आजकल नवबौद्धों ने एक हास्यास्पद सा सिद्धांत छेड़ रखा है कि जो भी आसन में ध्यान मुद्रा में दिखता है, उसे ही बुद्ध बताने लग जाते हैं। कुछ तो इतने आगे बढ़ गये हैं कि यदि किसी जगह आसन में देवी का चित्र भी हो तो उसे भी बुद्ध कहने से पीछे नहीं हटते हैं। ऐसे ही एक तथाकथित भाषा वैज्ञानिक ने तो परमारों की सुवर्ण मुद्रा पर बनी देवी की प्रतिमा को भी बुद्ध बता दिया था। आईए आगे बढ़ने से पहले हम उस मुद्रा का अवलोकन कर लेते हैं -
- Numismatic Digest vol 17, 1993, cover page
यहां आप देख सकते हैं कि आसन में विराजमान आकृति एक देवी की है। जिसमें स्पष्ट स्त्री लक्षण नजर आते हैं।
- Numismatics Digest vol 17, 1993, page no. 47
इस मुद्रा में एक तरफ विराजमान देवी हैं तथा दूसरी तरफ देवनागरी में शासक का नाम श्रीमन्नरवम्म अंकित है।
अब आप सोच सकते हैं जो व्यक्ति स्त्री लक्षणों को स्पष्ट देखकर भी चित्र को बुद्ध बता सकता है तो वह कितना सत्यवादी होगा? ऐसे लोग मात्र भ्रमवादी ही कहे जा सकते हैं।
खेर आगे बढ़ते हैं -
कुछ नवबौद्ध ऐसे हैं कि या तो हर विराजमान प्रतिमा को बुद्ध बताते हैं या फिर ऐसा दावा करते हैं कि विराजमान ध्यान मुद्रा में हिंदू देव प्रतिमाओं की शैली बुद्ध की ध्यान मुद्रा प्रतिमाओं से चुराई गई थी। अर्थात् आसनबद्ध ध्यान मुद्रा में मुर्ति शैली बुद्ध मत से हिंदू धर्म में गयी थी। तो आईए हम हिंदू धर्म में ध्यान मुद्रा में देव चित्रण की प्राचीनता जानते हैं तथा साथ ही ये भी जानेगें कि प्रत्येक ध्यान मुद्रा में बनी प्रतिमा बुद्ध नहीं होती है।
इस प्रतिमा को देखिये -
(कंसवा मंदिर से स्वयं लेखक द्वारा ली गई लकुलिश की फोटो)
ऊपर आप कोटा जिले के कंसवा मंदिर की एक दीवार पर बनी प्रतिमा देख सकते हैं जो कि पद्मासन में हैं तथा एक हाथ में दंड और दूसरे हाथ में कोई फल (मातुलिंगी फल) या कमंडल लिये है जो कि टूटा है।
कोई भी अजानकार व्यक्ति इस प्रतिमा को बुद्ध या जैन प्रतिमा बोल देगा। नवबौद्ध तो इसे बुद्ध ही बतायेगें तथा पूरे मंदिर को ही बौद्ध मंदिर घोषित कर देगें। किंतु यह प्रतिमा भगवान शिव के चौबीस अवतारों में से एक लकुलिश की है। लकुलिश ब्रह्मचारी व योगी रुप में अवतरित हुए थे अतः उनकी प्रतिमायें भी ध्यान मुद्रा में बैठी हुई बनती है। साथ ही यह चित्र जिस मंदिर से लिया गया है वह एक शिव मंदिर है। मंदिर के अभिलेख से भी यह मंदिर शिव मंदिर ही सिद्ध होता है।
मंदिर के अभिलेख की शुरुआत ही ओम् नमः शिवाय से होती है-
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- The Indian Antiquary vol xix, 1890, page no. 57
अभिलेख की चतुर्थ पंक्ति में मौर्यवंश की प्रशंसा है तथा षष्ठी पंक्ति में उसी मौर्यवंश में जन्मे राजा धवल की कीर्ति का गायन है। सातवीं पंक्ति में राजा धवल मौर्य के मित्र द्विज शंकुका का उल्लेख है।
नवीं पंक्ति में सामन्त शंकुका की पत्नि से उत्पन्न पुत्र राजा शिवगण का उल्लेख है जिसे शिवजी का बड़ा भक्त बताया है।
- The Indian Antiquary vol xix, 1890, page no. 58
- The Indian Antiquary vol xix, 1890, page no. 60
- The Indian Antiquary vol xix, 1890, page no. 61
अभिलेख की चौदहवीं पंक्ति में मंदिर निर्माण की तिथि 795 मालव संवंत् दी गई है। सौलहवीं पंक्ति में इस शिव मन्दिर जो कि शिवगण राजा ने बनवाया था को यश व धर्म को बढ़ानें वाला बताया है।
- The Indian Antiquary vol xix, 1890, page no. 59
- The Indian Antiquary vol xix, 1890, page no. 61
- The Indian Antiquary vol xix, 1890, page no. 62
यह अभिलेख 795 विक्रम संवत् (मालव संवंत्) में लिखा गया था तथा इसकी लिपि सिद्धम् है। मूल अभिलेख का एक चित्र -
( लेखक द्वारा ली गई फोटो)
इस मंदिर परिसर में अनेकों शिवलिंग भी हैं जिनके चित्र -
( ब्लाग लेखक द्वारा ली गई तस्वीरें)
मंदिर परिसर में अद्भुत चतुर्मुख शिवलिंग के दर्शन -
(लेखक द्वारा लिया गया प्रतिरुप)
इस चतुर्मुख शिवलिंग का शिल्प बेजोड़ है तथा शिवजी की जटाऐं किसी भी दर्शक का मनमोह सकती हैं।
एक नंदी -
(लेखक द्वारा लिया गया)
यहां हमारा मूल विषय ध्यान मुद्रा में हिंदू देव प्रतिमाओं की प्राचीनता है किंतु आप सब लोगों को एक शिव मंदिर के माध्यम से लकुलिश अवतार की मुर्ति शैली से परिचित करवाना था, इसी उद्देश्य के चलते हमने आपको इस मंदिर के अभिलेख और अन्य भागों का भी दर्शन करवाया जिससे आप अच्छी तरह समझ सकें कि ध्यान मुद्रा में तथा आसनबद्ध शैली में हिंदू देव प्रतिमाऐं भी बनती है। यदि कोई नवबौद्ध ऐसी किसी भी मुर्ति को बुद्ध की बताकर गुमराह करे तो आप इस मंदिर के शिल्प तथा लकुलिश की प्रतिमा का उदाहरण देकर आसनबद्ध ध्यान मुद्रा में हिंदू देव प्रतिमाओं का प्रतिपादन कर सकते हो।
लकुलिश का वर्णन हमें विविध पुराणों में भी प्राप्त होता है। उनमें से कुछ पुराणों के वचनों को हम यहां उद्धृत करते हैं -
- लिङ्ग महापुराण 24.127- 133
यहां शिवजी के लकुली (लकुलीश) अवतार का वर्णन है। उन्हें ब्रह्मचारी शरीर, योगी के रुप में वर्णित किया है। उनके चार शिष्यों कुशिक, गर्ग, मित्र एवं कौरुष्य का भी उल्लेख है। ये सभी पाशुपत योग के प्रचारक थे।
वायु पुराण में भी ऐसा ही वर्णन है किंतु वहां लकुली के स्थान पर नकुली(नकुलीश) नाम आया है -
- वायुुपुराणम् 23.221
कुर्म महापुराण में भी नकुली नाम से यही अवतार आया है तथा इसे कलियुग में होने वाला अवतार बतलाया है -
- कुर्म पुराण 1.51.9-10
यहां स्पष्ट है कि पुराणानुसार शिव जी ने कलियुग में लकुली (लकुलीश) अथवा नकुली (नकुलीश) अवतार लिया था। उनके शिष्यों सहित वे सभी पाशुपत योग (मत) के प्रचारक थे। ये सभी वेद पारंगत, ब्रह्मचारी, योगी और लिङ्ग पूजक हुआ करते थे।
लकुलिश का उल्लेख हमें मेवाड़ की कैलाशपुरी की एकलिंगजी मंदिर में मौजुद नाथप्रसाद की प्रशस्ति से मिलता है।
- राजस्थान के प्राचीन अभिलेख, अध्याय 18, पेज नं. 65
यह अभिलेख 971 ईस्वी का है। इसी अभिलेख में पाशुपत योग के प्रचारक तथा लकुलीश (नकुलीश) के शिष्य कुशिक मुनि की भी स्तुति है -
- राजस्थान के प्राचीन अभिलेख, अध्याय 18, पेज नं. 66
राजस्थान के इस अभिलेख के अलावा लकुलीश सम्प्रदाय (पाशुपतमत) का उल्लेख गुप्तकालीन मथूरा के एक अभिलेख में भी मिलता है -
- राजस्थान के प्राचीन अभिलेख, अध्याय 18, पेज नं 68
यह अभिलेख 380 ईस्वी का है तथा इसमें लकुलीश सम्प्रदाय (पाशुपत) की आचार्य परम्परा का भी उल्लेख मिलता है और शिवलिंग स्थापना का भी।
अतः यह बात स्थापित हो जाती है कि लकुलीश की मान्यता अत्यंत प्राचीन है और ध्यान मुद्रा में बैठी उनकी भी प्रतिमायें बनती है। इसीलिए प्रत्येक ध्यान मुद्रा में विराजमान प्रतिमा को बिना सोचे समझे बुद्ध कह देना अज्ञानता ही नहीं अपितु धूर्तता भी है।
इसके पश्चात् प्रश्न रह जाता है कि ध्यान मुद्रा में विराजमान प्रतिमाओं (चित्रों) की प्राचीनता किसमें देखी जाती है? हिंदुओं में अथवा बौद्धों में?
इसी प्रश्न के उत्तर के लिए हमने इतने विस्तार और प्रमाणों से लकुलीश (नकुलीश) का ऊपर वर्णन किया था।
लकुलीश की आसनबद्ध ध्यान मुद्रा में मुर्ति को आप सब ऊपर ही देख चुके हैं तथा हमने अभिलेखों के माध्यम से भी लकुली / नकुली की प्राचीनता दर्शायी है। लेकिन अब आप लकुलीश का सबसे प्राचीन चित्रांकन देखेगें। यह चित्रांकन उस समय का है जब बुद्ध की प्रतिमाओं का जन्म तक नहीं हुआ था अर्थात् कुषाणकाल से प्राचीन।
- Classical Numismatic Auction 24, Lot no. 557
यह मुद्रा 150 - 100 ईसापूर्व प्राचीन है तथा उज्जैन से प्राप्त भूमिमित्र नामक शासक की है। इस मुद्रा पर भगवान लकुलीश को ध्यान मुद्रा में बैठे हुए देखा जा सकता है। मुद्रा पर बना चित्र बिल्कुल कंसवा मंदिर की दीवार पर बनी मुर्ति ही जैसी है। मुद्रा में भी लकुलीश हाथ में दंड लिये हैं।
प्रसिद्ध मुद्राविशेषज्ञ पाईपर भी आकृति के लकुलीश होने को प्रमाणित करते हैं -
- The coin galleries: Ujjain page no. 1
यहां आप सबने देखा कि आसनबद्ध ध्यान मुद्रा में लकुलीश का चित्रण बुद्ध की शुरुवाती मुर्तियों से भी प्राचीन है। अतः निष्कर्ष प्राप्त होता है कि बुद्ध से पूर्व ही हिंदू देवों की ध्यानबद्ध बैठी हुई प्रतिमायें बन गई थी। यह प्रमाण शैव मत तथा भगवान शिव के अवतार लकुलीश/ नकुलीश की मान्यता को भी प्राचीन सिद्ध करता है।
संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें -
1) Numismatic Digest vol 17, 1993
2) The Indian Antiquary vol xix, 1890
3) लिङ्ग महापुराण - अनु. पं. द्वारकाप्रसाद मिश्र शास्त्री
4) वायुुपुराणम् - अनु. रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री
5) कुर्म पुराण - गीताप्रेस गोरखपुर
6) राजस्थान के प्राचीन अभिलेख - डा. श्रीकृष्ण जुगनू
7) Classical Numismatic Auction 24
8) The coin galleries: Ujjain - authored by Wilfried Pieper
संपूर्ण असत्य!!!
REPLYसंपूर्ण सत्य हे बे।
Sanatan Samiksha Youtube Channel With Kushwaha Boys Team 【 Trailer 】
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