपात महावग्ग सेलसुत्त के इस श्लोक से स्पष्ट होता है।
"अग्गिहुत्तमुखा यज्ञाः सावित्री छन्दसो मुखम्"।
छन्दो मे सावित्री छन्द (गायत्री मंत्र) प्रधान है तथा इससे अग्रिहोत्र ( विषयक श्रद्धा ) का भी आभास मिलता है।
4) बौद्ध धर्म ग्रन्थ सुत्तनिपात के एक श्लोक 322 मे महात्मा बुद्ध कहते है -
एवं पि यो वेदगू भावितत्तो, बहुस्सुतो होति अवेध धम्मो।
सोखो परे निज्झपये पजानं सोतावधानूपनिसूपपत्रे।।
इस श्लोक में बुद्ध कहते है " जो वेद जाननेवाला है, जिसने अपने को सधा रखा है, जो बहुश्रुत है और धर्म का निश्चय पूर्वक जाननेवाला है वह निश्चय से स्वयं ज्ञान बनकर अन्योँ को जो श्रोता सीखने के अधिकारी है ज्ञान दे सकता है। "
5) बौद्ध ग्रन्थ सुन्दरिक भारद्वाज सुत्त में एक रोचक कथा आती है जिसमे सुन्दरिक भारद्वाज ने जब अपना यज्ञ समाप्त कर लिया तो वह यज्ञ शेष किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को देना चाहते थे , तभी उनकी दृष्टि संन्यासी बुद्ध पर पड़ी। सुन्दरिक भारद्वाज ने जब बुद्ध से उनकी जाति पूछी तब बुद्ध ने खुद को ब्राह्मण कहा और उसे सत्य का उपदेश देते हुए कहा -
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"यदन्तगु वेदगु यञ्ञ काले। यस्साहुतिँल ले तस्स इज्झेति ब्रूमि।।"
श्लोक का हिंदी भावार्थ - वेद को जाननेवाला जिसकी आहुति को प्राप्त करे उसका यज्ञ सफल होता है ऐसा मै कहता हूं।
6) बौद्ध धर्म ग्रन्थ सुत्तनिपात के श्लोक 1059 में महात्मा बुद्ध ने जो कहा वो इस श्लोक के रूप में उल्लेखित है -
यं ब्राह्मणं वेदगुं अभिजञ्ञा अकिँचनं कामभवे असत्तम्।
अद्धाहि सो ओघमिमम् अतारि तिण्णो च पारम् अखिलो अडंखो।।
श्लोक का हिंदी भावार्थ - जिसने उस वेदज्ञ ब्राह्मण को जान लिया जिसके पास कोई धन नही, जो भौतिक कामनाओ मे आसक्त नही है , वह आकांक्षा से रहित होनेवाला इस संसार सागर के पार पहुंच जाता है।
7) बौद्ध धर्म ग्रन्थ सुत्तनिपात के एक अन्य श्लोक में बुद्ध कहते है
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"विद्वा च वेदेहि समेच्च धम्मम्|
न उच्चावचं गच्छति भूरिपञ्ञो|(सुत्तनिपात २९२)
श्लोक का हिंदी भावार्थ - जो विद्वान वेदो से धर्म का ज्ञान प्राप्त करता है, वह कभी भी विचलित नही होता है।
8) बौद्ध धर्म ग्रन्थ सुत्तनिपात के एक अन्य श्लोक में बुद्ध कहते है
विद्वा च सो वेदगू नरो इध, भवाभवे संगं इमं विसज्जा।
सो वीतवण्हो अनिघो निरासो,आतारि सो जाति जंराति ब्रमीति।। (सुत्तनिपात१०६०)
श्लोक का हिंदी भावार्थ - वेद को जानने वाला विद्वान इस संसार मे जन्म और मृत्यु की आसक्ति का त्याग करके शोक , इच्छा ,तृष्णा तथा पाप से रहित होकर जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।
इन सभी तथ्यों से ये स्पष्ट होता है कि भगवान बुध्द वेदो के विरोधी नही थे बल्कि वेदो को वे ज्ञान विज्ञान का अक्षय स्तोत्र मानते थे। उन्होंने अपने किसी भी उपदेश में वेद में निहित ज्ञान विज्ञान पर किसी प्रकार का संदेह प्रकट नहीं किया बल्कि सदैव उन्होंने वेदो के प्रति आदर का ही भाव प्रकट किया है।
बुद्ध के उपदेशो में जहा कही भी निन्दासूचक शब्द आये है वे उन ब्राह्मणोँ के लिए आये है जिन्होंने वेदो में निहित ज्ञान विज्ञान के अनुरूप आचरण नहीं किया और पथभ्रस्ट हो गए।
SJL37 | दयानंद सरस्वती का षड्यंत्र | Historical Conspiracy by Dayanand Sarasvati | Science Journey
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https://www.youtube.com/watch?v=Qj-3X7o7OVk
गौतम बुद्ध के पिछले जन्म में भी वेदों का अस्तित्व!
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गौतमबुद्ध के पिछले जन्म में भी वेदों का अस्तित्व था। न केवल अस्तित्व था, बल्कि गौतम बुद्ध पिछले जन्म में एक पुरोहित थे और वेदों का समर्थन भी करते थे।
बुद्ध के पिछले जन्मों की कथायें,बुद्ध के ही द्वारा बताई गई हैं। इन्हीं को "जातक कथायें" कहते हैं, जोकि सुत्तपिटक का एक भाग है़।
इन्हीं जातकों में से एक 'सेतकेतु(श्वेतकेतु) जातक' है जो जातक कथा नंबर ३७७ है।
इसमें गौतम बुद्ध एक राजा के पुरोहित हैं और सेतकेतु एक दंभी,विलासप्रिय संन्यासी है। ये अपने शिष्यों के ऐशो आराम के लिये राजा के पास आता है और अपनी सिद्धई जमाने की कोशिश करता है। पर राजा का पुरोहित, जो पिछले जन्म में बुद्ध थे, उसके मत का खंडन करते हैं। सेतकेतु वेदों पर आक्षेप करता है व पुरोहित उसका खंडन करते हैं। देखिये:-
When the king heard this, he took away his favour from the ascetics. Setaketu thought: “This king took a liking to the ascetics, but this priest has destroyed it as if he had cut it हैं।
an axe: I must talk to him”: so talking to him he spoke the fifth stanza:
सेतकेतु ने सोचा, कि ये राजा हम संन्यासियों व चेलों के पक्ष में है,पर ये राजपुरोहित सारे किये कराये पर पानी फेर रहा है। तब पुरोहित से 'सेतकेतु पांचवें पद्य के रूप में कहता है:-
“A learned sage may do ill deeds, O king:
A learned sage may fail to follow right”
You say: then Vedas are a useless thing:
Just works with self-restraint are requisite.
"हे राजन्! तुम ( राजा- पुरोहित दोनों) कहते हो कि एक ज्ञानी संत बुरे कर्म कर सकता है व अच्छे मार्ग पर चलने से नाकाम हो सकता है। यदि ऐसा है तो सारे वेद व्यर्थ की चीजें हैं।"
The priest hearing this, spoke the sixth stanza:
Nay, Vedas are not useless utterly:
Though works with self-restraint true doctrine is:
Study of Vedas lifts man’s name on high,
But ’Tis by conduct that he reaches Bliss.
So the priest refuted Setaketu’s doctrine.
पुरोहित यानी बुद्ध ने उसको छठवें पद्य में जवाब दिया:-
" नहीं! वेद व्यर्थ की चीज नहीं होते। वेद का पठन पाठन व्यक्ति की आत्मोन्नति करता है। केवल उनको आचरण में पालन करके ही उच्चता पाई जा सकती है।"
इस तरह पुरोहित ने सेतकेतु के मत का खंडन किया।
After the lesson the Master identified the Birth: “At that time Setaketu was the cheating priest, the candala was Sariputta, and the King’s priest was myself.”
इस कथा के बाद बुद्ध कहते हैं-"सेतकेतु उस जन्म में धोखा देने वाला पुरोहित था, चांडाल सारिपुत्त था, और मैं ही उस राजा का पुरोहित था।"
stories of the buddha’s former births
book 6 chanipāta
377. Setaketu Jātaka
( बुद्ध के पिछले जन्मों की कहानियां। सेतकेतु जातक ३७७)
इस बौद्ध वेबसाइट suttacentral.com का लिंक है। यहीं से कथा उठाई है।
https://suttacentral.net/ja377/en/francis-neil
अतः सिद्ध हुआ कि बुद्ध के पिछले जन्म में भी वेदों का अस्तित्व था साथ ही, बुद्ध भी वेद के समर्थक थे।
ये प्रमाण उन भीमसैनिकों के मुंह पर करारा तमाचा है जो संस्कृत व वेदों को बुद्ध के बहुत बाद का बताते हैं।
अतः भीमसैनिकों को अपने बुद्ध की बात मानते हुये वेदों का समर्थन करना चाहिए।
नमस्ते
।।ओ३म्।।
विज्ञान vs अज्ञान ||Neuro Science of consciousness? Modern science and nature part 1
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https://youtu.be/q6yqr7pPfcM
@Alok Sahu,
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गलत जानकारी। मनुवादी बालक,दयानंदी नियोगपुत्र, तुझे कुछ भी पता नहीं है, तु हवा में तीर मार रहा है। तुझे 'जातक' कथा (बोध कथा) और 'बुद्धवंस' इन दो ग्रंथों को तु एक ही ग्रंथ समझ रहा है, बालक 'बुद्धवंस' इस ग्रंथ मे पूर्व बुद्धोन्की जानकारी मिलती है। अभ्यास बढा दे और सत्य को स्वीकार कर, मूर्खतापूर्ण बातें मत कर, सुधर जा !!!
@Asatya Ka Bhandafod
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अबे बिलकुल सही जानकारी हे बे भीमटे। अबे तूझे सच बर्दास्त नही हो रहा हे तो में क्या करू??? बामसेफि गज नियोगपुत्र पता तो तुझे घंटा कुछ नही हे और लेक्चर मुझे दे रहा हे। २८ बुद्ध का जिक्र जातकों में भी हे। जातक की पहली कथा दूरें निदान में ही दीपांकर से ले कर २७वे बुद्ध का जिक्र हे। सत्य तो स्वीकार नही कर पा रहा हे इसीलिए बिलबिला कर जातको को ही नकार रहा है।
एक समय के लिए जातक को काल्पनिक कहानियां मान भी ले तब भी। बुद्ध के मुख से वेदों का जिक्र वेद को बुद्ध से ही प्राचीन साबित करता है।
@Alok Sahu,
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मनुवादी बालक,दयानंदी नियोगपुत्र, बामटे, युधिष्ठिरटे, भीमटे, अर्जुनटे, नकुलटे, सहदेवटे,
तू तो संपूर्ण असत्य लिख रहा है, जरा शरम कर, बेशरम की तरह कब तक ऐसे झूठ पे झूठ लिखता रहेगा? फर्जी आर्य समाजी किडे सुधर जा, नहीं तो गोबर-मूत्र भरे खोपडी वाले एक दीन पागल खाने मे भरती जरूर भरती होगा!!!
भीमटे बालक, बामसैफी गज नियोगपुत्र, बामटे, बुधटे,
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में बिल्कुल सच लिख रहा हु बे। तुझे सच बर्दास्त नही हो रहा तो में क्या करू??
जा नही सुधारता बोल क्या बिगाड़ लेगा बे। बाम सेफी गधे। सच सुन का तुम लोगो के गुर्दों में दर्द कहे होने लगता है बे।
दयानंदटे, नियोगटे, फर्जी आर्यटे, अत्रीटे, सुरेन्द्र कुमारटे, भीमटे, बामसैफी तथाकथित ब्रह्मपुत्र तथा नियोगपुत्र, बामटे, बुधटे,
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तु बिल्कुल असत्य ही लिख रहा है बे। तुझे असत्य ही जादा पसंद है तो में क्या करू??
तु नियोगपुत्र सुधरनेवाला बिलकुल नहीं है, इसलीये तेरा सबकुछ बिगडनेवाला है बे। बामसेफी-आर्य समाजी गधे, सुअर, कुत्ते। असत्य लिखकर ही तुम लोगो के गुर्दों में दर्द चालू हो जाता है बे।
आंबेडकरटे,गज नियोगटे, फर्जी आर्यटे, अत्रीटे, सुरेन्द्र कुमारटे, बुधटे, आर्य समाजी तथाकथित शाक्यपुत्र तथा गज नियोगपुत्र, बामटे, युधिष्ठिरटे, अअसत्य तो तू लिख रहा है बे। अपनी आदत मुझ पर मत डाल
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गज नियोगपुत्र नही सुधरनेवाला वाला हू में जा जो उखाड़ना है उखाड़ ले। बिगाड़ कर दिखा मेरा बामसेफी-आर्य समाजी गधे, सुअर, कुत्ते। असत्य लिखकर ही तो तेरे जेसे लोगो का धंधा चलता है। हुमारा धंधा तो सत्य लिख कर चलता है।
Science journey is fake..propaganda and false is feeding of nav baudhist thinking
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Buddh dharm ne bharat ko gulam bana diya.afganistan buddhist ho gaya yuddh karna chhod diya .jhola pahan liya .to mullon ne inko mara kuta.to kuchh bhag gae baki ke mulley ban gae .aaj afganistan mulla desh hai . Islia buddhon ne buddh dharm chhod vapas hindu ban gae




































भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्व
REPLYभारतीय संस्कृति का मूलभूत तत्व है जीवन की अंतरंगता अर्थात अन्तर्जगत को देखना। एक बाह्य जगत है, और एक व्यक्ति है जिसके भीतर भी एक जगत है । कहते हैं कि भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक है। यह आध्यात्मिक शब्द बड़ा भ्रामक है। भारत में सभी लोग आध्यात्मिक शब्द का अर्थ अपने-अपने ढंग से करते हैं । भूत प्रेत की पूजा करने वाले भूत प्रेत को ही आध्यात्मिक कहते हैं। ईश्वरवादी, देववादी भी इसी को आध्यात्मिक कह देते हैं। कई लोग हनुमान को आध्यात्मिक कहते हैं। ये सभी बातें भ्रामक हैं। हम सब संस्कारों से प्रभावित हैं और संस्कारों का अपना अलग-अलग इतिहास होता है । वैदिक के साथ "संस्कृत" शब्द नहीं लगाना चाहिए । वैदिक धर्म कर्मकाण्डी धर्म था । उदाहरण के लिए, इसकी तुलना बम्बई के कसाई घर या बूचड़खाने से की जा सकती है। एक-एक यज्ञ के साथ बम्बई के बूचड़खाना जैसा कई कई बूचड़खाने होते थे। पुत्र पैदा करने के लिए भी यज्ञ (पुत्रोष्ठि यज्ञ) होता था । पुत्र का जन्म किसी और क्रिया से होता है लेकिन इसके लिए यज्ञ सम्पन्न किए जाते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि उस समय बहि रंगता का जोर था। लोगों को शूद्र, मलेच्छ,, अनार्य बनाकर रखना, यह सब बहिरंगता है । शराब, मैथून, भोग यह बहिरंगता है। यहां तक कि इनके सारे देवता भी भोगी थे । तरह-तरह के स्वर्ग बना दिए गए थे जहां भोग ही भोग होता था, मैथून ही मैथून । यह ऐहिकता है । इसके विरोध में भगवान बुद्ध ने आध्यात्मिकता की स्थापना की। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता मनुष्य के मन से शुरू होती है। धर्म आन्तरिक होता है, बाह्य नहीं। इस प्रकार भोगवादी संस्कृति के स्थान पर त्यागवादी, आध्यात्मिक संस्कृति की स्थापना करने का श्रेय बुद्ध को है।
इतिहास की दृष्टि से भगवान बुद्ध की विचारधारा से मिलती-जुलती विचारधारा वाले अन्य श्रमण लोग भी थे। यह सब मिलकर श्रमण संस्कृति कहलायी। भगवान बुद्ध इसके नेता थे। यही संस्कृति भारतीय संस्कृति का प्रधान बनी। बुद्ध ने कहा-जीवन का लक्ष्य बाहर नहीं, 'भीतर है और जो होता है वह बाहर के हस्तक्षेप से नहीं होता। मनुष्य प्रधान है । संसार का अच्छा-बुरा होना मनुष्य पर आधारित है । संसार को अच्छा बनाने के लिए भोगवादियों का कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि त्याग चाहिए। भौतिकता जीवन या संस्कृति का लक्ष्य नहीं हो सकता । भोग नहीं त्याग जीवन का लक्ष्य है। युद्ध, धर्म नहीं हो सकता, यह विवशता है। करुणा, मैत्री धर्म का अंग है। इसके विपरीत विकृति होगी। श्रेष्ठ और सुन्दर भीतर की सुन्दरता से होगा । कर्मकाण्ड समाज की व्यवस्था थी, जाति की व्यवस्था थी। इससे लोगों के अधिकार सीमित हो गये थे। बुद्ध ने इन सबको यह कहकर तोड़ा कि यह संस्कृति का अंग नहीं है। उन्होंने कहा-मनुष्य की आंतरिक अच्छाई मानवीय गुण है, वही श्रेष्ठ है। जो वैभवशाली है, भोग परायण है वह श्रेष्ठ नहीं, त्याग करने वाला श्रेष्ठ है। उन्होंने कहा-समाज में श्रेष्ठ कौन है? ब्राह्मण या भिक्षु? बुद्ध का उत्तर था कि भिक्ष श्रेष्ठ है। भिक्ष के अन्दर मानवीय गुणों का विकास होता है। उसके लिए जाति वैभव का प्रश्न नहीं है। भोगी नहीं योगी श्रेष्ठ है। देव से मनुष्य श्रेष्ठ है। देव भोग परायण है। उसके मुकाबले मनुष्य कर्मपरायण है, इसलिए मनुष्य श्रेष्ठ है ।
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