जब भगवान बुद्ध ने दी... ...जब भगवान बुद्ध ने दी अपने ही शिष्य को मांस खाने की इजाजत

...जब भगवान बुद्ध ने दी... ...जब भगवान बुद्ध ने दी अपने ही शिष्य को मांस खाने की इजाजत 

भिक्षु गौतम के पास आए और कहा, ‘देखिए, आपने हमसे कहा था कि हमें मांस नहीं खाना चाहिए। 

बात उन दिनों की है जब गौतम बुद्ध के पास जो भी आता उसे भिक्षु बनने की दीक्षा मिल जाती थी। आने वालों में बहुत से लोग राजा थे या ऐसे समुदायों से आते थे, जहां मांस खाना सामान्य बात थी, क्योंकि वे शिकारी थे। बुद्ध ने इसलिए एक नियम बना दिया कि भिक्षु मांस नहीं खाएंगे। एक दिन दो भिक्षु शहर में भिक्षा मांगने गए पर उन्हें कुछ नहीं मिला। भिक्षुओं को जो कुछ भी मिलता सभी आकर भोजन को बुद्ध के चरणों में रख देते थे। वह उस भोजन को सभी को बांट देते थे। बिना भिक्षा के दोनों भिक्षु लौट रहे थे। उसी समय उड़ते हुए एक कौवे के पंजों से छूटकर मांस का टुकड़ा सीधा आकर भिक्षु के पात्र में गिरा। भिक्षु गौतम के पास आए और कहा, ‘देखिए, आपने हमसे कहा था कि हमें मांस नहीं खाना चाहिए, हमें उससे कोई ऐतराज नहीं है लेकिन आपने हमसे यह भी कहा था कि भिक्षु को यह नहीं देखना चाहिए कि वह क्या खा रहा है जो भी मिले, उसे खा लेना चाहिए।


अब हमारे पात्र में मांस है। अगर हम उसे खाते हैं, तो एक नियम तोड़ेंगे और नहीं खाते तो दूसरा नियम तोड़ेंगे। हमें क्या करना चाहिए?’ गौतम ने सोचा कि अगले दो-ढाई हजार सालों में किसी और कौवे का किसी दूसरे भिक्षु के पात्र में मांस का टुकड़ा गिराने की संभावना है क्या? करोड़ों में एक मौका ऐसा हो सकता है। इसलिए उन्होंने कहा, ‘तुम उसे खा लो, फेंको नहीं, क्योंकि तुम उसे फेंकोगे तो उससे और अधिक जुड़ाव होगा जो तुम्हारे मन को विचलित करता रहेगा। 


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