मित्रों हमने अपने ब्लाग के पिछले लेखों में कृष्ण और बलराम के अंकन की प्राचीनता पर प्रकाश डाला था। अब हम श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के अंकन की प्राचीनता के प्रमाण देते हैं -
श्री प्रद्युम्न को पंचवृष्णि वीरों में से एक माना जाता है तथा पंचवृष्णि वीरों का उल्लेख मथूरा से प्राप्त (100 ईसापूर्व - 100 ईस्वी) के राजबुल के एक अभिलेख में है, ये अभिलेख मोरा नामक स्थान से प्राप्त हुआ था।
- Vrisnis in Ancient Literature and Art, page no. 76
यहां वृष्णि वीर शब्द से ही प्रद्युम्न के उल्लेख का ज्ञान हो जाता है।
इसी प्रकार हरिवंश पुराण में तथा महाभारत में प्रद्युम्न जी को क्रमशः मकरध्वज (कामदेव का अवतार) और मकर अंकन ध्वजा वाला भी कहा गया है।
- श्रीहरिवंश पुराण, विष्णुपर्व, 106.45
इस श्लोक में प्रद्युम्न को कामदेव अवतार होने के कारण मकरध्वज (अर्थात् मकर जिसका ध्वज हो) नाम से सम्बोधन किया गया है।
नागार्जुन कौंडा के आंध्र इक्ष्वाकु वंश के शासक रुद्रपुरुषदत्त के अभिलेख में भी कामदेव का सम्बोधन मकरध्वज के नाम से है।
- Inscriptions Of Early Andhradesa, fig. no. 9, page no. 39
अभिलेख का ब्राह्मी से रोमन लिप्यन्तरण और अनुवाद इस प्रकार है -
- Inscriptions Of Early Andhradesa, Page no. 14 - 15
इस अभिलेख में कामदेव को मकरध्वज तथा भगवान शिव को गोवृषभध्वज पुकारा है। इस अभिलेख को पढने पर ज्ञात होता है कि इसमें बुद्ध को श्रेष्ठ दिखाने के लिए हिंदू देवों जैसे - शिव, विष्णु तथा कृष्ण को बुद्ध से तुच्छ या असमर्थ बताया है। इस बारें में किसी अन्य लेख में चर्चा करेगें किंतु यहां हम देख सकते हैं कि कामदेव का सम्बोधन मकरध्वज है।
कामदेव अवतार होने के कारण प्रद्युम्न को भी मकरध्वज कहा गया है तथा महाभारत में ही उनकी ध्वजा पर मकर चिह्न अंकित होने की बात भी आयी है -
इस श्लोक में प्रद्युम्न की ध्वजा को मकरचिह्नित बताया गया है। इसी कारण प्रद्युम्न को सांकेतिक रुप से दर्शाने के लिए प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला में मकरध्वज स्तम्भ का निर्माण और मुद्राओं पर अंकन मिलता है।
यहां हम प्रद्युम्न जी के सांकेतिक अंकन मकरध्वज स्तम्भ का पुरातात्विक प्राचीन प्रमाण प्रस्तुत करते हैं -
- Heaven On Earth: Temples, Ritual, And Cosmic Symbolism In The Ancient World, fig no. 6.2, page no. 136
उपरोक्त चित्र में दिया मकरध्वज स्तम्भ विदिशा के बेसनगर से प्राप्त हुआ था। यह स्तम्भ उसी स्थान से प्राप्त हुआ है, जहां से गरुडध्वज स्तम्भ और ताडध्वज स्तम्भ भी प्राप्त हुए थे। अतः इसमें कोई संदेह नही है कि प्राचीनकाल में बेसनगर भागवत मत या वैष्णवों का प्रमुख स्थल था। उपरोक्त मकरध्वज स्तम्भ भी ताडध्वज स्तम्भ की तरह खंडित अवस्था में प्राप्त हुआ था। सर्वप्रथम कनिंघम ने इसका एक रेखाचित्र दिया था -
- Archaeological Survey Of India Report Of Tours In Bundelkhand And Malwa in 1874 - 75 And 1876 - 77, Volume X, Plate no. XIV
बेसनगर से प्राप्त मकरध्वज स्तम्भ के प्रमाण से प्रद्युम्न के सांकेतिक अंकन की प्राचीनता 200 ईसापूर्व तक हो जाती है। साथ ही इस स्थान से प्राप्त निम्न ध्वज स्तम्भ क्रमशः -
गरुडध्वज स्तम्भ - भगवान वासुदेव
तालध्वज स्तम्भ - भगवान बलराम
मकरध्वज स्तम्भ - भगवान प्रद्युम्न
के सांकेतिक अंकन की पौराणिक मान्यताओं की प्राचीनता सिद्ध करती है।
इस मकरध्वज स्तम्भ का अंकन कुछ प्राचीन मुद्राओं पर भी प्राप्त होता है।
- Ancient Indian Coins: A Comprehensive Catalogue, Coin no. 452, Page no. 72
200 ईसापूर्व प्राचीन इस उज्जैनी मुद्रा में मकरध्वज स्तम्भ का अंकन है जो कि प्रद्युम्न जी के सांकेतिक अंकन की प्राचीनता दर्शाता है।
- Ancient Indian Coins: A Comprehensive Catalogue, Coin no. 679, page no. 101
यह सिक्का भी उज्जैन नगर गणराज्य के अंतर्गत आता है तथा लगभग 200 ईसापूर्व प्राचीन है। इस सिक्के में भी मकरध्वज का अंकन है। सिक्के में घोडे पर सवार आकृति सम्भवतः वृष्णि वीर प्रद्युम्न का अंकन हो सकती है।
- Ancient Indian Coins: A Comprehensive Catalogue, Coin no. 680, Page no. 102
यह सिक्का भी उज्जैन से प्राप्त है तथा पूर्व दर्शाये गये सिक्के के समकालिक भी है। इसमें सभी आकृतियां पूर्व उल्लेखित सिक्के के समान ही है, अंतर मात्र इतना है कि पिछले सिक्के में व्यक्ति आकृति घोडे पर थी तथा इसमें हाथी पर है।
- Ancient Indian Coins: A Comprehensive Catalogue, Coin no. 615, Page no. 92
200 - 100 ईसापूर्व प्राचीन इस उज्जैनी सिक्के पर भी मकरध्वज स्तम्भ का अंकन है।
इस प्रकार हमें निष्कर्ष प्राप्त होता है कि कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न जी का सांकेतिक अंकन मकरध्वज स्तम्भ के रुप में ईसापूर्व कम से कम 200 साल प्राचीन है जो कि बुद्ध के सांकेतिक अंकन (भरहुत आदि स्तूपों पर) के ही समकालीन ठहरता है। अतः न केवल भगवान वासुदेव अपितु उनके भ्राता बलराम और पुत्र प्रद्युम्न जी का भी प्राचीन भारतीय लोक समाज में पूजन होता था। तथा उनको समर्पित मकरध्वज स्तम्भ का निर्माण और मुद्राओं पर अंकन भी करवाया जाता था।
संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें -
1) Vrisnis in Ancient Literature and Art - Vinay Kumar Gupta
2) श्रीहरिवंश पुराण - गीताप्रेस गोरखपुर
3) Inscriptions Of Early Andhradesa - Stefan Baums, Arlo Griffiths, Ingo Strauch and Vincent Tournier
आलार कलाम आलार कलाम ( अंग्रेज़ी : Alara Kalama ) बुद्ध के समकालीन एक दार्शनिक एवं योगी थे। वे सांख्य दर्शन के विशेषज्ञ थे। पालि ग्रन्थों के अनुसार वे गौतम बुद्ध के प्रथम गुरु थे। छ:वर्षों तक आलार कलाम के पास रहकर बुद्ध ने सांख्य मार्ग तथा समाधि मार्ग का उचित अध्ययन किया था। गौतम बुद्ध के समय समाज में सांख्य दर्शन का काफी प्रभाव था और इससे बुद्ध भी काफी प्रभावित थे। उनकी भी इच्छा थी कि सांख्य दर्शन का अध्ययन करें। इसलिए वे वैशाली के आश्रम में जा पहुंंचे, जहाँ (गोंड़ी) धर्म के (आदिवासियों) के पहले धर्मगुरु (पारी कूपार लिंगो संस्थापक) के बारहवें गोंड़ी धर्म गुरु (उत्तराधिकारी) आलार कलाम लिंगो रहते थे। आलार कलाम ने बुद्ध को न सिर्फ सांख्य दर्शन की शिक्षा दी, बल्कि उन्हें ध्यान मार्ग के सिद्धान्त तथा समाधि मार्ग का ज्ञान भी प्रदान किया। स्वयं आलार कलाम भी ध्यानाचार्य के रूप में कौशल जनपद में प्रसिद्ध थे। छ:वर्षों तक आलार कलाम के पास रहकर बुद्ध ने सांख्य मार्ग तथा समाधि मार्ग का उचित अध्ययन किया ...
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