हमने बहुत पहले भी बौद्ध स्तूप से वैदिक यज्ञ का प्रमाण दिया था जो कि कश्यप जाटिल कथा से सम्बंधित था। अब पुनः इस नई पोस्ट में हम बौद्ध स्तूप तथा स्तूप पर बने फलक से सम्बंधित जातक कथा के तुलनात्मक अध्ययन से यज्ञ का प्रमाण देगें। यहां स्तूप फलक का प्रमाण इसलिए दिया जायेगा कि नवबौद्ध इस जातक कथा की प्रमाणिकता पर संदेह या सवाल न कर सकें।
तो वो जातक है सुत्तपिटक के खुद्दकनिकायपालि में जातकपालि 2 के महानिपातो 22 के जातक क्रमांक 547, महावेस्सन्तर जातक से -
इस जातक में बुद्ध पूर्वजन्म में वेस्सन्तर नामक राजा हुआ करते थे। जो कि दानशीलता के लिए अत्यंत प्रसिद्ध थे। हम यहां सम्पूर्ण जातक कथा तो नहीं लिख सकते हैं किंतु इस जातक में आये अग्निहोत्र, यज्ञ के प्रमाणों को उद्धृत करते हैं -
(1) वेस्सन्तर को यजमान अर्थात् यज्ञ करके दान देने वाला कहा है -
यहां वेस्सन्तर के समानांतर एक वृद्ध ब्राह्मण तथा उसकी युवा स्त्री की भी कहानी है। इस प्रकरण में युवा ब्राह्मणी के कोई संतान उत्पन्न नहीं होती है, इसपर नगर की अन्य स्त्रियां उस ब्राह्मणी को ताने मारती हैं और कहती हैं - "तेरा नौमी का यज्ञ ठीक नहीं हुआ और तेरा अग्निहोत्र ठीक नहीं हुआ होगा।"
यहां पालि में नवमिय शब्द है जिसको अट्ठकथा में नवमिय याग कहा है तथा अग्गिहुत्त को अग्गिजुहन अर्थात् हवन कहा है।
इस प्रकार यहां नवमिय याग और अग्निहोत्र का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है।
यहां पर जब वृद्ध ब्राह्मण किसी से वेस्सन्तर राजा का पता पूछता है कि वेस्सन्तर राजा कहा है तो वो व्यक्ति वेस्सन्तर की पहचान इस प्रकार बताता है - "ब्राह्मण वेश (श्रेष्ठ वेश) में, आहुति डालने का सरुआ लिये, जटायुक्त वह वेस्सन्तर जातवेद को नमन कर रहे हैं"
यहां जातवेद शब्द का प्रयोग हुआ है जो कि यज्ञाग्नि के लिए प्रयुक्त होता है। तथा यहां अग्नि को सरुआ साथ में लिए नमन किया जा रहा है अर्थात् आहुति डालकर अग्नि का नमन किया जा रहा है जैसा कि अथर्ववेद के निम्न मंत्र में भी अग्नि के लिए नमन है -
यहां अग्नि में सरूआ से आहुति ही दी जा रही है तथा अग्नि को वैदिक शब्द जातवेद नाम से ही पुकारा है, इस कथन की पुष्टि सांचि स्तूप पर बने एक फलक से भी होती है। जिसमें वेस्सन्तर को हवन करते हुए देखा जा सकता है -
- The Art Of India: Traditions Of Indian Sculpture Painting And Architecture, fig. no.23
यहां आप देख सकते है कि वेस्सन्तर सरुआ से अग्नि (जातवेद) में आहुति दे रहा है अर्थात् आहुति पूर्वक जातवेद को नमन कर रहा है। यहां सांचि स्तूप पर वेस्सन्तर जातक का चित्रण इस जातक की प्राचीनता तथा प्रामाणिकता सिद्ध करता है। अत: कोई भी नवबौद्ध इस जातक में आये अग्निहोत्र, नवमिय यज्ञ, हवन के प्रमाण को नकार नहीं सकता है। अतः इस प्रमाण से निष्कर्ष निकलता है कि जातकों के निर्माण से पूर्व ही वेद, अग्निहोत्र, यज्ञ का अस्तित्व था।
Sir kya aap aitray Brahman 7.29.4 par kuch bata sakte hai jiske anusar dwij jati ke anusar shudro ko apni icha ke anusar maar sakte hai???Aisa hi kuch Shatpat Brahmin mein bhi likha hai ki jaha ye kaha gaya hai ki shudro aur kutto ko Yagya mein bhag nahi lena chahiye. Iss par kuch prakash daal sakte hai
आलार कलाम आलार कलाम ( अंग्रेज़ी : Alara Kalama ) बुद्ध के समकालीन एक दार्शनिक एवं योगी थे। वे सांख्य दर्शन के विशेषज्ञ थे। पालि ग्रन्थों के अनुसार वे गौतम बुद्ध के प्रथम गुरु थे। छ:वर्षों तक आलार कलाम के पास रहकर बुद्ध ने सांख्य मार्ग तथा समाधि मार्ग का उचित अध्ययन किया था। गौतम बुद्ध के समय समाज में सांख्य दर्शन का काफी प्रभाव था और इससे बुद्ध भी काफी प्रभावित थे। उनकी भी इच्छा थी कि सांख्य दर्शन का अध्ययन करें। इसलिए वे वैशाली के आश्रम में जा पहुंंचे, जहाँ (गोंड़ी) धर्म के (आदिवासियों) के पहले धर्मगुरु (पारी कूपार लिंगो संस्थापक) के बारहवें गोंड़ी धर्म गुरु (उत्तराधिकारी) आलार कलाम लिंगो रहते थे। आलार कलाम ने बुद्ध को न सिर्फ सांख्य दर्शन की शिक्षा दी, बल्कि उन्हें ध्यान मार्ग के सिद्धान्त तथा समाधि मार्ग का ज्ञान भी प्रदान किया। स्वयं आलार कलाम भी ध्यानाचार्य के रूप में कौशल जनपद में प्रसिद्ध थे। छ:वर्षों तक आलार कलाम के पास रहकर बुद्ध ने सांख्य मार्ग तथा समाधि मार्ग का उचित अध्ययन किया ...
वह सुकर मद्दव आख़िर क्या था जिसे खाने से गौतम बुद्ध का परिनिर्वाण हुआ था ? Rajesh Pasi 1 year ago हज़ारों सालों से भारत में यह बात प्रचलित है की गौतम बुद्ध ने अपना आख़िरी भोजन के तौर पर सुअर का माँस खाया था । प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक राजेंद्र प्रसाद सिंघ जी ने इस पर प्रश्न चिन्ह लगाया है । उन्होंने भाषा के ज़रिए यह बात साबित करने की कोशिश की है की यह बात सत्य नहीं है । वह बताते है की गौतम बुद्ध की मृत्यु के कोई हजार साल बाद यह बात चर्चा में आई कि वे अंतिम भोजन सूअर का माँस किए थे। वे बुद्धघोष थे, जिन्होंने अपनी पुस्तक ” सुमंगलविलासिनी ” में पहली बार सूकर मद्दव का अर्थ सूअर का माँस किए थे।यह किताब संस्कृत में लिखी थी । राजेंद्र प्रसाद जी का कहना है पाली भाषा से संस्कृत में अनुवाद करते समय यह गड़बड़ हुई है । जिसे अब तक सच माना गया है । वह कहते है की यह वही बात हुई जैसे कोई अंग्रेज़ भिंडी खाए तो वह उसे लेडी फ़िंगर कहेगा और हम इसका अर्थ ” हिंदी में स्त्री की ऊँगली ” खाना कर दे क्योंकि अंग्रेजी में वह Lady finger है। अर्थ सही है पर क्या वह स्त्री की अंगुली खा रहा था ? बुद्ध की मृत्यु क...
Yagya chin Japan Tibet ke bodh krte hai
REPLYSir kya aap aitray Brahman 7.29.4 par kuch bata sakte hai jiske anusar dwij jati ke anusar shudro ko apni icha ke anusar maar sakte hai???Aisa hi kuch Shatpat Brahmin mein bhi likha hai ki jaha ye kaha gaya hai ki shudro aur kutto ko Yagya mein bhag nahi lena chahiye. Iss par kuch prakash daal sakte hai
REPLYEsa kuch bhi nhi hai.. kutte ko bhut saman dia jata hai hmre dhrm me ..
कुत्ते और भेड़िये रुद्र के पालतू जानवर हैं। (अथर्ववेद ११.२.२